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कश्मीर घाटी में न्याय की प्रतीक्षा करता एक दिव्यांग बच्चा

एक दिव्यांग बच्चा जो कश्मीर में न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। इस खबर को सामने लाने का प्रयास डॉ. चिंतन सरना ने किया है जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं ।

कश्मीर में आए दिन किसी किसी घटना की खबर हमें मिलती रहती हैं। चाहे वो राजनीतिक हों या किसी हमले कि मगर इसके बावजूद भी ऐसी अनेक घटनाएं हैं जिनका जि़क्र किसी भी न्यूज़ चैनल या अखबार में नहीं मिलता । जैसे कि एक दिव्यांग बच्चा जो कश्मीर में न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। इस खबर को सामने लाने का प्रयास डॉ. चिंतन सरना ने किया है जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं ।

डाॅ. चिंतन सरना बताते हैं कि अयान ज़फ़र एक 11 साल का दिव्यांग बच्चा है जिसकी आंखो की देखने की क्षमता कम है और वह न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन लगभग पिछले एक साल से से कोई भी उसकी और उसके माता-पिता की मदद के लिए आगे नहीं आया है। अयान के माता-पिता उदास हैं क्योंकि उनका बच्चा अब बिस्तर पर है और स्वतंत्र रूप से खुद चलने में सक्षम नहीं है। अंत में माता-पिता को एक उम्मीद की किरण मिलती है और उन्होंने इस मामले में मदद के लिए कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से संपर्क किया।

अयान के माता-पिता ने वहीं घाटी के चार सामाजिक कार्यकर्ताओं डॉ. चिंतन सरना, ज़हीर जान , मुदस्सिर शाबान और नूर उल अज़हर शाह से संपर्क किया । डॉ. चिंतन सरना एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो कश्मीर में बाल अधिकार कार्यकर्ता हैं और पिछले 10 वर्षों से दिव्यांग बच्चों के मामलों को संभालते हैं, ज़हीर जान बाल रोग विशेषज्ञ और विकलांगता अधिकार कार्यकर्ता हैं , मुदस्सिर शाबान जो स्वयं एक विकलांग व्यक्ति हैं और साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं और नूर उल अज़हर शाह ये चारों अयान के परिवार की मदद के लिए आगे आए । इन्होंने इस मामले को अपने हांथो में लिया लिया, ताकि विशेष रूप से कमज़ोर या दिव्यांग बच्चे को न्याय मिले। डॉ. चिंतन सरना ने बताया कि माता-पिता को सामाजिक कार्यकर्ताओं से संपर्क करने और न्याय पाने के लिए अदालत जाने का पूर्ण अधिकार है। साथ ही डॉ. सरना बताते हैं कि एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में हमें आगे आना चाहिए और उन्हें उनके अधिकार प्राप्त करने में मदद करनी चाहिए। प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार, सुरक्षित रहने का अधिकार, देखभाल करने का और परवरिश का अधिकार, इसके साथ ही उचित देखभाल का अधिकार और अन्य लोगों से अधिक महत्व देने का प्रयास , जीवित रहने का और अस्तित्व का अधिकार है।उन्हें ये अधिकार प्रदान करने की आवश्यकता है ।

ज़हीर जान ने अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया कि,आरपीडब्लयूडी अधिनियम 2016 के अनुसार विशेष आवश्यकता वाले या दिव्यांग बच्चों के अलग-अलग अधिकार हैं और 370 अनुच्छेद के बाद ये कानून हमारे केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में भी लागू हैं, उदाहरण के तौर पर समावेशी शिक्षा ( सभी को समान शिक्षा) RPWD अधिनियम 2016 में एक महत्वपूर्ण कानून है । ज़हीर बताते हैं कि संविधान के तहत विशेष रूप से विकलांग / दिव्यांग बच्चों को निम्नलिखित मौलिक अधिकारों की गारंटी दी गई है। साथ ही वह बताते हैं कि संविधान ने विकलांगों सहित सभी नागरिकों को, न्याय का अधिकार, विचारों की अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता, श्रद्धा और पूजा, समान दर्जे और अवसर की समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए इन सभी अधिकारों की सुरक्षा दी है ।

