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बाल विवाह – भारतीय संस्कृति के मस्तक का कलंक

भारत में 50.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं ख़ून की कमी की शिकार होती हैं। लगभग 70 प्रतिशत किशोरी बालिकाएं ख़ून की कमी की शिकार हैं। उन्हें भोजन, पोषण, शिक्षा और सम्मान चाहिए, बाल विवाह नहीं।

Photo Source: Patrika

जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश में विवाह नामक व्यवस्था एक प्रकार से सामाजिक ,आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यापार के रूप में प्रयोग की जाती है। परंतु इस व्यवस्था के एक पहलू बाल विवाह के कारण हमारे देश के बच्चों और महिलाओं के हितों और गरिमा को ठेस पहुंचता है। इस व्यवस्था का प्रयोग हमारे देश में एक तरह से वस्तु विनिमय की प्रक्रिया के रूप में किया जाता है।

हमारे सभ्य समाज में बाल विवाह मानव विकास के लिए एक नकारात्मक सूचक और एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। इस व्यवस्था के कारण बच्चे ना तो अपनी पूरी शिक्षा हासिल कर पाते हैं और ना ही उनका मानसिक विकास पूरी तरह हो पाता है। जिस कारण उन्हें अपने कौशल विकास के अवसर नहीं मिल पाते। क्योंकि छोटी उम्र में विवाह होने के कारण पैदा हुई जिम्मेदारियां उन्हें अपने आने वाले जीवन के बारे में सोचने और खुद के भविष्य के बारे में सपने देखने के अधिकार से वंचित कर देती हैं।

कम उम्र में ही शादी हो जाने के कारण बच्चों खास तौर पर लड़कियों का यौन शोषण और उनके साथ घरेलू हिंसा भी होती है। कम उम्र में विवाह हो जाने के कारण लड़कियां छोटी उम्र में ही गर्भवती हो जाती हैं जिसके कारण उस लड़की के शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कम उम्र में गर्भावस्था के कारण लड़की की जान को भी खतरा होता है साथ ही पैदा होने वाले बच्चों में कुपोषण विकलांगता यहां तक की उसकी मृत्यु भी हो जाती है।

2016 के चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि बिहार में 39.1 प्रतिशत विवाह क़ानूनी उम्र से पहले ही हो जाते हैं। आँध्रप्रदेश में 32.6 प्रतिशत, गुजरात में 24.9 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 30 प्रतिशत, राजस्थान में 35.4 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 40.7 प्रतिशत और समग्र भारत में 26.8 प्रतिशत विवाह बाल विवाह होते हैं।

दुनिया में सबसे आगे होने की चाहत रखने वाले भारत ने 1980 के दशक में कंप्यूटर के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए दिन-रात की कोशिशें शुरू कर दीं। आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए 1991 में आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को तुरंत अपना लिया, पर बाल विवाह को रोकने का क़ानून वर्ष 2006 में ही आ पाया। क्योंकि रूढ़िवादी, जातिवादी और लैंगिक को सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यता देने वाला समाज बच्चों के हितों पर संवेदनशील रहा ही नहीं है। बच्चे उसके लिए केवल उनके वंश को आगे बढ़ाने का एक जरिया होते हैं और महिलायें भी इस प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा होती हैं , जिन पर पितृसत्तात्मक समाज शासन करता है।

भले ही आज भारत में सरकार बाल विवाह को रोकने के लिए अपनी तरफ से अनेक नीतियां और योजनाएं लागू कर रही है । मगर ऐसे अनेक उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं जहां स्वयं कुछ राजनेता सामूहिक विवाह की आड़ में बाल विवाह जैसे अपराध को घटित होने देते हैं । आजकल सरकारें खुद दहेज़ देने की योजना चलाती हैं और सामूहिक विवाह कार्यक्रमों का आयोजन करवाती हैं। विवाह आयोजन धार्मिक राजनीति में बड़ा प्रभावशाली महत्व रखता है। यही कारण है कि सरकार समर्थित सामूहिक विवाह कार्यक्रमों में बाल विवाह भी होते हैं।

