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संकट को संभावनाओं में बदलती महिलाएं

कोरोना संक्रमण के संकट को पीछे छोड़ते हुए भारत ने एक साथ दो वैक्सीन बना कर जो इतिहास रचा है, उसे मानव सभ्यता कभी नहीं भूलेगी। लेकिन संक्रमण काल में जिस तरह से इंसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, उस काले अध्याय को भी भूला पाना नामुमकिन है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता गया था, वैसे-वैसे लोगों के मन में इसकी दहशत भी बढ़ती गई थी। भारत में इस वौश्विक महामारी का सबसे बुरा प्रभाव महाराष्ट्र में हुआ। यहां इसकी चपेट में सबसे ज्यादा मुंबई, ठाणे और पुणे सहित पश्चिम महाराष्ट्र के सतारा, सांगली तथा कोल्हापुर जैसे शहर रहे। यही वजह रही कि इन क्षेत्रों में राज्य सरकार द्वारा सख्त लॉकडाउन लगाया गया और जिसका असर आम जनजीवन पर देखने को मिला। इस दौरान लोगों के दैनिक व्यवहार और उद्योग धंधे लगभग बंद पड़ गए थे। एक ओर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई शुरू हुई तो दूसरी तरफ लोगों के सामने रोजीरोटी का संकट बढ़ता चला गया। बड़ी संख्या में लोग बेकार होते चले गए।

लेकिन इस विकट स्थिति में भी कुछ सकारात्मक पहल देखने को मिली। जो मनुष्य के हिम्मत और संकट से लड़ने की साहस को दर्शाता है। यह हिम्मत उस वक्त और बढ़ जाती है जब इसकी पहल समाज में कमज़ोर और असहाय समझे जानी वाली महिलाओं द्वारा किया जाता है। कोरोना संकट के समय जहां बड़े बड़े उद्योग धंधे पूरी तरह से बंद हो गए थे, वहीं कुछ उद्योग और व्यवसाय से जुड़े कर्मचारियों ने अपनी कोशिशों से इस संकट को संभावना में बदल दिया और अपने सेक्टर को एक नई भी दिशा दी। इन्हीं में एक है महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में स्थित इचलकरंजी गारमेंट क्लस्टर।

इस गारमेंट क्लस्टर की खास बात यह है कि यह महिला कर्मचारियों द्वारा संचालित एक महत्त्वपूर्ण परियोजना है। इस परियोजना से जुड़ी महिलाओं ने कोरोना-काल में अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को इतनी अच्छी तरह से संचालित किया कि सामाजिक और आर्थिक रुप से इस उद्योग को एक नई पहचान हासिल हुई है। बता दें कि महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित इचलकरंजी गारमेंट क्लस्टर की स्थापना पांच साल पहले केंद्र सरकार के सहयोग से हुई थी। इसमें 75 प्रतिशत कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है।

कोरोना लॉकडाउन में जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती गई, वैसे-वैसे वस्त्र उद्योग के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो गई। इसलिए इस क्लस्टर में कार्य करने वाली अधिकतर महिलाओं का रोज़गार मुश्किल में पड़ गया। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि उनके द्वारा तैयार किए गए कपड़े ग्राहकों तक कैसे पहुंचाई जाए? इस संबंध में क्लस्टर के संस्थापक प्रकाश अवाडे बताते हैं कि यहां कार्यरत महिलाओं ने इस सबसे बड़े संकट को संभावना में बदल दिया। इसके लिए उनके पास एक बहुत अच्छी योजना थी। क्लस्टर की महिलाओं का मानना था कि कोविड-19 संक्रमण के समय सबसे अधिक मांग चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग होने वाली चीजों की है। ऐसे में यदि कपड़े के गुणवत्तापूर्ण मास्क और एप्रन तैयार किए जाएं तो उनकी बड़ी संख्या में खरीदी भी होगी और यह एक सामाजिक जवाबदेही भी होगी। कारण यह था कि तब राज्य भर में मास्क और एप्रन की भारी कमी हो गई थी।

महिलाओं के दिए गए सुझाव के बाद क्लस्टर ने सिर्फ इन दो चीजों का ही उत्पादन किया। इससे क्लस्टर की व्यावसायिक गतिविधियां चलती रहीं और समय की मांग के मुताबिक उत्पादन की दिशा भी बदल गई। इसका असर यह हुआ कि कामकाजी महिलाओं का रोज़गार न सिर्फ सुरक्षित रहा बल्कि उन्होंने अपने लिए नए उपभोक्ता भी बनाए और क्लस्टर को सामाजिक रुप से लाभ भी पहुंचाया। इस क्लस्टर में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी माया जाधव बताती हैं कि उनके साथ लगभग तीन सौ महिलाएं काम करती हैं। इसी तरह, लगभग इतनी ही संख्या उन महिलाओं की है जो क्लस्टर का काम अपने-अपने घरों से करती हैं। इसके अलावा सहयोगी कार्य करने वाली महिलाओं की संख्या पांच सौ से अधिक है। इस प्रकार इस परियोजना में ग्यारह सौ से अधिक महिलाएं काम करती हैं।

