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इस टाउन हॉल में मिले एयर पोल्यूशन के सल्यूशन

टाउन हॉल कार्यक्रम के माध्यम से आयोजित क्लाइमेट रेसिलियंट महाराष्ट्र (जलवायुके लिहाज से सतत महाराष्ट्र) का उद्देश्य आम नागरिकों, सरकारी इकाइयों, गैर सरकारी संगठनों और शोधकर्ताओं समेतविभिन्न हितधारकों के बीच एक आंदोलन खड़ा करने का है। इन सभी हितधारकों ने मंगलवार 2 मार्च 2021 को आयोजित इस वर्चुअल कार्यक्रम में पर्यावरण पर सबसेज्यादा प्रभाव डालने वाले पहलुओं पर समावेशी और सार्थक विचार विमर्श की अगुवाई की।इसका उद्देश्य केंद्रित सिफारिशों के जरिए एक सतत कार्य योजना तैयार कर जलवायु केप्रति विमर्श को और मजबूत करना भी है।

टाउन हॉल का आयोजन परपज़, असर और क्‍लाइमेट ट्रेंड्स केसमूह क्लाइमेट वॉयसेस ने किया है। इसका उद्देश्‍य लोगों को साथ लेकर वायु की गुणवत्‍ता के बारे में चर्चा करना औरसमाधान निकालना है। इसमें महाराष्‍ट्र के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग कीपहल  माझी वसुंधरा (माईअर्थ अभियान) भी साथ है। ‘अटाउन हॉल ऑन एयर पोल्‍यूशन’ एक अनौपचारिक जनसभा है जिसमें हितों के ऐसे साझाविषय शामिल किए गये, जोउभरते हुए मुद्दों के बारे में नागरिकों को जानकारी देने के लिहाज से महत्वपूर्णमाध्यम का काम करते हैं। इस विचार-विमर्श से यह अंदाजा लगाने में मदद मिली किसुनिश्चित विषयों पर हमारा समुदाय कहां खड़ा है। साथ ही इस कवायद से प्रमुखमुद्दों पर क्रियान्वित किए जाने वाले समाधान की पहचान करने और उनके बारे मेंसुझाव देने का मंच भी मिला।

इस ऑनलाइन सभा में विभिन्न विषयों के विशेषज्ञोंऔर नागरिकों ने महाराष्ट्र के नगरीय तथा ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्ध जैव विविधताके संरक्षण, जलवायुपरिवर्तन के प्रभावों के समाधान, प्रदूषणमुक्त अर्थव्यवस्था के निर्माण, बहुमूल्यपारिस्थितिकी संसाधनों के संरक्षण वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के लिए प्राकृतिकपर्यावरण को सुरक्षित रखने आदि पर सरकारी तथा आम नागरिकों द्वारा उठाए जाने वालेकदमों के बारे में भी विचार-विमर्श किया।

इस कवायद के जरिए हवा की गुणवत्ता में सुधार लानेकी राज्य सरकार की जलवायु संबंधी योजना के लिए स्पष्ट सिफारिशों और मौजूदामहत्वपूर्ण जानकारियों का एक स्पष्ट खाका पेश किया गया। साथ ही इसके माध्यम से आमजनता के बीच इसके संदेश को बेहतर तरीके से पहुंचाने, समाचार मीडिया कवरेज कराने तथा सरकारऔर नागरिकों दोनों के ही द्वारा स्थानीय स्तर पर पैरोकारी (एडवोकेसी) संबंधीप्रयासों को जमीन पर उतारने की कोशिश भी की गई।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला नेमहाराष्ट्र सरकार और नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की साथ-साथ चलती भूमिकाओं के बारेमें एक प्रस्तुतीकरण देते हुए आयोजनकर्ताओं का परिचय दिया। उन्‍होंने कहा किमहाराष्ट्र ने वायु प्रदूषण का संकट एक राज्यव्यापी समस्या है। वर्ष 2019 में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों के मामले में महाराष्ट्र दूसरेस्थान पर था। ग्रेटर मुंबई में लघु, मंझोले तथा भारी उद्योग पीएम2.5 का प्रमुख स्रोत हैं। कोयले पर अत्यधिक निर्भरता इसका एक बहुत बड़ा कारणहै। नागपुर जिले में 63% औद्योगिक इकाइयां जहरीले प्रदूषण कास्त्रोत हैं। परिवहन क्षेत्र भी पूरे राज्य में प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है।