इसकी सबको जानकारी होती है, अखबारों में खबर छपती हैं क़ानून टूटता है। मगर होता कुछ नहीं है। कम उम्र के बच्चे मैं इतनी समझ नहीं होती की वह जो कर रहे हैं वह कानून की नजर में अपराध है। ना ही वह इस विषय पर अपने परिवार वालों के खिलाफ जा सकते हैं। क्योंकि वह पूरी तरह से अपने परिवार पर ही आश्रित होते हैं।
स्वतंत्रता के बाद से ही, ख़ासतौर पर जब से पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के साथ साम्प्रदायिकता और लैंगिक-जातिवादी राजनीति का गठजोड़ हो गया है, तब से संकट अपने चरम की तरफ बढ़ना शुरू हो गया है।

समाज की संकुचित सोच के कारण आज लड़कियां स्वतंत्र रूप से ना तो कहीं आ जा सकती हैं और ना ही अपनी पसंद के साथी से विवाह कर सकती है। भारतीय समाज की विवाह व्यवस्था में दो युवा अपनी समझ से एक निर्णय लेकर प्रेम करना और जीवन साथ गुजारना चाहें तो उन्हें कठोर सजा का पात्र माना जाता है। यदि ऐसे में कोई हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी करना चाहे तो यह समाज चिंतित हो जाता है कि हिन्दू लड़की मुसलमान लड़के से प्रेम करती है तो इससे उनका प्रभुत्व संकट में आ जाएगा।

फिर इस समस्या से निपटने के लिए या तो उन दोनों की हत्या कर दी जाती है। कोई एक समुदाय दूसरे समुदाय को सबक सिखाने के लिए लड़की के साथ बलात्कार, उसकी हत्या या उनकी जमीन पर कब्जा करना और यहां तक की उनका सामाजिक बहिष्कार तक करवा सकते हैं।

लेकिन हमारे समाज को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे देश में वर्ष 2008 से 2016 के बीच लगभग 6800000 बच्चे जन्म लेने के 28 दिन के अंदर ही मर गए और आज भी लगभग हर साल 40000 में महिलाएं प्रसव के समय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। साथ ही लगभग साढे छह करोड़ बच्चे हमारे देश में कुपोषण का शिकार हैं। इसका सीधा-सीधा कारण है कम उम्र में लड़की का गर्भवती होना। इतनी कम उम्र में लड़कियां शारीरिक रूप से गर्भधारण करने के लिए तैयार नहीं होती हैं। किशोर गर्भावस्था के कारण ना केवल बच्चे की जान बल्कि उस महिला की जान को भी खतरा रहता है।

बाल विवाह के कारण केवल किशोर गर्भावस्था ही नहीं बल्कि घरेलू हिंसा भेदभाव स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव गरीबी और न जाने कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। परंतु फिर भी हमारे समाज में आज भी है प्रथा कायम है। कुछ व्यक्ति आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं और इसके खिलाफ आवाज उठाना नहीं चाहते। न जाने लोग क्यों इस बात को भूल जाते हैं कि बाल विवाह की आड़ में ना जाने कितने ही अपराधी जन्म लेते हैं और न जाने कितने सपने टूटते हैं। साथ ही एक स्वस्थ भविष्य की कल्पना भी टूट जाती है।

वर्ष 2008 से 2015 के बीच भारत में 26.30 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु इसलिए हुई, क्योंकि वे 37 सप्ताह की गर्भावस्था पूरी करने से पहले जन्मे थे, यानी समय पूर्व प्रसव हुआ था।
आज की स्थिति में भी भारत में लगभग 35 लाख बच्चे समय पूर्व प्रसव के जरिये जन्म लेते हैं। बाल विवाह और स्त्रियों के साथ शोषण इसका सबसे बड़ा कारण होता है जब आप बाल विवाह का समर्थन करते हैं, तब आप यह भी साबित करते हैं कि लाखों नवजात शिशुओं की मौत आपके विवेक को कहीं झकझोरती नहीं है ।भारत सरकार का ही अध्ययन बताता है कि हर दूसरा बच्चा हिंसा और उत्पीड़न का शिकार है।

समाज के इस समूह को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि भारत में 50.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं ख़ून की कमी की शिकार होती हैं। लगभग 70 प्रतिशत किशोरी बालिकाएं ख़ून की कमी की शिकार हैं। उन्हें भोजन, पोषण, शिक्षा और सम्मान चाहिए, बाल विवाह नहीं। यह नज़रिया साबित करता है कि पितृसत्तात्मक समाज या मर्दवादी समाज इस बात को मानने के लिए कतई तैयार नहीं है कि लड़कियों या महिलाओं के जीवन से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नहीं है।

