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1920 से 2020: हुकूमत से टकराता एक गांव

यह करतार सिंह झब्बर का गाँव है, जिसने गुरुद्वारों को महंतों से मुक्त कराया था, जिन्हों ने जनरल डायर की चापलूसी करने वाले गद्दारों को धर्म और समुदाय से खदेड़ने के लिए सम्मेलन आयोजित कर प्रस्ताव पारित किए थे।

हरियाणा के गाँव हाबरी का गुरुद्वारा आ गया है। हमारा काफिला कैथल से पानीपत होते हुए दिल्ली की ओर जा रहा है और यहाँ लंगर के लिए रुके हैं।

पंजाब से हमने चीका वाले रास्ते से हरियाणा में प्रवेश किया और कैथल तक की 40 किमी की दूरी तय करने में हमारा पूरा दिन गुजर गया क्योंकि यहां तक ही हरियाणा पुलिस के साथ पाँच झड़पें हो चुकी हैं। सभी जगहों से भूखे पेट, बाधाओं को पार करते हुए हम साहस से लबरेज होकर आगे बढ़े हैं। हमारे काफ़िले के अधिकांश लोगों ने केवल सुबह की चाय ही पी थी, लेकिन खाया कुछ भी नहीं था। यहाँ गुरुद्वारा में रुकने वाली पहली ट्रॉली वालों ने गुरुद्वारा के व्यवस्था पकों को बताया, “…कारवां दिल्ली जा रहा है जी, लंगर खाना है…”। कुछ कुछ अंधेरा हो चुका है। समय ऐसा है कि गांव के लोग अपने घर में रात की रोटी का काम निपटा कर सो चुके हैं। गुरुद्वारे के स्पीकर से ग्रन्थि जी की आवाज़ गाँव में फैलती है, “वाहिगुरु – वाहिगुरू – वाहिगुरू! भाई एक कारवां अपने गाँव से गुजर रहा है। यह सरकार के काले कानूनों के खिलाफ दिल्ली का सामना करने जा रहा है। हमें संगत के लिए लंगर की सेवा करनी है। आइए हम सब माई भाई सेवा करें।”

स्पीकर की आवाज़ बंद ही हुई है कि गाँव के लोग, नौजवान और औरतें गलियों से गुरुद्वारा की ओर भागे आ रहे हैं। किसी के हाथ में अचार का पीपा है, किसी के हाथ में रोटियां हैं, किसी के पास दूध की बालटी है, किसी के डिब्बे में गुँथा हुआ आटा है, किसी के पास घर की बनी दाल का कटोरा है। सभी गुरुद्वा रों में इकट्ठा होते हैं, यहां गांव और कारवां के लोग पूरे जोश में हैं। भठ्ठी ओं में आग जलती है। चाय, रोटी और दाल के लंगर को चमत्कारिक तरीके से तैयार किया जा रहा है। पांच से सात मिनट में युवा दाल और प्रसादा (रोटी) बांट रहे हैं। लंगर के बाहर खड़ा एक सेवादार कह रहा है, “यह करतार सिंह झब्बर का गाँव है, जिसने गुरुद्वारों को महंतों से मुक्त कराया था, जिन्हों ने जनरल डायर की चापलूसी करने वाले गद्दारों को धर्म और समुदाय से खदेड़ने के लिए सम्मेलन आयोजित कर प्रस्ताव पारित किए थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के काले रौलट कानूनों के खिलाफ आवाज उठाई थी। उन्हें अंग्रेजों ने काले पानी की सजा सुनाई, कैद किया, लेकिन उन्हों ने हौसला नहीं हारा… बस जी, हमारा गाँव इतना सौभाग्यशाली है कि आज फिर से हमें उन लोगों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने का अवसर मिला है जो सरकार से टक्कर लेने जा रहे हैं। बस भरोसा रखो, हमारी जीत निश्चित है।”

लोग ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर बैठकर जयकारे लगा रहे हैं। काफिले के आगे चल रहे ट्रैक्टर की लाइट दूर तक रोशनी बिखेरती है और लोग अंधेरे को चीरते हुए दिल्ली की ओर बढ़ रहे हैं।

This article was originally published by Sukhjinder Mahesri in Trolley Times.

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