उन्होंने वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सुझावदेते हुए कहा कि अधिक प्रदूषण बड़े शहरों के लिए प्रदूषण नियंत्रण की अलग सेयोजनाएं बनाई जानी चाहिए। प्रदूषण की मार झेल रहे क्षेत्रों की पहचान कर उनकीसमस्या का समाधान किया जाना चाहिये और कृषि, पर्यटन तथा आतिथ्‍य के क्षेत्रोंमें सरकार तथा उद्योग के बीच संवाद स्थापित किया जाना चाहिये। लैंडफिल मैनेजमेंटके लिए तकनीक का सहारा लिया जाए तथा नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की योजना तथा उसकेक्रियान्वयन के स्तर पर आम नागरिकों की भी सहभागिता सुनिश्चित की जाए।

महाराष्ट्रके पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की प्रमुख सचिव मनीषा म्हाइसकर नेटाउन हॉल और राज्य के क्लाइमेट एक्शन प्लान के लिहाज से इसके क्या मायने हैं, इस बारे में कहा कि राज्य सरकार जलवायुपरिवर्तन, क्लाइमेट रेसिलियंस तथा क्लाइमेटएक्शन के प्रति बहुत गंभीर है। अगर हम 2020 में जाएं तो हमने कोरोना महामारी केबीच माझी वसुंधरा अभियान का गठन किया। हम सभी का मानना है कि 2020 से शुरू हुआ यहदशक वह जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने के लिहाज से आखिरी दशकहै। उसके बाद बहुत देर हो जाएगी। पूरी दुनिया से उठ रही आवाजें  कह रही हैंकि यह महामारी जलवायु परिवर्तन कापरिणाम थी। कोविड-19 वायरस एक जूनोटिक वायरस है जो जानवरोंसे इंसान में पहुंचा है। ऐसा इसलिये सम्‍भव हुआ क्योंकि हमने जंगली जानवरों केनिवास स्थानों पर कब्जा कर लिया। 

उन्‍होंने कहा ‘‘जहांतक वायु प्रदूषण का सवाल है तो मैं कहूंगी कि यह 21वींसदी में एक खतरनाक रूप ले चुका है। कोविड-19, जीका, इबोला सभी जूनोटिक वायरस है और यह जानवरों से इंसान में दाखिल हुए लेकिनहमने इन संकेतों को गंभीरता से नहीं लिया। माझी वसुंधरा में हम विश्वास करते हैंकि क्लाइमेट एक्शन में हर किसी को साझीदार बनना होगा। बहुत से लोग अपने हिस्से कीभूमिका निभाना चाहते हैं। माझी वसुंधरा के तहत पहला कदम उठाते हुए हमने लगभग 700 बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों और गांवों को भी साथलिया है। दूसरी पहल के तहत 18 लाख लोगों को ई-प्रतिज्ञा दिलायी है, क्योंकिहर व्यक्ति फर्क पैदा कर सकता है। हम अपने रोजमर्रा की जिंदगी में भी अपनीछोटी-छोटी आदतों को बदलकर पर्यावरण का संरक्षण करने में योगदान कर सकते हैं। मांझीवसुंधरा की टीम ई-प्रतिज्ञा लेने वाले सभी लोगों को साथ लाकर उनके प्रतिज्ञा कोपूरा करने की प्रक्रिया पर काम कर रही है।’’

उन्‍होंने कहा ‘‘तीसरीपहल हमारी यह है कि माझी वसुंधरा पाठ्यक्रम शुरू किया जाए। अगर महाराष्ट्र केस्कूलों में शुरुआत में ही पाठ्यक्रम में प्रदूषणमुक्‍त क्रियाकलापों के बारे मेंपढ़ाया जाएगा तो बच्चे उन्हें अपने जीवन में उतारेंगे।’