अयान ज़फ़र केवल 50% नेत्रहीन है और वह दिल्ली पब्लिक स्कूल श्रीनगर अथवा जन ऑफ़ लर्निंग रिसोर्स सेंटर विभाग का छात्र है। यह मामला उसके साथ हुई एक बड़ी दुर्घटना का है । जब हमने उसके माता पिता से उस बारे में चर्चा की तो उन्होंने बताया कि अयान के अनुसार 19 जून 2019 को जब वह स्कूल परिसर में एक विभाग से दूसरे विभाग में अपनी उर्दू कि नोटबुक को लेने के लिए जा रहा था तो, उनके एक शिक्षक उसका पीछा कर रहे थे अर्थात उसके पीछे पीछे चल रहे थे , शिक्षक ने अयान को कहा कि तुम चलो और मैं तुम्हारे पीछे हूँ ।

सुबह करीब 11:30 बजे जब अयान स्कूल परिसर में ज़ेबरा क्रॉसिंग पर था और वह पार करने ही वाला था कि एक बस उसके पास आ गई । वह बस स्कूल बस थी और पूरी रफ़्तार में थी। अयान के अनुसार उसने अपने शिक्षक को आवाज़ लगाई और ड्राइवर को भी जोर से कहा प्लीज रुक जाओ , मेरी मदद करो , प्लीज़ अंकल रुक जाओ प्लीज़, मगर बस ड्राइवर के मन में बच्चे को बचाने की कोई इच्छा नहीं थी। वह अयान की तरफ तेज़ी से आया तो अयान बस के नीचे आ गया, जिसके कारण एक बड़ा हादसा हो गया था। इस हादसे के कारण अयान चलने फिरने में असक्षम है अर्थात लॉकमोटोर विकलांगता से ग्रसित हो गया है और अब एक साल से बिस्तर पर है।

इसी बीच कोई भी अयान के माता-पिता को नैतिक और सामाजिक रूप से मदद करने के लिए आगे नहीं आता । जब अयान के साथ यह दुर्घटना हुई तो स्कूल के अधिकारी ने उसे पास के अहमद का अस्पताल नामक अस्पताल में के गए । उसके बाद माता-पिता को अयान के बारे में सूचित किया गया, लेकिन उन्हें उनके बच्चे के बारे में वास्तविक जानकारी नहीं दी गई थी और साथ ही अस्पताल ने पुलिस को शामिल किए बिना बच्चे का इलाज किया । क्योंकि यह चिकित्सा कानूनी मामला था। उसके बाद माता-पिता एक एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन के गए, लेकिन वहां के तथाकथित एसएचओ ने उनकी एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया और कहा कि स्कूल और माता-पिता इसे आपस में ही सुलझाएं। साथ ही अयान के माता पिता इस बात से भी हैरान हुए की जब स्कूल ने अपने ड्राइवर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए कहा तो फटाफट से उनकी रिपोर्ट दर्ज कर कि हुए लेकिन अयान के माता पिता द्वारा स्कूल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में पुलिस ने उनकी कोई मदद नहीं की।

इन सब बातों से वे निराश हो गए और अयान कि सेहत और ख्याल रखने में व्यस्त हो गए, उन्होंने भारत के लगभग सभी बड़े अस्पतालों जैसे कोकिलाबहन मुंबई, बॉम्बे अस्पताल गए, और उसके बाद तमिल नाडु का भी गए। उस समय उनके बच्चे के जीवन को बचाने के लिए स्कूल प्रबंधन ने उन्हें कहा कि हम अयान के सभी चिकित्सीय खर्च वहन करेंगे और साथ ही हम उसे 12 वीं कक्षा तक प्रायोजक शिक्षा अर्थात् एक तरह से मुफ्त शिक्षा देने में सहायता करेंगे। लेकिन ये शब्द उस समय कहीं गायब हो गए जब अयान के माता पिता अस्पताल में जो कश्मीर घाटी से बाहर है , वहां इलाज के दौरान वित्तीय संकट महसूस करते हैं । उन्होंने स्कूल के अधिकारियों को अपनी तरफ से एक लिखित प्रतिनिधित्व संदेश भेजा । लेकिन इस मामले में कुछ भी सकारात्मक नतीजा नहीं मिला। डॉ.चिंतन सरना कहते हैं कि एक दुखद पहलू के साथ मैं यहां इस बात का उल्लेख करना चाहूंगा कि किसी भी पत्रकार ने इस मामले पर अपनी आवाज नहीं उठाई, किसी ने भी अखबार ने इस मुद्दे को नहीं उठाया, किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता ने इस मुद्दे को नहीं उठाया । हम अपने सामाजिक कार्यकर्ताओं, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं , पत्रकारों, अखबारों आदि से बहुत निराश हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी इन दिव्यांग बच्चों की खातिर आवाज़ उठाने के लिए आगे नहीं आता है। ना ही मेरे इस बच्चे के लिए जो पिछले एक साल से बिस्तर पर लेटा हुआ है।

