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एक बेटे की व्यथा (सच्ची घटना पर आधारित)

आज मां का शव लिए

खड़ा हूँ एक लम्बी कतार में

उसकी अंतिम क्रिया के लिए

मां

जिसने मुझे पाला पोसा

आदमी बनाया

मेरे लिए

दिन रात अपना पसीना बहाया

खून जलाया

भुला के नींद अपनी

सुलाती थी मुझे

पी के आंसू अपने

हंसाती थी मुझे

मां

जो थी वात्सल्य का सागर

जिसकी अपरम्पार महत्ता

पे कवियों ने लिखीं

अपनी सर्वोत्तम रचनाएं

दुनिया ने शीश नवायें

जिसके आँचल में मिलती थी

मुझे जन्नत

मुझे छोड़ असहाय वो

खुद चल दी आज 

जन्नत को!!

कतार है लम्बी

मतलब मैं अकेला नहीं हूँ!

मां बाप की अर्थियां लिए

अनेकों पुत्र पुत्रियां

पुत्र पुत्रियों की लाशों के

बोझ से दबे

वृद्ध माता पिता

सब ही तो हैं

पर इससे मेरा गम

हुआ है क्या किंचित भी कम?

और न जाने कितने ही ऐसे

अस्पतालों में हैं बेचैन परेशान

उनमे से हजारों ठीक हो

लुटे पिटे 

डरे सहमे लौट जाएंगे

अपने अपने घर

और सैंकड़ों ज्यादा बदनसीब

आएंगे यहाँ शमशान

मेरी तरह

ले कर शव अपनों के

टीका लगे या न लगे

साल भर से महामारी के सामने घुटने टेक सभी

करते रहे इधर उधर की

बड़ी बड़ी बातें, बड़े बड़े दावे

मारते रहे भुस्स में लठ सब

बिना जाने बिना समझे कुछ

देते रहे अधकचरा ज्ञान

कभी यह करो, कभी वह मत करो

अज्ञानी सब बन गए महाज्ञानी

गेम चेंजर दवाई, इलाज आते रहे

डस्टबिन में जाते रहे

आसमान छूते रहे मौत के ग्राफ 

 

सरकारें कहती रहीं  महामारी है क्या करें?

लोग कहते रहे महामारी है क्या करें?

जानता नहीं कोई महामारी कैसे आई?

किन मिलभगतों से फैली? किसने फैलाई?

अब कह रहे वही सब अनजान

टीका लगवाओ महामारी से बचो

मरने से शर्तिया बचो

मेरी भोली मां ने लोगों की मानी

सरकार की मानी

मीडिया में बोलते बड़े बड़े डॉक्टरों  की मानी

मेरी नहीं सुनी एक

क्यों सुनती वो मुझ नादान की

बड़े बड़े हाकिमों के सामने?

भली चंगी वो

ख़ुशी ख़ुशी लगवा आई टीके

खुश अब कोरोना से तो बची मैं

उससे मरने से तो बची मैं!!

बेचारी बन गयी अतिथि शमशान की

आज मेरे जैसे

और भी हैं बहुत कतारों में

यहाँ या कहीं और

टीका या टीके लगवाए हुओं को

जलाने या दफनाने के इंतज़ार में

कोई नहीं जानता उनकी गिनती

सैंकड़ों में या हजारों में?

एक महा पागलपन हो गया है सब पे हावी

टीका लगवाओ टीका लगवाओ

टीके बनाओ टीके बनाओ

टीके मंगवाओ टीके मंगवाओ

महामारी से बचो, बचाओ

नहीं जानता

क्यों झूठ फैला रहे

तमाम रट्टू तोते

क्यों झूठ फैला रहीं सरकारें?

नहीं जानता कोई कितना कारगर टीका

कितने दिन तक कारगर टीका

टीका लगवा लगवा संक्रमित हो रहे अनगिनत

कोरोना की विभीषिका से जूझ रहे अनगिनत

फिर भी अपनी ही जनता को

बलि का बकरा बना रहीं सरकारें?

राजनीति सिर्फ राजनीति में उलझे सब

ठंडे हो रहे हज़ारों रोज, गरमा रही सियासत

गिरगिट सी बदल बदल रंग नित्य

नई नई नीतियां ला रहीं सरकारें

 

मेरी मां बस एक गिनती

एक आंकड़ा

जैसे कितने ही और मानव

जो जी हंस रहे थे कभी

कुछ दिन पहले अभी

सिर्फ एक आंकड़ा अब

जो जीवित हैं

कोरोना से मुक्त अभी

उनका आंकड़ा कहीं बहुत बड़ा

मरने वालों की उन्हें क्यों होने लगी परवाह?

पूछता मैं बदनसीब फिर भी

मेरी मां को क्यों मारा?

क्या था कसूर उसका

मेरा, मेरे परिवार का?

कोई नहीं उसका हत्यारा??

हाँ

कसूरवार मैं भी, कसूरवार तुम भी

डूबे रहे अपने अपने स्वार्थ में

पनपने दीं हमने

झूठी, राक्षसी व्यवस्था, व्यवस्थाएं 

जिसने की मेरी मां की हत्या

जो कर रहीं आज तमाम हत्याएं!!

 

मां का शव लिए

कितना निस्सहाय मैं!  

कितना निस्सहाय मैं!!

कितना निस्सहाय!!!

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Written by Atul Kumar

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