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बाईसेक्शुअलिटी : लड़कियों के लिए एक समस्या

बाइसेक्शुअल लड़कियों को पुरुष वर्ग कई बार महज सेक्शुअल फ़ैंटेसी से जोड़कर देखता है। जो भी लडकी अपनी  सेक्शुअलिटी के बारे में खुलकर बात करती हैं तो लोग उनके बारे में कई धारणाएं बना लेते हैं।

आज हमारा देश समाज के हर वर्ग को समान अधिकार प्रदान करने में लगा हुआ है। हाल ही में एलजीबीटी समुदाय , गे ,लेस्बियन इन समुदायों के अधिकारों के लिए अनेक कदम उठाए गए। लेकिन समाज ने इन्हें आज भी पूरी तरह नहीं अपनाया है।आज भी ऐसे अनेक पुरुष तथा महिलाएं हैं जो समाज के डर से अपनी सेक्शुअलिटी को दबा के रखते हैं। सबसे अधिक परेशानी बाईसेक्शुअल समुदाय को झेलनी पड़ती हैं। इन में पुरुषों से अधिक महिलाएं इस विषय पर चुप रहती हैं ।

हमारे समाज में लड़कियों का अपनी सेक्शुअलिटी ज़ाहिर करना अपने-आप में ही काफ़ी मुश्किल होता है।क्योंकि समाज और परिवार द्वारा आपसे ऐसे बर्ताव करने की उम्मीद की जाती है, जैसे आपमें यौन इच्छाएं ही नहीं हैं। ऐसे में आपके लड़के और लड़की दोनों को पसंद करने की बात तो लोग बिल्कुल स्वीकार नहीं कर पाते। क्योंकि समाज कि सदियों से चली आ रही सोच इस बात को स्वीकार नहीं करती है ।

इसका दूसरा बड़ा कारण है जानकारी का न होना। क्योंकि हमारे आस-पास के माहौल में पुरुष और स्त्री के साथ के आलावा किसी और सेक्शुअलिटी का न तो कोई ज़िक्र होता है और न कोई चित्रण। फ़िल्मों और कहानियों से लेकर विज्ञापनों तक, हर जगह सिर्फ़ एक महिला और पुरुष को ही साथ दिखाया जाता है। ऐसे में हम ये मान लेते हैं कि सिर्फ़ वही सही है और सिर्फ़ वही साधारण है ।क्योंकि हमारे समाज के अनुसार यही सही है।

इस तरह के एक संकुचित समाज में किसी लड़की का बाइसेक्शुअल पहचान के साथ जीना आसान नहीं है। क्योंकि उसका खुद का परिवार ही कभी कभी उसके इन विचारों से सहमत नहीं होता । ऐसे में वह बाहरी दुनिया से क्या उम्मीद रख सकती है। हर बार की तरह इस विषय को लेकर भी लड़कियों की सोच को दबाया जाता है। समाज और रिश्तेदारों के डर तथा लडकी के भविष्य की सोचकर माता पिता उसके इस विचार या फैसले को कभी स्वीकृति नहीं देते। बल्कि उसे समझाते हैं कि यह केवल उसके विचार हैं जो कुछ समय बाद अपने आप खत्म हो जाएंगे।

खैर बाहरी दुनिया तो दूर की बात है , ख़ुद एलजीबीटी समुदाय के भीतर बाइसेक्शुअल लोगों को लेकर कई तरह की शंकाएं और ग़लत अवधारणाएं हैं। नतीजन, उन्हें समुदाय के भीतर भी कई तरह के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। एलजीबीटी समुदाय के बहुत से लोगों को ये लगता है कि बाइसेक्शुअल लोग रिश्ते में वफ़ादार नहीं होते । लोग मानते हैं कि बाइसेक्शुअल लोगों को पुरुषों और महिलाओं दोनों से आकर्षण होता है इसलिए वो अपनी सुविधा के हिसाब से रिश्ते तय करते हैं।

आम तौर पर लेस्बियन लड़की किसी बाइसेक्शुअल लड़की के साथ रिश्ते में नहीं आना चाहती क्योंकि उसे लगता है कि बाइसेक्शुअल लड़की उसे डेट ज़रूर करेगी लेकिन जब शादी करने या ज़िंदगी भर साथ निभाने की बात आएगी तो वो अपनी सुविधा और समाज के उसूलों के मुताबिक़ किसी लड़के का हाथ थाम लेगी। ऐसा ही कुछ बाइसेक्शुअल लड़कों के बारे में भी सोचा जाता है। क्योंकि हमारा समाज आज भी शादी के लिए पुरुष और स्त्री की जोड़ी को ही सर्वोत्तम मानता है।