वातावरण फाउंडेशन के संस्थापक भगवान केस भट्ट नेइस बात पर जोर दिया कि वायु प्रदूषण आखिर क्यों महाराष्ट्र के नागरिकों के लिएचिंता का विषय होना चाहिए

ग्रीन प्लैनेट सोसायटी चंद्रपुरके योगेश दुधपचारे ने चंद्रपुर की वायु की गुणवत्ता परथर्मल पावर प्लांट से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्वों के प्रभाव और उनके समाधान केबारे में चर्चा करते हुए कहा कि चंद्रपुर में जब थर्मल पावर प्लांट लगाथा उस वक्त इसे तरक्की का प्रतीक माना गया था लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसकी वजहसे प्रदूषण का स्तर बहुत तेजी से बढ़ा है। यहां का आसमान प्रदूषण के इन स्तरों कीगवाही देता है। वर्ष 2008 में जन सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि जब कोईव्यक्ति धूम्रपान करता है तो उसका धुआं नजर आता है लेकिन कोई भी व्यक्ति आसमान कीतरफ नहीं देखता जहां पर बिजली संयंत्र से निकल रहा धुआ तैर रहा है। केन्‍द्रीयप्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों  के मुताबिकचंद्रपुर में पीएम2.5 का चरम स्‍तर 1700 पर पहुंच गया था। 

उन्‍होंने कहा ‘‘चंद्रपुरपर्यावरण संबंधी गंभीर स्थिति से गुजर रहा है। इसकी वजह से आंखों में जलन, दमा और त्वचा संबंधी बीमारियां पैदा हो रही हैं हालात बता रहे हैं किचंद्रपुर की स्थिति दुनिया के प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में है। यहांजल प्रदूषण और मृदा प्रदूषण की स्थिति भी ठीक नहीं है।’ 

मुम्बई रिक्शा चालक यूनियन केकार्यकारी अध्यक्ष फ्रेडरिक डिएसा नेऑटो तथा टैक्सी चालकों की सेहत पर वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के प्रभाव केबारे में कहा कि वर्ष 2005 में महाराष्‍ट्र के टैक्सी और रिक्शाचालकों ने अपने रिक्शा और टैक्‍सी को सीएनजी में तब्दील करने पर कुल 700 करोड़रुपये खर्च किये। अगर ऐसा नहीं करते तो वे रोजी-रोटी का जरिया खत्म हो जाता।महाराष्‍ट्र में इस वक्‍त 35 से 40 लाख लोग रिक्शा और टैक्सी के जरिए जीवन यापन करते हैंलेकिन हम लोगों की दुर्दशा ऐसी है कि कि वायु प्रदूषण चाहे किसी भी तरह से हो, मगर सबसे पहले हम शिकार बन जाते हैं। इसके बाद हम लोगों की जिंदगी बहुतमुश्किल हो जाती है जिसे बयान करना बहुत मुश्किल है।

उन्‍होंने कहा ‘‘हमलोगों ने सरकार के सामने अपनी परेशानी रखी है लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं है और पतानहीं आगे क्या होगा। हम लोग दिन भर लगभग 12 घंटे रोड पर अपनी जिंदगी बिताते हैं। मुंबई का यह हालहै कि टैक्‍सी और ऑटो रिक्‍शाचालक 15 से 20 सिगरेट के बराबर धुआं अपने फेफड़ों में लेता है।सरकार को हमारी समस्‍याओं पर ध्‍यान देना चाहिये।’’

घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन सेजुड़े बिलाल खान नेमहाराष्ट्र के माहुल में रहने वाले लोगों पर औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले प्रदूषण के असर तथा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनलसे जुड़े मामले पर अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि माहुल एक बहुत अनोखामामला है। यह बेहद कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्‍ठभूमि वाला इलाका है। यहांदो बड़ी रिफाइनरी के उत्सर्जन के कारण आबादी पर बहुत प्रभाव पड़ रहा है। यह इलाकाअब लोगों के रहने लायक नहीं रह गया है। वर्ष 1987 में एस. सी. मेहता केस मेहता मामले की उच्‍चतम न्‍यायालयमें सुनवाई हुई थी। तब कोर्ट ने कहा था कि औद्योगिक क्षेत्रों और रिहायशी इलाकोंके बीच सुरक्षा के लिहाज से एक दूरी होनी चाहिए लेकिन अभी तक इस बारे में कोई भीनीति नहीं बनाई गई है। बाद में एनजीटी ने भी इस विषय पर बहुत विस्तार से गौर कियाऔर महाराष्ट्र सरकार को विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने के निर्देश दिए, मगर इस दिशा में भी कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट कीअधिशासी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी नेऐसे 10 प्राथमिकतावाले क्षेत्रों का जिक्र किया जिन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा किमहाराष्ट्र में वायु प्रदूषण के संकट के लिए अलग से बजट आवंटित किया गया है। यह एकअच्छा कदम है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2021-22 के आम बजट में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिएमहाराष्ट्र को 793 करोड़ रुपए दिए गए हैं। इनमें मुंबई को 488 करोड़, पुणे को 134 करोड़, नागपुर को 66 करोड़, नासिक को 41 करोड़ और औरंगाबाद तथा वसई-विरार को 32-32 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। मगर महाराष्ट्रके बाकी 13 नॉन अटेनमेंट शहरों को अपने-अपनेयहां वायु की गुणवत्ता में सुधार के लिए बहुत कम रुपए दिए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के अमरावती, कोल्हापुर, नागपुर और सांगली जिलों को वायु गुणवत्ता निगरानी तंत्र से नहीं जोड़ा गयाहै जबकि रियल टाइम मॉनिटरिंग ग्रिड का विस्तार किया जाना चाहिए। इसके अलावाग्रामीण तथा उपनगरीय इलाकों में वायु की गुणवत्ता की निगरानी की व्यवस्था की जानीचाहिए। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में वायु प्रदूषण की स्थिति सुधारने के लिएप्रदूषण रहित ईंधन और प्रौद्योगिकी को अपनाना होगा, परिवहन व्यवस्था के स्वरूप में आमूलचूल बदलाव करना होगा, ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन की व्यवस्था मैं भी बुनियादी बदलाव करने होंगे।साथ ही प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए जाने वाले कदमों के पैमाने और गति को भीबढ़ाना होगा। इसके अलावा वर्ष 2022 तक सभी नए थर्मल पावर प्लांट में प्रदूषणनियंत्रण संबंधी मानकों को सख्ती से लागू कराया जाना चाहिए। साथ ही साथ प्रदूषणनियंत्रण संबंधी मानकों को लागू करने के लिए संयंत्रवार कार्य योजना लागू करनीहोगी।

परिवहन व्यवस्था के विद्युतीकरण पर जोर देते हुएअनुमिता ने कहा के सार्वजनिक परिवहन की बसों के बेड़े में बैटरी से चलने वाली नईबसें शामिल किए जाने को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही वाहनों के विद्युतीकरण के लिएसमय बाद लक्ष्य तय किए जाने चाहिए। इसके अलावा वर्ग वार तथा शहरवार योजना बनाकरदोपहिया वाहनों, बसों तथा माल वाहनों काविद्युतीकरण किया जाना चाहिए। स्रोत के स्तर पर कूड़े के पृथक्करण कीव्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए। खुले में कूड़ा जलाने वालों पर जुर्माने केप्रावधान किए जाने चाहिए।

