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बीहड़ में साइकिल – समीक्षा

पढ़ते-पढ़ते आपकी आँखें गीली हो जाएँ, ऐसी सैकड़ों दास्तान इस डायरी में शामिल हैं। बीहड़ में सूखे की मार से लोग दाने-दाने को मोहताज हैं।

मैंने आज तक तमाम पत्रकारों को देखा है और उनमें से काफी पत्रकारों से मिलना भी हुआ है, लेकिन इतना ज़मीनी, जुझारू और जिंदादिल कोई पत्रकार शायद ही देखा हो। मैं यह बड़े गर्व से कह सकता हूँ कि वह पत्रकार कोई और नहीं बल्कि मेरे साथी शाह आलम हैं। मैं उनसे कई बरस से जुड़ा हूँ। उनके साथ उठना-बैठना काम करना होता रहता है। तक़रीबन हर रोज़ बात भी होती है… लेकिन उनका ज़मीन से इतना गहरा जुड़ाव है, मुझे नहीं मालूम था। …एक साधारण पृष्ठभूमि वाले परिवार में अयोध्या के निकट बस्ती जनपद में जन्में इस दुबले से पत्रकार का यह विराट रूप वैसे तो मैं कई वर्षों से देख रहा हूँ, लेकिन उनके द्वारा लिखा गया इतना विस्तृत कोई लेख पहली बार पढ़ा। उनका जन्म अवध में हुआ, लेकिन उनका कर्मक्षेत्र चम्बल क्षेत्र है और मेरा जन्म इसी क्षेत्र के किनारे इटावा जनपद की सीमाओं में हुआ है। पारिवारिक पृष्ठभूमि तक़रीबन वही कि हर रोज कुआँ खोदकर पानी पीना, शायद इसलिए भी यह दिल का जुड़ाव बहुत ज्यादा है।

ख़ैर! यह पुस्तक ‘बीहड़ में साइकिल’ उनकी दूसरी पुस्तक है। इसके पहले ‘मातृवेदी : बागियों की अमर गाथा’ नामक पुस्तक भी उनके द्वारा लिखी जा चुकी है। वैसे यह पुस्तक कम और लेखक की एक यात्रा डायरी ज्यादा है, बल्कि कहूँ तो चम्बल क्षेत्र की क़दम दर क़दम की ज़मीनी रिपोर्ट है। …कोई भी सरकार, प्रशासन अगर चम्बल की बदहाली पर काम करना चाहती है, तो उसके लिए यह पुस्तक बहुत मुफ़ीद हो सकती है। चूंकि अन्य पत्रकार बड़ी-बड़ी गाड़ियों से शहर कस्बों में बैठकर रिपोर्टिंग करते है, वो उस दर्द को कभी महसूस कर ही नहीं सकते जो इस लेखक ने साधारण साइकिल पर फटेहाली में झोपड़ी दर झोपड़ी, दरवाजे दर दरवाजे, खार-मंझार, भरखों, टीलों तलहटी, बिलायती बबूल के जंगलों में जाकर महसूस की है। लेखक की यह यात्रा 29 मई 2016 को औरैया शहर के क्रांतिवीरों के सेनापति गेंदालाल दीक्षित के नाम से पहचाने जाने वाले चौराहे से प्रारम्भ होती है और सबसे पहले लखनपुर के आसपास अग्नि प्रभावित गांवों का जायजा ले फिर मुरादगंज बिरुहनी अजीतमल से बीहड़ की ओर रूख करती है। पढ़ते-पढ़ते आपकी आँखें गीली हो जाएँ, ऐसी सैकड़ों दास्तान इस डायरी में शामिल हैं।

बीहड़ में सूखे की मार से लोग दाने-दाने को मोहताज हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित चम्बल घाटी की पगडंडी, झोपड़ी, गली, कूँचे को अपने में शामिल करती है। यह साइकिल फिर जगम्मनपुर जालौन, महोबा, झांसी, भिंड, मुरैना, ग्वालियर, आगरा बाह, धौलपुर, मथुरा, फिरोजाबाद, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज होते हुए 23 जुलाई 2016 को तकरीबन 2800 किलोमीटर की यात्रा अकेले ही तय करते कानपुर में पूरी होती है। …बिना पैसे बिना, राशन, बिना कोई सरकारी या संस्थागत मदद के इतनी बड़ी यात्रा कोई विरला ही कर सका होगा। सैकड़ों ऐसे वाक्य हैं जो रोंगटे खड़े कर दें, रास्ते मे लेखक को दादी माँ के निधन की खबर मिलती है वह खबर भी लेखक को वही रुलाकर तसल्ली करने को कहती है, हिम्मत से काम लेते हुए लेखक ने चंबल के तमाम क्रांतिकारियों, आजादी आंदोलन के रणबांकुरे परिवारों की बदहाली को कवर किया है। दर्जनों बागियों के परिवारों की तंगहाली को कवर किया है। अपनी इस यात्रा में क्या लेखक ने बिना भेदभाव क्या स्वर्ण, क्या दलित हजारों घरों में हो रहे फांके को कवर किया है। इतना बेइंतहा दर्द कि रुलाई छूट जाए। कैसे लेखक ने यह दुखांत कवर किया होगा, उन्ही झोपड़ियों में रातें गुजारी, रूखा-सूखा खाकर तो कभी भूखा रहकर उन लोगों के दर्द को डायरी में समेटने की कोशिश की। इसका सही अंदाज़ किताब पढ़कर ही लगाया जा सकता है।

खैर! पुस्तक हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जो संवेदनशील है, फिल्मों से इतर चम्बल को समझना चाहता है, तमाम क्रांतिकारियों से रूबरू होना चाहता है, जिनको तुम डकैत कहते हो उनके पीछे के दर्द और संत्रास के कारणों को समझना चाहता है अथवा जो शासन-प्रशासन में होकर चम्बल क्षेत्र के लिए कुछ करना चाहता है, उसे इसे अवश्य पढ़ना चाहिए।

पुस्तक : बीहड़ में साइकिल/लेखक : शाह आलम/भाषा : हिन्दी/विधा : यात्रा वृत्तांत/ प्रकाशक: चंबल फाउंडेशन/पृष्ठ : 200/मूल्य : 225 रुपये

सम्प्रति : समीक्षक योगेश यादव जामिया मिल्लिया से पढ़े है और दिल्ली मेट्रो में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।

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