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सीएए विरोध : अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना गुनाह है क्या?

हर उस प्रदर्शनकारी को एक एक कर जेल में डाला जा रहा है जिसे यदि आम दिनों में गिरफ्तार किया जाता तो, सड़कों पर जनता का भारी प्रतिरोध झेलना पड़ सकता था।

यह एक ऐसा समय है जब देश को स्वास्थ्य और भूख के संकट पर ध्यान केंद्रित करना था; और साथ ही हमारी प्राथमिकता वायरस से लड़ने के लिए एकजुट रहना होना चाहिए थी। ऐसे समय में जब लॉकडाउन की वजह से नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का पूरी तरह से उपयोग करने में असमर्थ हैं, राज्य द्वारा सत्ता के किसी भी तरह के दुरुपयोग के ख़िलाफ़ नागरिकों की रक्षा करना सरकार का नैतिक कर्तव्य है।

भले ही पूरे देश में तालाबंदी हो रही हो और लोग नोवेल कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए अपने घरों के अंदर बंद हों, लेकिन दिल्ली पुलिस इस वक़्त का और इन हालात का फ़ायदा उठाती नज़र आ रही है, पुलिस दिल्ली में हुई हिंसा के संबंध में छापे मार रही है और उन लोगों को गिरफ्तार कर रही है जो उत्तर-पूर्वी दिल्ली में विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) और भारतीय नागरिकों के प्रस्तावित राष्ट्रीय रजिस्टर (NRIC) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में शामिल थे।

गिरफ़्तार किए गए लोगों में मीरान हैदर और सफू़रा ज़रगर – जो जामिया मिलिया इस्लामिया में रिसर्च स्कॉलर है और जामिया समन्वय समिति (जेसीसी) के सदस्य है, खा़लिद सैफी़ जैसे कार्यकर्ता और पूर्व में कांग्रेस काउन्सलर रही इशरत जहां भी इसमें शामिल हैं। जेसीसी का गठन जामिया के मौजूदा छात्रों और पूर्व छात्रों ने उस वक़्त किया था, तब जब पुलिस ने पिछले साल दिसंबर में कैंपस में घुसकर सीएए के विरोध प्रदर्शनों पर हिंसा का इस्तेमाल किया था।

इसमें अजीब बात है कि ये है कि ये कार्यवाही ऐसे वक़्त हो रही है, जब देश भर की जेलों से घातक कोविड़-19 के ख़तरे के मद्देनज़र विचाराधीन क़ैदियों को पैरोल पर रिहा किया जा रहा था।

सत्ता का यह चरित्र बीते कई वक़्त की सबसे डरावनी तस्वीर है। जहाँ एक ओर देश इस वैश्विक महामारी से जूझ रहा है वहीं सरकार इसे एक मौक़े की तरह इस्तेमाल कर रही है। जहाँ एक तरफ़ संक्रमण के डर से कई देशों में अंडरट्रायल कैदियों को छोड़ा जा रहा है, वहीं हमारे यहाँ जेल भरने का कार्य शुरू हो चुका है। हर उस प्रदर्शनकारी को एक एक कर जेल में डाला जा रहा है जिसे यदि आम दिनों में गिरफ्तार किया जाता तो, सड़कों पर जनता का भारी प्रतिरोध झेलना पड़ सकता था। अपनी साम्प्रदायिकता और नफ़रत फैलाने के लिए समय-समय पर सरकार हर किसी का इस्तमाल करती रही है।

दिल्ली पुलिस ने उत्तरपूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़काने के आरोप में उमर खा़लिद सहित जामिया के 3 छात्रों पर UAPA यानी कि गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम कानून लगाया है। जामिया एलमनाई एसोसिएशन के प्रेसिडेंट शिफ़ा उर रहमान भी गिरफ्तार किये गए। इससे पहले जामिया में छात्र नेता मीरन हैदर और जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी की सफू़रा ज़रगर गिरफ्तार की जा चुकी थी। पुलिस इस मामले में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी (JCC), पिंजड़ा तोड़ और ऑल इंडिया स्टूडेन्ट्स ओसोसिएशन (AISA) के कई सदस्यों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर चुकी। पहले भी JNU के छात्र शरजील ईमाम के भाषण के एक अंश पर कारवाई करते हुए राजद्रोह का मुकदमा दायर कर गिरफ़्तार किया गया था। भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़काने के आरोप में मानवाधिकार कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबडे और गौतम नवलखा की गिरफ़्तारी हो चुकी है।

दिल्ली पुलिस ने जामिया में चले शांतिपूर्ण एंटी CAA प्रोटेस्ट्स को दिल्ली दंगे के लिए इन मुस्लिम छात्रों को ज़िम्मेदार ठहराया है। जिसमें अस्सी से नब्बे फीसदी तक का नुक़सान वहाँ मुसलमानों का हुआ है। आज उनकी हालत ऐसी हो गई है कि वो आने वाले दस सालों तक भी खुद को अपनी पुरानी स्थिति में नहीं ला सकते। बार-बार वो यही बताते रहे कि ये बाहर से आये हुए लोग थे। क्या दिल्ली पुलिस ये कहना चाहती है कि मोहल्लों के मुसलमानों ने ही एक दूसरे का क़त्ल कर दिया? देश की अधिकांश जनता हमेशा CAA, NRC के ख़िलाफ़ दिखी और सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक अपना विरोध दर्ज कराती रही। जितनी संख्या में मुसलमान निकले उतनी ही संख्या में और भी धर्म के लोग भी निकले। क्योंकि ये धर्म विशेष पर हमला तो था ही, लेकिन सरकार जिस नफ़रत का बीज बोती रही है उसकी ज़द में कल हर किसी को आना था तो ये लड़ाई संविधान बचाने की भी थी।

मुसलमानों के लिए ये यक़ीनन उनके अस्तित्व का सवाल था तो विरोध भी स्वाभाविक था और उन्हें इसका विरोध करने का भी भरपूर अधिकार है। नॉर्थईस्ट में NRC लागू होने के साथ ही जामिया और देशभर में प्रदर्शन हुए। जामिया बड़े स्तर पर इसके नेतृत्व में दिखी तो दिल्ली पुलिस ने लाइब्रेरी तक में छात्रों को घुसकर मारा। पुलिस ने यूनिवर्सिटी कैंपस में घुसकर गोलियां दागी। मतलब जितना बुरा उनके साथ किया जा सकता था सबकुछ किया गया।

अंत में सवाल यही उठता है कि क्या अपनी पहचान के लिए आवाज़ उठाना गुनाह है? क्या ये सभी गिरफ़्तरियाँ जायज हैं? और आखिर यह सिलसिला कब खत्म होगा?

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