in

(सटायर) हम ट्रेन के ए.सी. डिब्बों की भी कोई सुन लो साहब!

लो जी, भला ये भी कोई बात हुई!

समझ में नहीं आता तुम लोगों को, या फिर समझना चाहते नहीं हो? मजदुर हो तुम मजदुर. तुम्हारी हैसियत ट्रेन के जनरल डिब्बों में सफ़र करने वाली है. हम ट्रेन के ए.सी. डिब्बे है. हम राजधानी, दुरंतो, शताब्दी, महाराजा, डबल डैकर, हमसफ़र और सो कॉल्ड ‘गरीब रथ’ में मिडिल और अपर मिडिल क्लास के लोगों को अपने साथ लेकर सफ़र करते है. न जाने कहाँ कहाँ से आ जाते है ये लोग!

गुस्सा तो मुझे उस दिन बेहद आया था जिस दिन ये अनाउंस किया गया की, इन ग़ैर ज़रूरी लोगों के लिए स्पेशल ट्रेन चलायी जाएंगी. मुझे लगा ट्रेन में जनरल डिब्बे लगेंगे, मुझे क्या मैं तो अपना आराम से मज़े में रहूँगा. ख़ुदा कसम मेरा कलेजा जल उठा जब मैंने ये सुना की भाड़ा बढ़ा कर हम ए.सी. के डिब्बों को घसीटा जाएगा इन मजदूरों के लिए.

और सच बताऊ तो आख़िर इतनी बड़ी क्या आफत आ गई की अब ट्रेन से इनको छोड़ा जाएगा. पहले भी तो ये पैदल अपने गाँव के लिए रवाना हो ही रहे थे न. और मुझे तो समझ नहीं आता की, क्यों जाना है गाँव? घर पर रहो न! तुम लोगों की वजह से ही सोशल डिसटेंसिंग सफल नहीं हो पा रही. तुम्ही लोगों की वजह से आज डेढ़ लाख से ज़्यादा केस हो चुके है भारत में. जीना हराम हो रखा है.

शुरुआत में तो मुझे गुस्सा आया लेकिन बाद में सोचा की चलो इसी बहाने मैं भी कम से कम एक जगह पड़े-पड़े जंग खाने से बच जाउंगी. और सैर हो जाएगी वो अलग. और मैं सरकार से बेहद खुश भी हूँ की उन्होंने मेरा रुतबा किसी के आगे कम नहीं होने दिया. भाड़े में किसी तरह की कोई कमी नहीं आने दी. पूरा राजधानी वाला भाड़ा वसूल किया इनसे.

इनफैक्ट सच बताऊ तो मेरा फायदा ही हुआ. वैसे तो राजधानी वाले भाड़े में, सफ़र करने वालों को मुझे, सफ़र के दौरान 3 वक़्त का खाना देना होता था, सुबह-शाम की चाय के साथ कटलेट, और डिनर के बाद मिसरी-सौंफ भी. और पानी का तो कोई हिसाब ही नहीं था. यही नहीं पुरे सफ़र के दौरान, मेरे ए.सी. से किसी को ठण्ड न लग जाए इसके लिए मुझे चादर और तकिया भी देना होता था पहले. लेकिन इन मजदूरों के साथ वो समस्या नहीं है. कुछ भी खिला दो, कुछ भी पिला दो. अब क्या करे बताइए न, राजधानी वाले भाड़े में सफ़र करेंगे तो थोड़ी न राजधानी वाला आनंद ले पाएँगे.

हम पर सफ़र करने वालों का कुछ स्टेटस होता है समाज में. ऐसे ही नहीं कोई ऐरा-गैरा हम पर सवार हो जाए.

और इनकी जाहिलियत की हद आपने भी तो देखी ही होगी टीवी में. कैसे पानी और खाने पर टूट पड़े ये लोग. भाई सबके लिए खाना आता है. हमने 49 लाख लोगों के लिए 84 लाख खाने के पैकेट और 1 करोड़ 25 लाख पानी की बोतल का इंतजाम किया था. एक एक कर के लाइन में लग कर अपना खाना और पानी की बोतल ले लो. लेकिन नहीं, इन्हें कौन मैनर्स सिखाए. जाहिल गवार लोग कही के.