अर्बन एमिशंस के संस्थापक सरतगुट्टीकुंडा ने महाराष्ट्र की हवा को प्रदूषित कररहे तत्वों का जिक्र करते हुए कहा कि हम विभिन्न विचार विमर्श और वेबिनारमें नई चीजों को करने पर जोर दिया जाता है लेकिन यह जरूरी है कि हम मूलभूत चीजोंपर पहले काम करें। हमें हमारे पास जो भी मौजूद है उसे आगे बढ़ाने के लिए बहुतज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं है। हमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट, वॉकिंग और साइक्लिंग को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि वाहनों से निकलने वाले धुएं और सड़कों पर उड़ने वाली धूल को कम कियाजा सके। इसके अलावा खाना पकाने, ऊष्मा और लाइटिंग के लिए प्रदूषणमुक्त ईंधन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। खुले में कचरा जलाने से रोकने के लिए कचरेका प्रबंधन किया जाना चाहिए। निर्माण स्‍थलों तथा सभी औद्योगिक स्थलों परप्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन के नियमन को सख्‍ती से लागू किया जाना चाहिए।प्रदूषण की आशंका वाले हर क्षेत्र को प्रदूषण मुक्त बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। कागजपर तो हमारी तैयारी बहुत पक्की दिखती है लेकिन उसे जमीन पर उतारने के मामले में हमबहुत पीछे हैं।

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष सुधीरश्रीवास्तव ने राज्य में वायु प्रदूषण से निपटनेके लिए प्रदेश की कार्य योजना पर रोशनी डालते हुए कहा कि हर वैज्ञानिक कहता है किआप जिस चीज को नाप नहीं सकते उसे आप जान नहीं सकते। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रणबोर्ड का नेटवर्क बढ़ रहा है। रेगुलेटरी एनालाइजर्स बहुत महंगे हैं। हमें स्‍थानीयस्‍तर पर निर्मित सेंसर की जरूरत है मगर उनके भरोसेमंद होने को लेकर कुछ समस्‍याहै। हम इसका हल निकालने की कोशिश कर रहे हैं। हम सभी सोर्स अपॉर्शनमेंट पर ध्यानदे रहे हैं लेकिन रिसेप्टर स्‍तरीय प्रदूषण पर भी ध्यान देने की जरूरत है। जब हमसोर्स अपॉर्शनमेंट पर देखते हैं तो पाते हैं कि खासतौर पर पावर प्लांट की वजह सेप्रदूषण बढ़ रहा है। हम सभी जानते हैं कि प्रदूषण के स्रोत क्या हैं। जहां तकगाड़ियों से निकलने वाले धुएं का सवाल है तो हम मानते हैं कि इस दिशा में काफीप्रगति हुई है। हम इस मसले पर परिवहन विभाग के सम्‍पर्क में हैं। हम वाहनों सेनिकलने वाले प्रदूषण को कम करने की दिशा में विचार-विमर्शके लिए एक समिति गठित कर चुके हैं।

श्रीवास्‍तव के सहयोगी डॉक्‍टर वी. एम. मोटघरे ने कहा कि महाराष्ट्र के 18 जिले नॉन अटेनमेंट शहरों में शामिल हैं। महाराष्ट्रनेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम को लेकर काफी गंभीर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रणबोर्ड ने वायु प्रदूषण को कम करने के लिए 42 कदम सुझाए थे। उन पर काम किया जा रहा है। महाराष्ट्रके लिए ई-वाहन नीति बनाने का काम अंतिम चरण में है। मुंबई मेंमॉनिटरिंग नेटवर्क को मजबूत किया जा रहा है। सड़कों से उड़ने उड़ने वाली धूल कीसमस्या का समाधान किया जा रहा है। इसके अलावा ईंधन मेंसल्फर की मात्रा कम की जा रही है। होटल उद्योग में प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल परकाम किया जा रहा है, वाहनों से निकलने वाले धुएं कोनियंत्रित किया जा रहा है और कचरे तथा बायोमास को गलतजगह पर फेंकने और जलाने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

