in , ,

मानव जाति का अहंकार : बेजुबानों पर अत्याचार

आज खुद को आधुनिक कहने वाला समाज इस शोषण शब्द के दायरे में ऐसे ऐसे कार्यों को शामिल कर रहा है जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की गयी होगी। 

शोषण की परंपरा

न जाने कितने ही युग बीत गए हैं किंतु शोषण और शोषक इस समाज से कभी भी समाप्त न हो सके। समय बदलता रहा और इस बदलते हुए समय के साथ शोषण, शोषक और शोषित इन तीनों की स्थितियों में भी बदलाव आया। आज खुद को आधुनिक कहने वाला समाज इस शोषण शब्द के दायरे में ऐसे ऐसे कार्यों को शामिल कर रहा है जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की गयी होगी। 

हमारी सबसे प्राचीन सभ्यता से हमें पता लगता है की मानव जाती आरंभ से ही केवल पेड़ पौधों और जानवरों की पूजा करती आई है। उन्होंने हर तरह से अपना जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर आश्रित होकर ही व्यतीत किया। इससे पहले केवल आदिमानव ही एक ऐसी प्रजाति है, जिसने जानवरों और पेडों को अपनी सुविधानुसार प्रयोग किया। अर्थात् इन्होंने जानवरों का शिकार किया और घर व रास्ते बनाने के लिए पेडों को काटा।  किंतु आज का मानव लगातार विकास के नाम पर प्रकृति का शोषण कर रहा है। साथ ही जानवरों का शोषण भी न केवल दैनिक आवश्यकताओं बल्कि अन्य स्वार्थों के लिए भी कर रहा है। 

किंतु आज का यह युग जो विज्ञान और तकनीकों से युक्त है, स्वयं को प्रकृति और पर्यावरण एवं उनसे जुड़े हर पहलू से ऊँचा मानता है। इसी कारण उसे लगता है कि वह अपनी मानसिक योग्यता और ज्ञान के बल पर जो चाहे कर सकता है। जब से मनुष्य ने बल का प्रयोग सिखा है वह कमजोर और बेजुबान को केवल एक वस्तु के समान समझता है। फिर चाहे वह मनुष्य हो या जानवर। वह किसी का भी शोषण करने से पीछे नहीं हटता। 

बेजुबानों का शोषण

शोषण शब्द कानों में पड़ते ही हमें एक व्यक्ति की तकलीफ, दुख और पीड़ा का अहसास होता है । हमारे मन में किसी महिला, पुरुष या बच्चों की छवि हमारी नजरों के सामने उभर कर आती है। मगर क्या सच में इस संसार में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसका शोषण हो सकता है? नहीं! कुछ और बेजुबान प्राणी है इस पृथ्वी पर जिनका हम मनुष्यों द्वारा ही शोषण किया जाता है। हम उन्हें कभी पालतू जानवर, कभी जंगली जानवर या आवारा जानवर कह कर बुलाते हैं। कभी कभी जान बूझ कर और कभी अंजाने में हम इन जानवरों का शोषण करते हैं। 

मनुष्य का अहंकार

मनुष्य और जानवर के बीच अनेकों भेद हैं जो उन्हें एक दूसरे से अलग करते हैं। किंतु सबसे बड़ा अंतर है अहंकार और घमण्ड का। मनुष्य को हमेशा इस बात का घमण्ड रहता है कि वह सबसे बुद्धिमान है। जैसा वह चाहता है वस्तुओं और अन्य जीवों को उसी प्रकार ढलना होगा। मनुष्य के अंदर का यह अहंकार बहुत गहरा है और जो कोई हम मनुष्यों के जैसा नहीं है, उसको हम समझते हैं — तुच्छ!

हम पूरी प्रकृति का सिर्फ शोषण करते हैं और वो हम सिर्फ इसी अहंकार में करते हैं कि हम पूरी प्रकृति से ऊपर हैं, श्रेष्ठ हैं। 

आवश्यकताओं की अधिकता

अपनी बुद्धिमता के प्रदर्शन और वैज्ञानिक शोध के लिए भी जानवरों को मारा जाता है। फ़र, चमडा, हड्डियों आदि इस तरह की और चीज़ों के लिए भी जनवरों को मारा जाता है और इस सब मारने के पीछे आदमी का अहंकार है कि मेरे कपड़े , खाने, दवाइयों और अन्य शौक के लिए अगर किसी की जान जाती है तो कोई दिक्कत नहीं। 

न जाने कितनी ही प्रजातियाँ धरती से खत्म हो जाती हैं क्योंकि या तो मानव उनके रहने के इलाके खत्म कर देते हैं या उनका तब तक शिकार करते हैं जब तक वह खत्म नहीं हो जाते। ऐसे में फिर देश की सरकारें और  वन्य जीव विभाग, पर्यावरण संरक्षण विभाग चिंता जाहिर करते है और नियम बनाते हैं।क्या चिड़ियाघर या नेशनल पार्क और सरकार के आधे अधूरे नियम इन्हें खत्म होने से बचा सकते हैं? 