ये लोग सोचे होंगे की राजधानी वाले भाड़े में गाँव जा रहे है कुछ तो ख़ास ज़रूर मिलेगा हमारी तरफ से. मज़े की बात बताऊ तो मैंने भी पूरा बदला लिया इनसे, जहाँ हमने वादा किया था की हम 17 घंटों में आपकी मंजिल तक आपको पहुंचा देंगे, वही मैंने इन्हें 5-7-9 दिनों तक रस्ते में ही घुमाया. मुझे किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी नहीं थी. न जाने क्यों इनको आफत आ रही थी. और करो हम पर सफ़र.

और ऐसे में अगर कोई सफ़र के दौरान मर जाता है तो इसमें मेरा क्या दोष? मैंने कहा था क्या अपने गाँव जाने के लिए! और अगर जा ही रहे थे हम पर सवार हो कर तो अपने खाने पीने का इंतज़ाम तुम्हे खुद करना चाहिए था यार. मुझ पर सवार हो कर मरे, तो मेरी गलती, मेरे रस्ते पर कोई आ जाता है और गलती से उनपर ट्रेन चढ़ जाए और वो कट कर मर जाए तो मेरे दूर के रिश्तेदार की गलती! और वैसे भी हम पर सवार हो कर मरने वाला हर व्यक्ति, मानसिक रूप से बीमार ही होता है. सच में, भरोसा न हो तो राज्य की सरकारों से पूछ लो. वो तो पैदा ही सच बोलने के लिए होते है यार.

वैसे मुझे अपने पुराने सवारियों की बेहद याद सताती है. आज कल वें प्लेन में सफ़र कर के अपनी मंजिल तक पहुँच जाते है. उन दिनों की बेहद याद आती है जब वें अपना सिर्फ एक बैग लेकर, बड़े रौब के साथ हम तक पहुचते थे. अपने बर्थ में अपनी सीट पर बैठ कर, अपना लैपटॉप लेकर पट-पट-पट-पट कुछ कुछ दबा कर अपने मनोरंजन में व्यस्त हो जाते थे या अपने काम में व्यस्त हो जाते थे. 3 ए.सी. टिअर में चढ़ने वालों में ये लोग भी कभी कभार घुस कर सफ़र करते थे, इसीलिए मुझे 2 ए.सी. टिअर वाले या फिर फर्स्ट क्लास के पैसेंजर के साथ ख़ास लगाव था. अब न जाने कब लौट कर आएँगे वो पुराने दिन. आई विश माई ओल्ड डेज विल कम वेरी सून!

 

[ये छोटा सा लेख ट्रेन के ए.सी. डब्बे की मानसिकता को बयान करता है. हालाँकि ये मानसिकता किनकी होती है, सटायर समझने वाले इस बात को ख़ूब समझते है. बेहद शर्म की बात है की आज देश के मज़दूरों की इतनी दयनीय हालत में उन्हें किसी भी प्रकार का थोडा सा भी सुकून नही है. कही से जुगाड़ कर के जब कोई मजदूर श्रमिक ट्रेन में सफ़र कर के अपने गाँव पहुचना चाहता है तो भी वो भूख से, गर्मी से मरने के लिए मजबूर है. और सरकारे अंत में उन्हें मानसिक रुप से बीमार होने की घोषणा कर देती है. ऐसे वक़्त में सरकारों से सवाल करना बेहद ज़रूरी हो जाता है की क्या उनके लिए भारत के मजदुर केवल वोट बैंक है, क्या वे केवल आंकड़े है आपके लिए? मजदूरों की इतनी दयनीय स्थिति में होने के बावजूद भी सरकारी हुक्मरानों और नेताओं का दिल नहीं पसीजता? क्या आपकी नीति गरीबी ख़त्म करने की थी या गरीबों को ख़त्म करने की है?]

The views and opinions expressed by the writer are personal and do not necessarily reflect the official position of VOM.
This post was created with our nice and easy submission form. Create your post!

What do you think?

Written by Shahnawaz

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

Comments

0 comments