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गाड़ी का धुआं दुनिया में हर पांचवीं मौत का ज़िम्मेदार: हार्वर्ड

वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप हर साल 14 वर्ष से अधिक आयु के 2.5 मिलियन लोगों की मौत हो जाती है। यह आंकड़ा भारत में 14 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की होने वाली सालाना 8 मिलियन मौतों का  लगभग 30 फ़ीसद है। बांग्लादेश, भारत और दक्षिण कोरिया इस संदर्भ में दुनिया में सबसे खराब उदाहरण हैं।

आप और हम जब अपनी पेट्रोल और डीज़ल की गाड़ी में बैठ आराम से इधर से उधर जाते हैं तब हमारी गाड़ी से निकलने वाले धुआं दुनिया में होने वाली हर पांचवीं मौत का ज़िम्मेदार बन जाता है। बात भारत की करें तो यहाँ जीवाश्म ईंधन के उपयोग से होने वाले PM2.5 वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप हर साल 14 वर्ष से अधिक आयु के 2.5 मिलियन लोगों की मौत हो जाती है। यह आंकड़ा भारत में 14 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की होने वाली सालाना 8 मिलियन मौतों का  लगभग 30 फ़ीसद है। बांग्लादेश, भारत और दक्षिण कोरिया इस संदर्भ में दुनिया में सबसे खराब उदाहरण हैं।

ये हैरान करने वाली बातें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम, यूनिवर्सिटी ऑफ लीसेस्‍टर और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के सहयोग से किये गये एक ताज़ा शोध में कही गयी है।

इस शोध से मिले आंकड़े पूर्व में किये गये शोध में अनुमानित संख्‍या से कहीं ज्‍यादा है। इसका मतलब यह है कि कोयला और डीजल जैसे जीवाश्‍म ईंधन को जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण दुनिया में होने वाली हर पांच मौतों में से एक के लिये जिम्‍मेदार है।

जर्नल एनवायरमेंटल रिसर्च में प्रकाशित हुए इस अध्ययन के मुताबिक उत्तरी अमेरिका, यूरोप तथा दक्षिण पूर्वी एशिया समेत जीवाश्म ईंधनजनित वायु प्रदूषण के उच्चतम स्तरों वाले क्षेत्रों में मृत्यु की दर भी सबसे ज्यादा है।

इस अध्ययन में वायु प्रदूषण के कारण मरने वालों की अनुमानित संख्या को काफी हद तक बढ़ाया गया है। वैश्विक स्तर पर मृत्यु दर के कारणों को लेकर किए गए सबसे बड़े और व्यापक अध्ययन ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिजीज स्टडी की नई रिपोर्ट के मुताबिक बाहरी हवा में घुले पार्टिकुलेट मैटर जिनमें धूल, जंगलों की आग तथा कृषि अवशेष जलाए जाने के कारण उठने वाले धुएं से उत्पन्न पार्टिकुलेट मैटर भी शामिल हैं, से पूरी दुनिया में 42 लाख लोगों की मौत होने की बात कही गई है।

वर्ष 2018 में अकेले जीवाश्म ईंधन से ही 87 लाख लोगों की मौत होने की बात कही गई थी अनुसंधानकर्ता आखिर मौतों के इतने बड़े आंकड़े तक कैसे पहुंच गए?

पूर्व में किए गए शोध वातावरण में घुले पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम 2.5 के  औसत वैश्विक सालाना संघनन का अनुमान लगाने के लिए सेटेलाइट और जमीनी स्तर पर की गई निगरानी पर आधारित थे। समस्या इस बात की है कि सेटेलाइट और जमीन पर किये गये पर्यवेक्षण से जीवाश्म ईंधन जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण और धूल तथा जंगलों की आग से उठने वाले धुएं तथा अन्य स्रोतों से उत्पन्न प्रदूषण के बीच फर्क का पता नहीं चल पाता।

हार्वर्ड जॉन ए पॉलसन स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड अप्लाइड साइंसेज (एसईएएस) के केमिस्ट्री क्लाइमेट इंटरेक्शंस की सीनियर रिसर्च फेलो और इस अध्ययन की लेखक लोरेटा जे मिकली ने कहा, ‘‘सैटेलाइट डाटा के जरिए आप किसी गुत्थी को सिर्फ टुकड़ों में ही देखते हैं। कणों के बीच फर्क ढूंढना सेटेलाइट के लिए एक चुनौती है। यही वजह है कि डेटा की किस्‍मों में अंतर हो सकता है।’’

इस चुनौती से निपटने के लिए हार्वर्ड के अनुसंधानकर्ताओं ने जीईओएस-केम का रुख किया। यह एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग में वेस्को मैकॉय फैमिली प्रोफेसर डेनियल जैकब की अगुवाई में एसपीएएस द्वारा तैयार एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री का एक वैश्विक 3D मॉडल है। पूर्व के अध्ययनों में जीईओएस-चेम का इस्तेमाल पार्टिकुलेट मैटर के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रारूपीकरण में किया जाता था और इसके नतीजों को भूतल, वायुयान तथा अंतरिक्ष आधारित अनुमानों के लिए पूरी दुनिया में मान्यता दी जाती है।

वैश्विक मॉडल बनाने के लिहाज से जीईओएस-केम में उच्च स्थानिक रेजोल्यूशन होता है। इसके जरिए शोधकर्ता पूरी दुनिया को 50X60 किलोमीटर जितने छोटे बॉक्स के ग्रिड में बांट सकते हैं और हर बॉक्स में प्रदूषण के स्तर को देख सकते हैं।