आज कई जानवरों के रहने के इलाके कम होने लगे हैं। सात अरब से ज्यादा लोगों के लिए खाने पीने के सामान की जरूरत पड़ती है और इसके लिए लगातार जंगलों को खेतों में बदला जा रहा है और जानवरों के रहने की जगह कम हो रही है। इस तरह हम जंगली जानवरों से उनके रहने के स्थान छीन कर उन जानवरों का शोषण करते हैं। 

जंगली जानवर और पालतू जानवर के साथ मनुष्य के संबंध

हालांकि जंगली जानवरों से मनुष्य का रिश्ता उतना गहरा नही है। वह उन्हें केवल शिकार , औषधियों तथा अपने अन्य स्वार्थों के लिए ही इस्तेमाल करता है। मगर फिर पालतू पशुओं या जानवरों से प्रेम का दिखावा क्यों करता है। आखिर दोनों हैं तो जानवर ही। 

मनुष्य कुत्तों, खरगोश, गाँय, भैंस, बिल्लियों आदि को पालतू रखता है। उन्हें परिवार के सदस्य के समान मानता है। किंतु ऐसे कितने ही इंसान हैं जो सड़क पर घूमने वाले और घर के पालतू जानवर के साथ समान रूप से व्यवहार करते हैं? बहुत ही कम! इंसान के लिए केवल वही सही है जो उसे सही लगता है। सड़क पर घूमने वाले जानवर उसे खतरनाक लगते हैं। 

स्वार्थ से लिपटी मानव जाति

मनुष्य को जब तक जरूरत होती है वह इन जानवरों का प्रयोग करता है। फिर उसके बाद उन्हें मरने के लिए खुला छोड़ देता है। कितने ही ऐसे बूढ़े बैल, गाँय , भैंस और अन्य जानवर हमें सड़क पर देखने को मिलते हैं, जिन्हें उनके मालिकों द्वारा छोड़ दिया जाता है। कभी ये जानवर किसी सड़क हादसे में मर जाते हैं या फिर भूख और बीमारियों से दम तोड़ देते हैं। लेकिन मनुष्य पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसे केवल अपने स्वार्थ से मतलब रहता है। 

जानवरों के साथ बलात्कार

इतना ही नहीं मनुष्य की सोच आज इतनी नीचे गिर गयी है की अब वह इन बेजुबान जानवरों का शारीरिक शोषण भी करने लगे हैं। आजकल गाँय, बकरी, बिल्ली, बछड़ों और अन्य जानवरों के साथ मनुष्य द्वारा किये जाने वाली शारीरिक हिंसा केवल मार पिटाई या शारीरिक पीड़ा देने तक ही सीमित नही रह गयी है।  अब मनुष्य इन बेजुबान जानवरों के साथ बलात्कार जैसा जघन्य पाप भी करने से पीछे नहीं हट रहा। 

जानवरों को बांध कर भूखा रखना और उनको शारीरिक प्रतड़ना देने की खबरें और वीडियो अक्सर देखने को मिलती थी। किंतु आजकल मनुष्य के विचार इतने घिनोने हो गए हैं की अब वह इन जानवरों को केवल उपयोग की वस्तु समझ कर, इनके साथ जो चाहे वह करने की कोशिश करता है। 

इससे कुछ सवाल खड़े होते हैं:

  • क्या मनुष्य सच में बुद्धिमान है? 
  • क्या केवल क्षणिक सुख के लिए इन बेजुबान जानवरों का शोषण करना जायज है? 
  • क्या केवल महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के लिए ही ब्लात्कार जैसे अपराध से बचने के नियम और कानून बनाये जायेंगे? 
  • क्या केवल मानव समाज की सुरक्षा के लिए ही जागरूकता अभियान चलाये जायेंगे? 

जब इससे भी मनुष्य के मन को शांति नहीं मिलती तो अपनी गलतियों को छुपाने के लिए वह बहाने बनाता है। समाज में शाकाहारी और मांसाहारी की दलीलें देता है। धर्म के नाम पर दी जाने वाली बली आदि की आड़ लेकर खुद को बचाने का प्रयास करता है। किंतु पर्यावरण चक्र किसी से छुपी हुई बात नहीं है। प्रकृति में एक जीव दूसरे जीव पर निर्भर रहता है यह सत्य है। किंतु इस तथ्य की आड़ लेकर, केवल मासूम जानवरों को ही बलि का बकरा बनाना कहाँ तक ठीक है? 

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

Comments

0 comments