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वैकल्पिक राजनीति – उम्मीद की किरण

वैकल्पिक राजनीति का अर्थ दशकों पहले राजनीति में जो गिरावट आयी उसमे गुणात्मक सुधार करते हुए राजनीति को मूल्यों और मुद्दों की पटरी पर पुनः स्थापित करना है

(Alternative Politics-वैकल्पिक राजनीति) देश की राजनीति पर जब हम नजर डालते हैं तो मन में निराशा और खिन्नता उत्पन्न होती है। राजनैतिक दलों में नीति और नीयत का भेद समाप्त हो गया है। राजनीति केवल सत्ता हथियाने का साधन बन गयी है।

वैकल्पिक राजनीति 

यदि हम राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि किस प्रकार समाज के विभिन्न तबकों व समुदायों के साथ भेदभाव  किया जाता रहा है और यह स्थिति आज भी बनी हुई है।देश भीषण परिस्थितियों से घिरता जा रहा है। राजनैतिक दलों, राजनेताओं, नौकरशाहों और थैलीशाहों ने लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदल दिया है। भ्रष्टाचार ने सारी सीमायें लांघ दी हैं। देश में कानून का राज सिमटता जा रहा है, और अपराधियों में कानून का डर समाप्त हो गया है। आम जनता पर गरीबी, बेकारी और महंगाई की मार बढ़ती जा रही है। भारत में सत्ता के नकारेपन का नतीजा है कि विदेशी ताकतें इस देश की राजनीति और अर्थनीति को बुरी तरह से प्रभावित करने के फिराक में है। ये लोग कारपोरेट सेक्टर की भलाई में ही देश की भलाई मानकर कार्य कर रहे हैं।ऐसे समय में मूकदर्शक बने रहना अपराध् होगा। समय की मांग है कि हम मिलकर वैकल्पिक राजनीति की दिशा पर विचार और पहल करें।

वैकल्पिक राजनीति का अर्थ मात्र एक नया विकल्प राजनीति के क्षेत्र में नहीं है।दशकों पहले राजनीति में जो गिरावट आयी उसमे गुणात्मक सुधार करते हुए राजनीति को मूल्यों और मुद्दों की पटरी पर पुनः स्थापित करना ही वैकल्पिक राजनीति का उद्देश्य है | इस नयी राजनीति में व्यक्ति की प्रमुखता के स्थान पर व्यक्तित्व की प्रमुखता और राजनीति को व्यवसाय ना मानकर सेवा कार्य के रूप में स्वीकार्यता ही लक्ष्य होगा। मूल रूप से यदि कहा जाए तो वैकल्पिक राजनीति एक ऐसा तरीका है जिसमें केवल समाज और जनता के हित और अहितों को ध्यान में रखकर निर्णय लिए जाएं ना कि किसी क्षेत्र व व्यक्ति विशेष को देखकर ।       

 राजनीति के इस नए स्वरूप को सामने लाने का मुख्य कारण है आज की बिगड़ती हुए राजनैतिक व्यवस्था । आम जनता का विश्वास राजनीति से उठता जा रहा है ।सरकार के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन से आम जनता में असंतोष और आक्रोश बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने वाली संवैधनिक संस्थाओं को भी पंगु करने की कोशिश की जा रही हैं। ऐसे समय में आवश्यक है कि फिर से दोबारा एक नवीन राजनीतिक ढांचे का निर्माण किया जाए ताकि लोगो का राजनीति और लोकतंत्र में विश्वास बना रहे ।  । देश की राजनीति पर जब हम नजर डालते हैं तो मन में निराशा और खिन्नता उत्पन्न होती है। राजनैतिक दलों में नीति और नीयत का भेद समाप्त हो गया है। राजनीति केवल सत्ता हथियाने का साधन बन गयी है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि देश की संप्रभुता, अखंडता और एकात्मता खतरे में पड़ गयी है।       