वास्तव में यहां पता चलता है कि लिंगभेद और सांप्रदायिकता का शासन वर्तमान समाज को बड़े स्तर पर झकझोर रहा है। वह इन दोनों को ही त्यागने के लिए तैयार नहीं है। इस गठजोड़ के शासन को मजबूत बनाने के लिए वह हिंसा, दंगे, कत्लेआम, बलात्कार, आगजनी, क़ानून और संवैधानिक संस्थाओं का दुरूपयोग तक सब कुछ करने के लिए तैयार है।

चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ही आंकड़ों से पता चला कि भारत में केवल 54 प्रतिशत महिलाएं अकेले बाज़ार जा सकती हैं, 50 प्रतिशत अकेले स्वास्थ्य केंद्र जा सकती हैं, 48 प्रतिशत ही अकेले गांव या समुदाय के बाहर जा सकती हैं। इन तीन स्थानों पर अकेले जाने का अधिकार केवल 41 प्रतिशत महिलाओं को दिया गया है।

इसी सर्वेक्षण से पता चलता है कि 31 प्रतिशत महिलाएं शारीरिक और यौनिक हिंसा का सामना करती हैं। वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, 100 में से 29 महिलाएं पति के द्वारा शारीरिक या यौनिक हिंसा की शिकार होती हैं।

क्या सच में हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर रहे हैं जहां महिलाओं का भविष्य ही सुरक्षित नहीं है। जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक हर समय किसी न किसी रूप में उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।बाल विवाह इस हिंसा का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि यह बच्चों को शिक्षा से वंचित कर देता है। सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि जिन महिलाओं ने बिल्कुल भी स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की है, उनमें से 38 प्रतिशत हिंसा की शिकार होती हैं, जबकि 12 साल या इससे ज़्यादा उम्र तक की शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में 12 प्रतिशत ने हिंसा का सामना किया।

महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा की 83 प्रतिशत घटनाओं में हिंसा करने वाला व्यक्ति उनका पति होता है।विश्व में केवल युद्ध भूमि में ही युद्ध नहीं लडे जाते बल्कि सदियों से घर के भीतर भी एक युद्ध चल रहा है, स्त्रियों और बच्चों के खिलाफ। बच्चों के खिलाफ इसलिए क्योंकि पुरुष बच्चों को पितृसत्ता के मुताबिक़ व्यवहार करने के लिए हर पल शिक्षित करना है।जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश में विवाह नामक व्यवस्था एक प्रकार से सामाजिक आर्थिक राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यापार के रूप में प्रयोग की जाती है। परंतु इस व्यवस्था के एक पहलू बाल विवाह के कारण हमारे देश के बच्चों और महिलाओं के हितों और गरिमा को ठेस पहुंचता है। इस व्यवस्था का प्रयोग हमारे देश में एक तरह से वस्तु विनिमय की प्रक्रिया के रूप में किया जाता है।

हमारे सभ्य समाज में बाल विवाह मानव विकास के लिए एक नकारात्मक सूचक और एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। इस व्यवस्था के कारण बच्चे ना तो अपनी पूरी शिक्षा हासिल कर पाते हैं और ना ही उनका मानसिक विकास पूरी तरह हो पाता है। जिस कारण उन्हें अपने कौशल विकास के अवसर नहीं मिल पाते। क्योंकि छोटी उम्र में विवाह होने के कारण पैदा हुई जिम्मेदारियां उन्हें अपने आने वाले जीवन के बारे में सोचने और खुद के भविष्य के बारे में सपने देखने के अधिकार से वंचित कर देती हैं।

कम उम्र में ही शादी हो जाने के कारण बच्चों खास तौर पर लड़कियों का यौन शोषण और उनके साथ घरेलू हिंसा भी होती है। कम उम्र में विवाह हो जाने के कारण लड़कियां छोटी उम्र में ही गर्भवती हो जाती हैं जिसके कारण उस लड़की के शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कम उम्र में गर्भावस्था के कारण लड़की की जान को भी खतरा होता है साथ ही पैदा होने वाले बच्चों में कुपोषण विकलांगता यहां तक की उसकी मृत्यु भी हो जाती है।

2016 के चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि बिहार में 39.1 प्रतिशत विवाह क़ानूनी उम्र से पहले ही हो जाते हैं। आँध्रप्रदेश में 32.6 प्रतिशत, गुजरात में 24.9 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 30 प्रतिशत, राजस्थान में 35.4 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 40.7 प्रतिशत और समग्र भारत में 26.8 प्रतिशत विवाह बाल विवाह होते हैं।

