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सरकार के इशारों पर नाचती मीडिया testing

मीडिया और सरकार का हाल बन्दर और मदारी जैसा हो गया है। सरकार मीडिया के सामने डुगडुगी बजा रही है और वो बन्दर की तरह सरकार के इशारों पर नाच रही है कि किस तरह से लोगो को नए-नए खेल दिखाए जाए।

नए ज़माने की सरकार की तारीफ़ ये है कि एक ऐसी सरकार जो जनता की समस्याओं को भले हल न कर सके, अंदर और बाहर के हालात उसके क़ाबू में न हों, मगर उसने लोगों के हाथों में झुंझुने पकड़ा दिए है। जिससे लोग बच्चों की तरह उसकी तरह खिंचे चले आए ताकि लोग कुछ सोचने समझने की जगह उन झुंझुनो की आवाज़ सुनते रहे और जब इस खेल को देखते देखते उनकी आंखें दुख जाए तो वो सो जाए और फिर सुबह इसी खेल को दोबारा देखने के लिए खुशी खुशी उठ जाए।

जैसे- एक खिलौना कांग्रेस के कामकाज का दे दो की कांग्रेस ने साठ सालो में क्या किया, एक खिलौना उन लोगो के नाम का दे दो जो सरकार के विरूद्ध प्रदर्शन कर रहे है मसलन उन्हें गद्दार बताकर, एक खिलौना बॉलीवुड के नाम का पकड़ा दो कि कौन-कौन ड्रग लेता है, एक खिलौना ऐसे डर का दे दो की अगर आवाज़ उठाई तो मर देंगे जेल भेज देंगे मतलब लोग अंधे, बहरे और गूंगे बन जाए ताकि जब आंखे खोले तो भय से फिर बन्द करले या फिर खोले तो सरकार के अलावा कुछ नजर न आए, बहरे बना दे लोगो को ताकि वो ज़ुल्म को न सुन सके और गूंगे इसलिए ताकि सब कुछ जानकर भी कुछ बोल न सके

ताकि लोग किसी मुद्दे पर सोच न पाए और सोचे भी तो उनके पास कोई चारा न बचे की आवाज़ उठा सके। सरकार रेप करने वालो को सम्मानित करती है यही दूसरी तरफ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देती है अब इसमें यह बात समझ नही आती की ये वार्निंग है या फिर एकमात्र स्लोगन।

यही हाल मीडिया का भी हो गया है स्टूडियो में डिबेट कम कॉमेडी ज्यादा होती है मीडिया वाले अपना काम भूल कर कॉमेडी करने लगे है और कॉमेडी करने वाले लोग इंटरव्यू लेने लगे है। मीडिया किसी एक संस्था के इशारों पर नाचने लगी है सरकार की खामियां बताने की जगह या सरकार ने जो काम किया है उसे दिखाने की जगह मीडिया राजनेताओं का प्रोमोशन करने में लगी हुई है। मीडिया अर्थव्यवस्था पर सरकार से सवाल पूछने की बजाए ये पूछने में लगा है कि आप पूरे दिन काम करते है थकते नही है या आम को काट कर खाते है या चूस कर कई पत्रकार तो सभ्य पत्रकारीता के नाम पर बन्दर पत्रकारिता करने में लगे हुए है जहाँ एक तरह साईकिल से घूम घूम कर पत्रकारीता की जा रही है वही दूसरी तरह कोई हवा के झोको से उड़ने को तैयार हो जाता है।

मीडिया के चैनल सीरियल्स की तरह हो गए है जिसमे ड्रामे चलते रहते है कि अब आगे क्या होगा? कौन किसको अभद्र भाषा बोलेगा और कौन झुटे तथ्यों का हवाला देगा। सवाल कई उठते है मन मे की क्या ये सब ऐसी चलता रहेगा लोग ऑडिएंस की तरह हॉल में बैठ कर इसी तरह राजनेताओं के द्वारा चल रहे ड्रामों का मज़ा लेते रहेंगे या फिर इस गूंगी बहरी दुनिया से उठकर अपने लिए आवाज़ भी उठा पाएगा या नही?

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