नीरी के निदेशक डॉक्‍टर राकेश कुमार नेमहाराष्ट्र के प्रमुख नगरों में वायु प्रदूषण के भार से जुड़े अध्ययनों और सोर्सअपॉर्शनमेंट स्टडी के तथ्यों पर चर्चा करते हुए कहा किहमें यह नहीं सोचना चाहिए कि अब कुछ नहीं हो सकता हमारा। भारत बहुत घनी आबादी वालादेश है। मौतों के जो आंकड़े सामने आते हैं, वे काफी जटिल होते हैं। हम देखेंतो 80 और 90 के दशक में मुंबई को गैस चैंबर माना जाता था लेकिनपिछले कुछ दशकों के दौरान हालात में काफी सुधार हुआ है। मुंबई में स्थित पावरप्लांट सबसे दक्ष संयंत्रों में गिने जाते हैं। चंद्रपुर की बात करें तो पानी कीकमी की वजह से वहां का पावर प्लांट 4 महीने बंद रहा लेकिन फिर भी वहां कीहवा की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए किप्रदूषण कहां से आ रहा है। हम प्रशासनिक सीमाओं में रहकर प्रदूषण का हल नहीं निकालसकते। अगर हमें कामयाब होना है तो बहुत छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे। हमें ढाई-ढाईकिलोमीटर या 5-5 किलोमीटर के क्षेत्र में वर्गीकरण करके यह देखना होगा कि प्रदूषणका स्त्रोत कहां पर है। अगर यह काम किया गया तो संबंधित क्षेत्रों के लोगों केअंदर विश्वास बढ़ेगा और वे समस्या के प्रति अधिक गंभीर होंगे।

पलमोकेयर रिसर्च एंड एजुकेशन फाउंडेशन के निदेशक डॉक्‍टरसंदीप सालवी ने महाराष्ट्र की जनता की सेहत पर वायुप्रदूषण के प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि वायु प्रदूषण पर पिछले कुछ वर्षों केदौरान ध्यान दिया जाना शुरू किया गया है। द ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिजीज स्टडी 2017 से इस बात को बहुत शिद्दत से महसूस किया गया कि वायुप्रदूषण के कारण हमारी सेहत पर क्या असर पड़ता है। कुछ बीमारियां वायु प्रदूषण केसाथ बहुत गहरे से जुड़ी हैं। फेफड़ों में संक्रमण और क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिवपलमोनरी डिजीज (सीओपीडी) वायु प्रदूषण का नतीजा है। पहली बार यह समझ पैदा हुई किवायु प्रदूषण और विभिन्न बीमारियों के बीच क्या संबंध है। वायु प्रदूषण के कारणउत्पन्न होने वाली वाली बीमारियों से निपटने के लिए स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी ढांचेको ठीक करना होगा।

उन्‍होंने कहा कि डॉक्‍टर के पास रोजाना जानेवाले एक दिन के बच्‍चे से लेकर 60 साल तक के बुजुर्गों तक 50% मरीज सांस से संबंधित बीमारी से ग्रस्त होते हैं।भारत में घर के अंदर का वायु प्रदूषण भी उतनी ही बड़ी समस्या है। भारत के विभिन्नइलाकों में पराली, उपले और कंडे तथा लकड़ी जलायेजाने से रोजाना खाना बनाने वाली महिला 25 सिगरेट के बराबर धुआं अपने फेफड़ों मेंलेने को मजबूत होती है। इसी तरह से मच्छर अगरबत्ती 100 सिगरेट के बराबर पीएम2.5 उत्‍सर्जित करती है। इसके अलावा धूपबत्ती 500 सिगरेट के बराबर धुआं छोड़ती है। पटाखे भी प्रदूषण केस्तर को बढ़ाने में बहुत योगदान करते हैं। इनडोर एयर पॉल्यूशन को दूर करने के लिएखिड़की और दरवाजे खोलने का बहुत महत्व है।

डॉक्‍टर साल्‍वी ने कहा कि ग्लोबल बर्डन ऑफ़डिजीज स्टडी 2019 के मुताबिक वायु प्रदूषण से संबंधितअसामयिक मौतों के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान प्रतिवर्ष 280000 करोड रुपए है, जबकि महाराष्ट्र में यह 33000 करोड़ रुपए प्रति वर्ष है।

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Written by Nishant

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