दुनिया में सबसे आगे होने की चाहत रखने वाले भारत ने 1980 के दशक में कंप्यूटर के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए दिन-रात की कोशिशें शुरू कर दीं। आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए 1991 में आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को तुरंत अपना लिया, पर बाल विवाह को रोकने का क़ानून वर्ष 2006 में ही आ पाया। क्योंकि रूढ़िवादी, जातिवादी और लैंगिक को सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यता देने वाला समाज बच्चों के हितों पर संवेदनशील रहा ही नहीं है। बच्चे उसके लिए केवल उनके वंश को आगे बढ़ाने का एक जरिया होते हैं और महिलायें भी इस प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा होती हैं , जिन पर पितृसत्तात्मक समाज शासन करता है।

भले ही आज भारत में सरकार बाल विवाह को रोकने के लिए अपनी तरफ से अनेक नीतियां और योजनाएं लागू कर रही है । मगर ऐसे अनेक उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं जहां स्वयं कुछ राजनेता सामूहिक विवाह की आड़ में बाल विवाह जैसे अपराध को घटित होने देते हैं । आजकल सरकारें खुद दहेज़ देने की योजना चलाती हैं और सामूहिक विवाह कार्यक्रमों का आयोजन करवाती हैं। विवाह आयोजन धार्मिक राजनीति में बड़ा प्रभावशाली महत्व रखता है। यही कारण है कि सरकार समर्थित सामूहिक विवाह कार्यक्रमों में बाल विवाह भी होते हैं।

इसकी सबको जानकारी होती है, अखबारों में खबर छपती हैं क़ानून टूटता है। मगर होता कुछ नहीं है। कम उम्र के बच्चे मैं इतनी समझ नहीं होती की वह जो कर रहे हैं वह कानून की नजर में अपराध है। ना ही वह इस विषय पर अपने परिवार वालों के खिलाफ जा सकते हैं। क्योंकि वह पूरी तरह से अपने परिवार पर ही आश्रित होते हैं।

स्वतंत्रता के बाद से ही, ख़ासतौर पर जब से पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के साथ साम्प्रदायिकता और लैंगिक-जातिवादी राजनीति का गठजोड़ हो गया है, तब से संकट अपने चरम की तरफ बढ़ना शुरू हो गया है।

समाज की संकुचित सोच के कारण आज लड़कियां स्वतंत्र रूप से ना तो कहीं आ जा सकती हैं और ना ही अपनी पसंद के साथी से विवाह कर सकती है। भारतीय समाज की विवाह व्यवस्था में दो युवा अपनी समझ से एक निर्णय लेकर प्रेम करना और जीवन साथ गुजारना चाहें तो उन्हें कठोर सजा का पात्र माना जाता है। यदि ऐसे में कोई हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी करना चाहे तो यह समाज चिंतित हो जाता है कि हिन्दू लड़की मुसलमान लड़के से प्रेम करती है तो इससे उनका प्रभुत्व संकट में आ जाएगा।

फिर इस समस्या से निपटने के लिए या तो उन दोनों की हत्या कर दी जाती है। कोई एक समुदाय दूसरे समुदाय को सबक सिखाने के लिए लड़की के साथ बलात्कार उसकी हत्या या उनकी जमीन पर कब्जा करना और यहां तक की उनका सामाजिक बहिष्कार तक करवा सकते हैं।

लेकिन हमारे समाज को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे देश में वर्ष 2008 से 2016 के बीच लगभग 6800000 बच्चे जन्म लेने के 28 दिन के अंदर ही मर गए और आज भी लगभग हर साल 40000 में महिलाएं प्रसव के समय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। साथ ही लगभग साढे छह करोड़ बच्चे हमारे देश में कुपोषण का शिकार हैं। इसका सीधा-सीधा कारण है कम उम्र में लड़की का गर्भवती होना। इतनी कम उम्र में लड़कियां शारीरिक रूप से गर्भधारण करने के लिए तैयार नहीं होती हैं। किशोर गर्भावस्था के कारण ना केवल बच्चे की जान बल्कि उस महिला की जान को भी खतरा रहता है।