अयान के माता-पिता के अनुसार अयान ने कभी व्हील चेयर नहीं देखी और वह केवल दृश्य विकलांग था अर्थात् उसकी आंखो की शक्ति कमजोर थी। लेकिन स्कूल और शिक्षक की लापरवाही के कारण वह चलने फिरने में दूसरों पर आश्रित हो गया है और व्हील चेयर और स्टैंड का उपयोग करने लगा है। हम केवल न्याय चाहते हैं ताकि हम अपने बच्चे का भविष्य बचा सकें।

डॉ. सरना आगे बताते हैं कि जब अयान के माता पिता को हमारे बारे यानी कि डॉ. चिंतन सरना, मुदासिर शाबान, ज़हीर जान के बारे में पता चला तो उन्होंने हमसे संपर्क किया और इस मुद्दे को उठाने और उन्हें अयान को न्याय दिलाने में मदद करने का अनुरोध किया। हमने उन्हें आश्वासन दिया कि हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे और हम अयान की आवाज उठाएंगे। हमें उम्मीद है कि हम इस बच्चे को उसके अधिकारों दिलवा सकते हैं। साथ ही डॉ. सरना आगे कहते हैं कि फिर हमने आम जनता से, हमारी सरकार के अधिकारी और सभी संबंधित कार्यकर्ताओं से अनुरोध करते हैं कि कृपया इस मामले का समर्थन करें, ताकि भविष्य में किसी अन्य बच्चे को किसी भी स्कूल में ऐसी समस्याओं का सामना न करना पड़े। आखिरकार कुछ बाहरी लोग जैसे रूबी सिंह, मुंबई से पंजक मारू, मुंबई से मिस्टर बुजुर सामने आए हैं और वे माता-पिता की मदद करने के लिए मार्गदर्शन करने में हमारी मदद करते हैं। उसके बाद डॉ. सरना बताते हैं कि हमने सामाजिक न्याय मंत्रालय और विकलांगों के मुख्य आयुक्त के साथ नई दिल्ली में संपर्क किया और उन्होंने माता-पिता की शिकायत को स्वीकार कर लिया और मुख्य न्यायाधीश की अदालत में मामला दर्ज किया और उसके बाद वो 1 सप्ताह से अंदर ही डीजी पुलिस को पत्र भेजते हैं जिसमें वो पुलिस से इस मामले की जांच करने के लिए कहते हैं और साथ ही स्कूल को भी मुआवजे और भविष्य में अयान कि शिक्षा की सुविधा से संबंधित एक पत्र भेजते हैं।

अंत में डॉ. सरना स्कूल से अपील करते हुए कहते हैं कि हम आशा करते हैं कि स्कूल अयान को न्याय दिलाने और उसकी शिक्षा और मुआवजे के लिए उसकी मदद करेगा। हम अनुरोध करते हैं कि सभी उसके माता-पिता के दर्द को समझें और आगे आएं और मुआवजे में माता-पिता की मदद करें और उस बच्चे की भविष्य की शिक्षा को प्रायोजित करें तथा उसकी मदद करें शिक्षा प्राप्त करने में ताकि यह बच्चा अपने आने वाले जीवन को गरिमा के साथ जी सके।

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