आगे, बर्मिंघम यूनिवर्सिटी में स्नातक के छात्र और इस अध्ययन के प्रथम लेखक करण वोहरा के अनुसार, ‘‘बड़े क्षेत्रों में फैली वायु प्रदूषण की परत के विभिन्न औसतों पर निर्भर रहने के बजाय हम ऐसी पैमाइश करना चाहते हैं, जिससे यह पता लगे कि प्रदूषण कहां पर है और लोग कहां पर रह रहे हैं, ताकि हमें यह ज्यादा बेहतर तरीके से मालूम हो सके कि लोग किस तरह की हवा में सांस ले रहे हैं।’’

वोहरा को हार्वर्ड में पूर्व पोस्टडॉक्टोरल फेलो और इस समय यूसीएल के डिपार्टमेंट ऑफ जियोग्राफी में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत इस अध्ययन के सह लेखक एलोइस मैरे की सलाह भी मिली है।

शोधकर्ताओं ने जीवाश्म ईंधन को जलाए जाने के कारण उत्पन्न पीएम 2.5 के प्रारूपीकरण के लिए जीईओएस-केम द्वारा लगाये गये बिजली, उद्योग, जहाजरानी, विमानन तथा भूतल परिवहन समेत विभिन्न क्षेत्रों द्वारा उत्पन्न प्रदूषणकारी तत्वों से संबंधित अनुमानों का इस्तेमाल किया और नासा ग्लोबल मॉडलिंग एंड असिमिलेशन ऑफिस के मौसम विज्ञान द्वारा संचालित विस्तृत ऑक्सीडेंट एयरोसोल रसायन विज्ञान के अनुरूप काम किया।

हर ग्रिड बॉक्स में जीवाश्म ईंधन जनित पीएम 2.5 के बाहरी संघनन की मात्रा का पता लगने के बाद शोधकर्ताओं को यह जानने की जरूरत हुई कि प्रदूषण के इन स्तरों का मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। पिछले कई दशकों से यह जगजाहिर है कि वातावरणीय प्रदूषणकारी तत्व जन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं लेकिन चीन और भारत जैसे उच्च प्रदूषण के संपर्क वाले देशों में इन प्रभावों की मात्रा जानने के लिए महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययन बहुत कम ही हुए हैं। इससे पहले किए गए शोध में इन उच्च स्तरों पर बाह्य पीएम 2.5 के जोखिमों का अनुमान लगाने के लिए आंतरिक द्वितीयक धुएं के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को आधार बनाया जाता था। हालांकि एशिया में हाल में किए गए अध्ययनों से यह पता चलता है कि इससे बाहरी वायु प्रदूषण के उच्च संकेंद्रण के जोखिम को काफी हद तक कम करके ही आंका जा पाता था।

हार्वर्ड टी एच चेन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ  एनवायरमेंटल एपिडेमियोलॉजी में प्रोफेसर और इस अध्ययन के सह लेखकों एलीना वोडोनोस तथा जोल श्वार्ट्स ने जोखिम का अनुमान लगाने के लिए एक नया मॉडल तैयार किया है, जो जीवाश्म ईंधन जनित प्रदूषणकारी तत्वों से उत्पन्न पार्टिकुलेट मैटर के संघनन के स्तरों को उनके कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों से जोड़ता है।

इस नए मॉडल में पाया गया है कि लम्‍बे समय तक जीवाश्म ईंधन जनित प्रदूषण के संपर्क में रहने से मृत्यु दर में इजाफा हुआ है। यहां तक कि पीएम के कम संघनन स्तर पर भी मृत्यु दर ज्यादा है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि वैश्विक स्तर पर वर्ष 2012 में हुई कुल मौतों में जीवाश्म ईंधन जनित प्रदूषण के कारण उत्पन्न पार्टिकुलेट मैटर के संपर्क में आने से हुई मौतों का प्रतिशत 21.5 था। मगर चीन में हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए उठाए गए कड़े कदमों की वजह से वर्ष 2018 में यह प्रतिशत गिरकर 18 हो गया है।

श्वार्ट्स ने कहा “हम अक्सर जीवाश्म ईंधन जलाए जाने के कारण उत्पन्न खतरों की ही चर्चा करते हैं। खासकर कार्बन डाइऑक्साइड फैलने और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में ही बात होती है, मगर ग्रीन हाउस गैसों के साथ निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्वों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। हम उम्मीद करते हैं कि जीवाश्म ईंधन जलाए जाने के कारण स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान की मात्रा तय किए जाने से नीति निर्धारकों और हितधारकों के पास यह प्रत्‍यक्ष संदेश भेजे जा सकते हैं कि ऊर्जा के अन्य स्रोतों की तरफ रुख करने के क्या फायदे हैं।”

एलोइस मैरे ने कहा “हमारे अध्ययन से इस स्थापित तथ्य में एक और सुबूत जुड़ जाता है कि जीवाश्म ईंधन पर मौजूदा निर्भरता के कारण उत्पन्न वायु प्रदूषण पूरी दुनिया में सेहत के लिए नुकसानदेह है। हम जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता जारी नहीं रख सकते। खास तौर पर तब जब हम यह जान लें कि इससे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं और इस स्थिति से बचने के लिए प्रदूषण मुक्त और आसानी से मिलने वाले विकल्प मौजूद हैं।”

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Written by Nishant

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