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बाल शोषण : मासूम बच्चों के जीवन को तबाह करता आज का विषाक्त मानव समाज

यूनीसेफ की रिपोर्ट कहती है कि 69 प्रतिशत बच्चे परिवार के भीतर ही यौन शोषण का शिकार होते हैं। यूनीसेफ ने 13 राज्यों से नमूने इकट्ठे किए थे जिनमें 54.68 प्रतिशत लड़के थे। परिवार में कोई सोच भी नहीं सकता कि घर का ही सदस्य ऐसा करेगा और कई बार शोषण के मामले लंबे समय तक चलते रहते हैं। यही वजह है कि कई बार लंबे समय तक पता नहीं चलता और बच्चे का जीवन बदतर हो जाता है।

साधु संत तो बाहरी ठग हैं, असली कहर तो अपनों ने ढाया है,
कुचला जा रहा वो नन्हा सा फूल, जो कल ही अस्तित्व में आया है,
आज आदिमानव से भी अधिक, विचारहीन मानव हो आया है,
कर शोषण मासूम का, तोड़ता उसका मन नोचता उसकी काया है।

‘शोषण’ शब्द सुनते ही हमारा मस्तिष्क किसी व्यक्ति की जिंदगी से जुड़े एक खौफ़नाक हिस्से की कल्पना करने लगता है। शोष नहीं है कि यह शब्द कुछ समय पहले ही अस्तित्व में आया है। सदियों से शोषक और शोषित दोनों इस समाज में रहते आये हैं। कभी महिलाएं, कभी मजदूर, कभी निम्न जाति से संबंधित या अल्पसंख्यक समुदाय के लोग, ये सभी समुदाय आरंभ से ही किसी न किसी रूप से शारीरिक या मानसिक तौर पर शोषण का सामना करते आ रहे हैं। इसका विरोध भी एक लंबे समय से चलता आ रहा है। किंतु आज समाज के कुछ लोगों की मानसिकता इतनी विषाक्त हो चुकी है कि उन्होंने बच्चों को भी इस शोषण चक्र में खींच लिया है। हालांकि पहले भी बच्चे घरेलू हिंसा के शिकार होते रहे हैं। किंतु यदि आज के आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थिति अत्यधिक भयानक दिखाई पड़ती है। यदि किसी बच्चे के साथ हुई घटना की खबर देखें तो रूह कांप जाती है, जब कुछ दिनों पहले जन्मे बच्चों तक को शोषण का शिकार बनाया जाता है।

अब तक इस विषय पर खुल कर चर्चा नहीं की जाती। क्योंकि बच्चे कभी खुलकर अपनी समस्या किसी के साथ साझा नहीं कर सकते। यह समस्या भारत की ही नहीं हैं बल्कि अन्य सभी देशों का भी अहम मुद्दा हैं। भारत में यौन संबंधी बातों पर खुल कर कहना अपराध एवं शर्म का विषय समझा जाता हैं, इसलिए बच्चे अपनी बात माता पिता के सामने रखने में खुद को असहज मानते हैं। अगर बच्चे बता भी दे, तो ऐसी घटनाओं को छिपाया जाता हैं। ऐसे में बच्चों को सही सलाह एवं हिम्मत ना मिलने के कारण यह अपराध बढ़ता ही जा रहा हैं। यही इसके व्यापक होने का कारण हैं।

क्या है बाल शोषण?

18 साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे के साथ जानबूझकर मानसिक या शारीरिक तौर पर नुकसान पहुंचाना या दुर्व्यवहार करना आदि बाल शोषण माना जाता है। जो कानूनी तौर पर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। बाल दुर्व्यवहार के कई रूप होते हैं, जैसे कि-

मानसिक प्रताड़ना : जब किसी बच्चे से ऐसी बातें की जाती हैं जो उन्हे मानसिक तनाव देता हैं या उन्हें डराता हैं, वे सभी मानसिक प्रताड़ना के अंतर्गत शामिल हैं। बच्चों से अनुचित बातें करना, उन्हें किसी चीज से डराना, उनके मन में भय पैदा करना ये सभी अपराध हैं, जिनके खिलाफ आवाज उठाई जा सकती है।

शारीरिक प्रताड़ना : जब किसी बच्चे को अनुचित तरीके से अनुचित जगहों पर छुआ जाता हैं, उन्हे तकलीफ पहुँचाई जाती हैं या उन्हें मारा जाता हैं, वे सभी शारीरिक प्रताड़ना में शामिल हैं। इस दिशा में बच्चों को शिक्षित करना आवश्यक हैं, ताकि वे इस शोषण को समझ सकें और खुलकर अपने माता- पिता से कह सके।

बाल शोषण का अपराधी कौन?