इस बारे में एक अन्य महिला कर्मचारी सुमन शिंदे बताती हैं कि यहां काम करने वाली सभी महिलाएं कोरोना लॉकडाउन के लिए निर्धारित हर नियम का अच्छी तरह से पालन करती रहीं। इस दौरान सामाजिक अंतर को बनाए रखते हुए अच्छी तरह से काम किया जाता रहा। हालांकि, लॉकडाउन के कारण कई महिलाएं क्लस्टर तक नहीं पहुंच सकती थीं। इसलिए उन्हें घर में रहते हुए टास्क दिए गए। इस दौरान उत्पादन की मांग इतनी अधिक बढ़ी कि इससे अन्य महिलाओं को भी जोड़ा गया। इस प्रकार जहां समय पर अधिक से अधिक मास्क व एप्रन बनाए गए वहीं महिलाओं को भी लॉक डाउन के बावजूद आर्थिक लाभ मिलना जारी रहा।

इस तरह इन महिलाओं ने देश को संकट के समय महामारी से लड़ने में अपनी ओर से अहम भूमिका भी निभाई। कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में इन महिलाओं ने गुणवत्तापूर्ण सामग्री तैयार करके सरकार और समाज को मदद दी। इस दौरान इन महिलाओं ने बड़े व्यापारियों से दान के रुप में भारी मात्रा में कपड़े जुटाए। नतीजा यह हुआ कि इस क्लस्टर ने करीब तीन लाख एप्रन और छह लाख मास्क तैयार किए। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस संकट की घड़ी में यदि ये महिलाएं चाहतीं तो भारी मुनाफ़ा बटोर लेतीं। लेकिन, इन्होंने ऐसा नहीं किया। इन महिलाओं ने लाखों की तादाद में बनाए गए एप्रन और मास्क ज़रूरतमंदों तक भी मुफ्त पहुंचाए। यह ऐसी सामाजिक प्रतिबद्धता थी जिसने राज्य में एक मिसाल कायम की और कोरोना संक्रमण से बचाव कार्य में अन्य संस्थानों को भी आगे आने के लिए प्रेरित किया। इस परियोजना की प्रबंधक किशोरी अवाडे बताती हैं कि ये एप्रन और मास्क महाराष्ट्र तथा गोवा की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, पुलिसकर्मियों, सरकारी स्वास्थ्य कर्मियों और नगर-निगम के कर्मचारियों को नि:शुल्क वितरित किए गए।

इस कार्य के लिए क्लस्टर ने अपने व्यावसायिक उद्देश्य को बदल दिया और सामाजिक कल्याण की दृष्टि से कार्य किया। इसका क्लस्टर को लाभ पहुंचा। वजह यह रही कि इससे क्लस्टर की सोशल ब्रांडिंग हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि क्लस्टर को बड़ी-बड़ी कंपनियों से बड़े-बड़े आर्डर मिले और यहां काम करने वाली महिलाओं के सम्मान में भी बढ़ोतरी हुई। इसी क्लस्टर में कार्यरत एक अन्य महिला कर्मचारी वैशाली बताती हैं कि कोरोना की चुनौती का सभी महिलाओं ने हिम्मत से सामना किया। इससे क्लस्टर प्रबंधक और महिला कर्मचारियों के बीच के संबंध पहले से और अधिक मजबूत हुए हैं। जब कोरोना महामारी के समय कई उद्योग-धंधे संकट में थे, उस वक्त इचलकरंजी गारमेंट क्लस्टर की महिलाओं के पास अगले कुछ महीनों के लिए पर्याप्त काम थे।

एक समय था जब कोरोना संकट को देखते हुए यह सवाल उठा था कि इस उद्योग का कामकाज जारी रखा जाए या बंद किया जाए। ऐसी परिस्थिति में यहां के क्लस्टर प्रबंधन और महिला कर्मचारियों ने मिलकर जहां कोरोना से पैदा हुई मंदी को मात दी वहीं अपनी पहचान भी बदलने में कामयाबी हासिल की। सबसे अच्छी बात यह है कि इस तरह इन्होने जहां अपने व्यवसाय को शिखर पर पहुंचाया वहीं यह भी साबित कर दिया कि महिलाओं में भी संकट को संभावनाओं में बदलने की क्षमता है।

यह आलेख पुणे, महाराष्ट्र से शिरीष खरे ने चरखा फीचर के लिए लिखा हैइस आलेख पर आप अपनी प्रतिक्रिया इस मेल पर भेज सकते हैंcharkha.hindifeatureservice@gmail.com

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