इतना ही नहीं, बाइसेक्शुअल लोगों को कई बार ‘लालची’ और ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है जो रिश्ते में कमिटमेंट नहीं करना चाहते, किसी एक जगह टिकना नहीं चाहते लेकिन डेट सबको करना चाहते हैं। ये भी कहा जाता है कि हम अपनी सेक्शुअलिटी के लेकर भ्रमित हैं और ये महज एक दौर है जो बीत जाएगा। वह जैसे हैं, उन्हें वैसे स्वीकार नहीं किया जाता बल्कि हमेशा शक़ भरी निगाहों से देखा जाता है।

सबसे ज्यादा परेशानी बाइसेक्शुअल लड़कियों को होती है। क्योंकि बाइसेक्शुअल लड़कियों को पुरुष वर्ग कई बार महज सेक्शुअल फ़ैंटेसी से जोड़कर देखता है। जो भी लडकी अपनी  सेक्शुअलिटी के बारे में खुलकर बात करती हैं तो लोग उनके बारे में कई धारणाएं बना लेते हैं।

गे और लेस्बियन समुदाय ही आजकल अधिक चर्चा में है। जिसकी वजह से  बाइसेक्शुअल लोग नजरंदाज हो रहे हैं । और इसी वजह से वह सामने आने से भी डरते हैं। न जाने समाज उनके बारे में क्या सोचेगा , उनके दोस्त उनके साथ कैसा व्यवहार करेंगे आदि अनेक सवालों से डर कर लोग चुप रह जाते हैं।

मानना है कि एलजीबीटी समुदाय के भीतर लोगों पर किसी न किसी रूप में ये दबाव होता है कि या तो वो ख़ुद को गे मानें या लेस्बियन। क्योंकि बाइसेक्शुअलिटी के बारे में बात करने में लोग बहुत ज़्यादा सहज नहीं होते। इसीलिए कई बार बाइसेक्शुअल लोग दबाव के कारण ख़ुद को गे या लेस्बियन बताते हैं। समुदाय के भीतर बाइसेक्शुअलिटी को यूं जानबूझकर नज़रअंदाज़ करने को जेंडर स्टडी की भाषा में बाइसेक्शुअल इरेज़र (Bisexual erasure) कहते हैं।

समलैंगिकता के मुद्दे पर भी अब धीरे-धीरे फ़िल्में और वेबसिरीज़ बनने लगी हैं लेकिन बाइसेक्शुअलिटी अभी इस चर्चा से बहुत दूर है।

सितंबर, 2018 में जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध ठहराने वाली आईपीसी की धारा 377 को निरस्त कर दिया था । तब तत्कालीन CJI जस्टिस दीपक मिश्रा ने अदालत का फ़ैसला पढ़ते हुए  कहा था-आई एम वॉट आई एम, सो टेक मी ऐज़ आई एम (I am what I am, so take me as I am) । यह वाक्य जर्मन लेखक योहन वॉफ़गैंग का है।

जून महीने को एलजीबीटी समुदाय ‘प्राइड मंथ’ के तौर पर मनाता है। इस दौरान वो अपने संघर्षों, इच्छाओं और उपलब्धियों के बारे में बात करते हैं।

यही वजह है कि इस समय युवा बाइसेक्शुअल लड़कियां भी कई सामाजिक बेड़ियों को तोड़ती हुई नज़र आ रही हैं। वो मांग कर रही हैं कि उनकी बाइसेक्शुअलिटी को स्वीकार किया जाए, वो जैसी हैं, उन्हें वैसे ही स्वीकार किया जाए।

इतनी मुश्किलों के बाद भी भारत में बाइसेक्शुअल लड़कियां धीरे-धीरे ही सही मगर खुलकर बाहर आने लगी हैं। ख़ासकर, जून के इस महीने (प्राइड मंथ) में कई लड़कियों ने सोशल मीडिया पर बेहिचक अपनी सेक्शुअलिटी को कबूला है।

जरूरत है तो सिर्फ पहल करने की । माता पिता को बचपन से ही अपने बच्चों के विचारों को समझना चाहिए और उनके मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखा चाहिए । उन्हें किसी भी ऐसे फैसले के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए जिससे उसके मन में कोई तनाव रहे या डर पैदा हो जाए ।

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