बड़ी- बड़ी रिसर्च रिपोर्ट और अनुभव यह कहते हैं कि इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाले हमेशा परिवार के करीबी होते हैं, जिनका घर में आना जाना बना रहता हैं। वे बच्चो को इतना खुश रखते हैं कि समझा ही नहीं जा सकता कि उनके इरादे इतने घिनौने हैं। आमतौर पर ये घर के नौकर, करीबी रिश्तेदार होते हैं। इतना ही नहीं अनाथ बच्चों के साथ भी आश्रय गृहों में शोषण किया जाता है।

यूनीसेफ की रिपोर्ट कहती है कि 69 प्रतिशत बच्चे परिवार के भीतर ही यौन शोषण का शिकार होते हैं। यूनीसेफ ने 13 राज्यों से नमूने इकट्ठे किए थे जिनमें 54.68 प्रतिशत लड़के थे। परिवार में कोई सोच भी नहीं सकता कि घर का ही सदस्य ऐसा करेगा और कई बार शोषण के मामले लंबे समय तक चलते रहते हैं। यही वजह है कि कई बार लंबे समय तक पता नहीं चलता और बच्चे का जीवन बदतर हो जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकांश देशों (83 फीसदी) के पास बच्चों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं पर राष्ट्रीय आंकड़े हैं लेकिन महज 21 फीसदी देश ही उनका इस्तेमाल राष्ट्रीय लक्ष्यों को स्थापित करने और दुर्व्यवहार की रोकथाम के लिए रणनीतियां बनाने में करते हैं।

क्या कहते हैं आंकड़ें?

हर दिन लगभग पांच बच्चे बाल शोषण की वजह से मौत का शिकार होते हैं। इसके अलावा प्रत्येक 3 लड़कियों में से 1 लड़की और प्रत्येक 4 लड़कों में से 1 लड़का 18 साल से कम उम्र में बाल शोषण का शिकार होता है। लड़के (48.5%) और लड़कियां (51.2%) लगभग एक ही दर से शिकार बनते हैं।

भारत की 2013 में चाइल्ड सेक्सुअल एसौल्ट इन जुवेनाइल जस्टिस होम्स की रिपोर्ट के अनुसार 2001 से 2011 तक 48000 बच्चों के साथ शारीरिक शोषण के मामले रजिस्टर हुए थे।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2015 के आंकड़े बताते हैं की 2014 के 89,423 मामलों के मुकाबले 2015 में 94,172 मामले देश में दर्ज हुए थे। बच्चों के प्रति अपराध एक साल में 5.3 प्रतिशत की दर से बढ़ा।

बाल शोषण के लिए बने कानून

हमारे देश में महिलाओं के शोषण के लिए बहुत से कानून बनाये जा चुके थे, लेकिन बच्चे के शोषण के विरुद्ध देश में कोई बड़ा कानून नहीं था। बहुत सी वारदातों एवं घटनाओं से स्पष्ट हुआ, कि बाल शोषण अपराध भी दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा हैं और इनके पीछे ज़्यादातर करीबी लोगो का होना पाया गया हैं, इस कारण 2012 में बाल शोषण के खिलाफ बड़ा कानून बनाया गया, जिसे प्रोटेक्टशन ऑफ चिल्ड्रन अगेन्स्ट सेक्सुयल ऑफेंस बिल 2011(POCSO -“The Protection Of Children From Sexual Offences Act” ) के रूप में सदन में पारित किया गया।बाद में इसे 22 मई 2012 को एक एक्ट बनाया गया। इस एक्ट को बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए, महिला और बाल विकास मंत्रालय ने बनाया था। वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है।

हमारे देश में लोग सेक्स एजुकेशन का नाम सुनते ही सोच बना लेते हैं की इससे बच्चे बिगड़ जायेंगे। किंतु वह यह नहीं समझ पाते की इससे हमारे बच्चों को आने वाले समय में कितना लाभ मिलेगा। बाल शोषण को रोकने के लिए जरूरी हैं कि बच्चों को सही और गलत का ज्ञान दिया जाये। उनसे इस विषय में खुलकर बात की जाये, ताकि वे इस शोषण को समझ सके और अपनों से कह सके। 

बच्चों को यह ज्ञान होना बहुत आवश्यक है, कि वो अपने और पराये के अंतर को समझ सके। वैसे यह बहुत मुश्किल हैं क्योंकि बच्चे तो ना समझ होते हैं पर फिर भी उन्हे कुछ हद तक ज्ञान देना आवश्यक हैं। बच्चों को शारीरक शोषण को समझने के लिए अच्छे और बुरे टच को महसूस करने का ज्ञान दिया जाना जरूरी हैं।

बाल शोषण अपराध एक ऐसा अपराध हैं जो भविष्य को अंधकारमय कर सकता हैं। इसके लिए आवाज उठाना अति महत्वपूर्ण हैं। बचपन जितना बेहतर होगा भविष्य उतना ही उज्जवल बनेगा। किंतु बाल शोषण जैसे अपराध बच्चों की नींव को कमजोर करते हैं। ऐसे में बच्चों की बातों को छिपाने के बजाय उसका खुलकर विरोध करे, इससे बच्चा तो आत्मविश्वास महसूस करेगा ही समाज का हर व्यक्ति इससे शिक्षित होगा और अपराधी अपराध करने से पहले कई बार सोचेगा। साथ ही वह अपने साथियों और आस पास के बच्चों की परेशानी को भी समझेगा और उनकी मदद करेगा। स्वस्थ समाज स्वस्थ बच्चों से हैं, बाल शोषण बच्चों को मानसिक रोगी बना रहा हैं, भविष्य के लिये इस घृणित अपराध को रोकना हमारा कर्तव्य हैं। 

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