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सीमा स्वधा की पुस्तक गिरती दीवारों का सच प्रकाशित

एक तो बगहा कस्बाई शहर उसमे भी यहां न तो बढ़िया कॉलेज और न ही बढ़िया विद्यालय। उसके बाद भी एक के बाद एक बेहतर पुस्तकों की रचना करना और उसका प्रकाशन। किसी भी शहर के लिए गौरव की बात हैं। और यह गौरवशाली पल आया है बगहा की सीमा स्वधा के कारण। नगर स्थित सिटी मांटेसरी पब्लिक स्कूल की प्राचार्या सीमा स्वधा की नई पुस्तक अमेजन पर ‘ गिरती दीवारों का सच ‘ प्रकाशित हुआ है। इसके पहले उनकी पुस्तक ‘ अठन्नी ‘ का प्रकाशन हो चुका है। इस बाबत बात करते हुए सीमा स्वधा ने बताया ” अरसे से प्रतीक्षा थी मुझे इस संग्रह(गिरती दीवारों का सच) के प्रकाशित होने की. कोरोना के इस  कठिन दौर में सब कुछ स्थगित ही था कुछ समय के लिए. विश्वास था कि समय फिर सही होगा और जिंदगी सामान्य. बस यूं ही अपने दुख-सुख को साझा करते जीवन पथ पर बढ़ते जाएं हम सब,यही कामना है. परिस्थितियों को भी अनुकूल होना ही है एक दिन.”

     उनकी पुस्तक का कुछ अंश:  

        “बस माती, बस कितना नफरत करोगी अब। जिंदगी में जो मिला,जैसा मिला,वही तुम्हारे हिस्से का था। वहीं से शुरुआत कर सबको सहेजना होता है अपनी जिंदगी। सबको संभालना पड़ता है अपने हिस्से का दुख और सुख भी।

           इतने बरस जिस तटस्थता और नफरत के सहारे जिन रिश्तों के मोह को दबा रखा था,लगा अब कहीं सूराख हो गया था।वरना ये  तरल अनुभूति क्यों आखिर ? पहली बार लगा,उसे मन की समझाइश से संतोष कर लेना चाहिए था। सच ही तो कहता है अंतर्मन कि एक जिंदगी हम बुनते हैं और एक नियति ने पहले से ही बुन रखा होता है हमारे लिए। हम कोशिश तो करते हैं पर मिलता वही है जो हमारे हिस्से का होता है।

      माती की नजरें पहाड़ी की ढलान से फिसलती हुई अब धरातल पर थी जहां आकाश उल्टा पड़ा था। रात के अंधेरे में टिमटिमाते हुए दीये की रौशनी तो थी चारों ओर,भले ही चांद नदारद था अभी।”

             इसी संग्रह की कहानी (बाबुल फिर तेरे गांव में) से…

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