बाल विवाह के कारण केवल किशोर गर्भावस्था ही नहीं बल्कि घरेलू हिंसा भेदभाव स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव गरीबी और न जाने कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। परंतु फिर भी हमारे समाज में आज भी है प्रथा कायम है। कुछ व्यक्ति आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं और इसके खिलाफ आवाज उठाना नहीं चाहते। न जाने लोग क्यों इस बात को भूल जाते हैं कि बाल विवाह की आड़ में ना जाने कितने ही अपराधी जन्म लेते हैं और न जाने कितने सपने टूटते हैं। साथ ही एक स्वस्थ भविष्य की कल्पना भी टूट जाती है।

वर्ष 2008 से 2015 के बीच भारत में 26.30 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु इसलिए हुई, क्योंकि वे 37 सप्ताह की गर्भावस्था पूरी करने से पहले जन्मे थे, यानी समय पूर्व प्रसव हुआ था।

आज की स्थिति में भी भारत में लगभग 35 लाख बच्चे समय पूर्व प्रसव के जरिये जन्म लेते हैं। बाल विवाह और स्त्रियों के साथ शोषण इसका सबसे बड़ा कारण होता है जब आप बाल विवाह का समर्थन करते हैं, तब आप यह भी साबित करते हैं कि लाखों नवजात शिशुओं की मौत आपके विवेक को कहीं झकझोरती नहीं है ।भारत सरकार का ही अध्ययन बताता है कि हर दूसरा बच्चा हिंसा और उत्पीड़न का शिकार है।

समाज के इस समूह को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि भारत में 50.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं ख़ून की कमी की शिकार होती हैं। लगभग 70 प्रतिशत किशोरी बालिकाएं ख़ून की कमी की शिकार हैं। उन्हें भोजन, पोषण, शिक्षा और सम्मान चाहिए, बाल विवाह नहीं। यह नज़रिया साबित करता है कि पितृसत्तात्मक समाज या मर्दवादी समाज इस बात को मानने के लिए कतई तैयार नहीं है कि लड़कियों या महिलाओं के जीवन से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नहीं है।

वास्तव में यहां पता चलता है कि लिंगभेद और सांप्रदायिकता का शासन वर्तमान समाज को बड़े स्तर पर झकझोर रहा है। वह इन दोनों को ही त्यागने के लिए तैयार नहीं है। इस गठजोड़ के शासन को मजबूत बनाने के लिए वह हिंसा, दंगे, कत्लेआम, बलात्कार, आगजनी, क़ानून और संवैधानिक संस्थाओं का दुरूपयोग तक सब कुछ करने के लिए तैयार है।

चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ही आंकड़ों से पता चला कि भारत में केवल 54 प्रतिशत महिलाएं अकेले बाज़ार जा सकती हैं, 50 प्रतिशत अकेले स्वास्थ्य केंद्र जा सकती हैं, 48 प्रतिशत ही अकेले गांव या समुदाय के बाहर जा सकती हैं। इन तीन स्थानों पर अकेले जाने का अधिकार केवल 41 प्रतिशत महिलाओं को दिया गया है।

इसी सर्वेक्षण से पता चलता है कि 31 प्रतिशत महिलाएं शारीरिक और यौनिक हिंसा का सामना करती हैं। वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, 100 में से 29 महिलाएं पति के द्वारा शारीरिक या यौनिक हिंसा की शिकार होती हैं।

क्या सच में हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर रहे हैं जहां महिलाओं का भविष्य ही सुरक्षित नहीं है। जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक हर समय किसी न किसी रूप में उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।बाल विवाह इस हिंसा का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि यह बच्चों को शिक्षा से वंचित कर देता है। सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि जिन महिलाओं ने बिल्कुल भी स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की है, उनमें से 38 प्रतिशत हिंसा की शिकार होती हैं, जबकि 12 साल या इससे ज़्यादा उम्र तक की शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में 12 प्रतिशत ने हिंसा का सामना किया।

महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा की 83 प्रतिशत घटनाओं में हिंसा करने वाला व्यक्ति उनका पति होता है।विश्व में केवल युद्ध भूमि में ही युद्ध नहीं लडे जाते बल्कि सदियों से घर के भीतर भी एक युद्ध चल रहा है, स्त्रियों और बच्चों के खिलाफ। बच्चों के खिलाफ इसलिए क्योंकि पुरुष बच्चों को पितृसत्ता के मुताबिक़ व्यवहार करने के लिए हर पल शिक्षित करना है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा देश  फिर से एक ऐसा देश बन जाएगा जहां स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं होते। 

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