अन्य एक और कारण है जिसका फायदा उठा कर राजनीतिक दल राजनेता जनता के हितों को हाशिए पर रख अपने हितों की पूर्ति करते हैं । वह  समाज के विभिन्न समुदायों व जातियों के साथ भेदभाव करते हैं । जब हम हाशिए पर खड़े समाज की बात करते हैं तो इस संदर्भ में मुख्य रूप से महिलाएं , अल्पसंख्यक , निम्न जाति के लोग व गरीब वर्ग की जनता शामिल हैं। जाती – पति , छुआछूत , लैंगिक विभिन्नता, धर्म  और सामाजिक विभिन्नता को लेकर ये दल सदैव लोगों के साथ पक्षपात की राजनीति का खेल खेलते हैं । ऊपरी रूप से पार्टियों द्वारा इन वर्गों के विकास के लिए अनेक योजनाएं बनाई और लागू की जाती हैं किन्तु आंतरिक रूप से इन्हीं के माध्यम से ये पार्टियां अपने स्वार्थ को भ्रष्टाचार के माध्यम से पूर्ण करते हैं ।          

यही परिस्थिति हमें वैकल्पिक राजनीति पर विचार करने पर मजबूर कर रही है। किन्तु किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पूर्व हमें उसके सभी पहलुओं पर विचार करना पड़ेगा। यदि हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल होना है और  तत्कालिक राजनीतिक दलों की तरह राजनैतिक गिरोह बनने से बचना भी है, तो हमें कुछ बातों पर पहले विचार विमर्श कर लेना होगा। मुख्य तौर पर वैकल्पिक राजनीति की दिशा तय करने के लिए हमें कुछ अहम बातों पर विचार करना होगा –

• वैकल्पिक राजनीति का एजेण्डा क्या होना चाहिए  ?

•  वैकल्पिक राजनीति के संगठन की निर्माण पद्धति और कार्यपद्धति क्या हो सकती है?

•  वैकल्पिक राजनीति के लिए इस संगठन में जिन लोगों को शामिल किया जाएगा उनके लिए आचारसंहिता व नियम क्या होंगे ?

• वैकल्पिक राजनीति से भविष्य में क्या क्या संभावनाएं उभर कर सामने आ सकती हैं , चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक ,प्रत्येक पहलू को साथ लेकर चलना होगा ।

• वैकल्पिक राजनीति से हम कौन से अहम मुद्दों व लक्ष्यों की प्राप्ति करना चाहते हैं।

हम वैकल्पिक राजनीति से क्या प्राप्त करना चाहते हैं इस बारे में निम्न बातें उल्लेखनीय हैं:-

1. भारत में विकास का स्वरूप मानवकेंद्रित न होकर प्रकृतिकेंद्रित समेकित विकास हो।

2. देश स्वयं की अपनी एक विशेष पहचान रखे ।

3. समृद्धि , विकास ,संपन्नता और सांस्कृतिक अस्तित्व का संतुलन बना रहे।

4. भारत के प्रत्येक नागरिक को ईमान की रोटी और इज्जत की जिन्दगी उपलब्ध हो। इसमें वंचितों को प्राथमिकता मिले। 

5. समाज में होने वाला शोषण, भेदभाव  और विषमता दूर हो।

6. देश में न्याय और एकता स्थापित हो।

7. देश में भ्रष्टाचार समाप्त करना है। भ्रष्टाचार का कारण वर्तमान व्यवस्था के दोष हैं। उन दोषों को दूर किया जाये।

8. देश की राजनीति को मूल्यों और मुद्दों को पहले की तरह मुख्य धुरी पर वापस लाया जाये। इसके लिए दोषपूर्ण चुनाव प्रणाली में सुधार पहली प्राथमिकता हो।

9. भारत विश्व में गौरवशाली पद पर पुर्नप्रतिष्ठित हो।

स्वातंत्रयोत्तर देश में वैकल्पिक पार्टियां तो बहुतायत में आईं, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति से अलग वैकल्पिक राजनीति कोई नहीं दे पाया- जिसकी इस देश को हमेशा से दरकार रही।यह भी सही है कि पार्टी के अंदर एक व्यक्ति की प्रसिद्धि पार्टी को आगे बढ़ाने में मदद देती है, लेकिन इससे कालांतर में व्यक्ति प्रमुख और पार्टी गौण हो जाती है। फिर लोग पार्टी को उसकी विचारधारा से नहीं, नेता के नाम से जानते हैं। वैकल्पिक राजनीति विचारधारा के फैलाव से पनपती है, वोटों के पैमाने से तो वैकल्पिक पार्टी भर निकलती है। वैकल्पिक राजनीति में वोट तो सिर्फ एक अंग भर होगा, उसमें सतत संघर्ष और निर्माण की एक अहम भूमिका होगी; वह मूल्यों पर आधारित होगी। वैकल्पिक राजनीति का मूलमंत्र है-

1. एक  लोकोन्मुखी सरकार का निर्माण।               

2. जो हर व्यक्ति को सामान अधिकार दे               

3.आर्थिक, सामाजिक, लिंग, वर्ग, भाषा- हर तरह के भेदभाव का अंत करे।

यह राजनीति देश के सूदूर इलाकों में आदिवासी, दलित, मजदूर, किसानों, महिलाओं के अन्याय के खिलाफ जारी जनांदोलनों से उपजी ऊर्जा से निर्मित होगी। क्योंकि कहीं न कहीं इन्हीं लोगों और समुदायों को सबसे ज्यादा भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है।देश में अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को जिस तरह कुचला जा रहा है उसे देख यह आवश्यक हो गया है कि अब हमें एक नए स्वरूप की आवश्यकता है। इस कार्य में केवल ग्रामीण क्षेत्रों, अल्पसंख्यक समुदायों की ही नहीं अपितु शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के सहयोग और सक्रिय भागीदारी की जरूरत भी होगी- जिसके लिए उन्हें अपने स्वयं की फिक्र छोड़, निस्वार्थी बन  देश के दूरस्थ इलाकों में बदलाव के काम का सघन क्षेत्र बनाना होगा। इस कदम कि सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी :-

•दबे हुए तबके को बदलाव की राजनीति में सक्रिय करना तथा उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना;

•दूसरे के कहने से वोट देने से रोकना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, आदिवासी, दलितों और मजदूरों की बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करना।लेकिन बदलाव की राजनीति में हमें व्यवहार्यता और दृश्यता के दबाव से बाहर आकर विचारधारा पर ध्यान देना होगा अर्थात् हमे सदियों से चली आ रही राजनैतिक परम्पराओं को एक नया रूप देकर उनमें बदलाव लाकर सामने लाना होगा । क्योंकि परम्पराओं को पूर्णतया नष्ट करना संभव नहीं है किन्तु उनमें स्तरात्मक और सकारात्मक रूप से बदलाव लाए जा सकते हैं।

यदि राजनीति का यह स्वरूप संपूर्ण जन मानस के अधिकारों और हितों को ध्यान में रखकर जन कल्याण के कार्य को करने में समर्थ हो जाता है तो भविष्य में इस राजनीतिक स्वरूप को बिना किसी संदेह के अपनाया जाएगा ।किन्तु यदि यह स्वरूप पहले की तरह केवल एक बुलबुले कि भांति कुछ समय तक टिकेगा और बाद में फुट जाएगा तो जनता का विश्वास राजनीति से उठने में ज्यादा देर नहीं लगेगी । जिसका परिणाम देश के हित में नहीं होगा । अतः जनता तथा राजनीतिक दलों व राजनेताओं सभी को साथ मिलकर देश कल्याण के हित में सोचना शुरू न कि केवल स्वार्थ और स्वयं हित के लिए। 

 

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