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कोरोना महामारी : भारत में अदृश्य सफाई कर्मचारी (फ्रंट लाइन वर्कर)

इन कोरोना फाइटर्स में से सफाई कर्मचारी आर्थिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग से आते हैं। इसे लेकर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से इनकी विशेष मदद करने की अपील की है।

प्रस्तावना 

पिछले कई महीनों से पूरा विश्व कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा हैं और इससे उबरने की कोशिश में लगा हुआ हैं. भारत भी इसका बहादुरी से सामना कर रहा हैं. ऐसे में कोरोना महामारी के खिलाफ जंग लड़ रहे मेडिकल ऑफिसर, पुलिस प्रशासन, समाजसेवी फ्रंट लाइन वर्कर्स की कहानियाँ हमारे सामने आ रही हैं, लेकिन देश की जनता को कोरोना वायरस से बचाने के लिए खुले आसमान के नीचे रोजाना साफ -सफाई करने, अस्पतालों का कचरा, आम जनता के घरों के कचरे का निपटान करने वाले फ्रंट लाइन वर्कर्स अर्थात सफाई कर्मचारियों को अदृश्य कर दिया गया, जबकि वह भी उतने ही महत्वपूर्ण योध्या की भूमिका निभा रहे हैं. शहरों की 90 फीसदी आवाम इनके चेहरों से अनजान रहती है, जिनके कारण हम सभी शुद्ध वातावरण में सांस ले पाते हैं। लगभग शहरों में ऐसे स्वच्छता दूतों में अधिकतर महिलाएं भी शामिल हैं, वहीं सैकड़ों युवा और बुजुर्ग भी शामिल हैं।

 कोरोना वायरस को लेकर जब हम घर के सदस्यों और रिश्तेदारों तक से फिजिकल डिस्टेंस बनाए हुए हैं ऐसे दौर में ये शहरों में दिन-रात हमारे द्वारा फेंकी गई गंदगी को उठाकर एक सही स्थान पर ले जा कर उसका निस्तारण कर रहे हैं। इस कचरे में अस्पतालों से निकला मेडिकल अपशिष्ट और घातक बीमारी देने वाले बैक्टीरिया भी होते है। लेकिन वे हर दिन कोरोना जैसे वायरस के खतरे के बीच रोज जंग लड़ते नजर आते हैं, वह भी बगैर कोई छुट्टी लिए हुए । इन जैसे स्वच्छता सिपाहियों के कारण ही हम अभी तक कोरोना वायरस जैसे अद्रश्य खतरनाक दुश्मन की चपेट में आने से बचे हुए हैं।

इस लेख में मैं उन फ्रंट लाइन वर्कर्स की बात करुँगी जो हमारे समाज, शहर, अस्पतान आदि में अपनी जान को जोखिम में डालकर स्वच्छ बनाये रखते हैं लेकिन फिर भी उनकी अनदेखी होती हैं और सरकार की योजनाओं में उनको हाशिये पर रखा जाता हैं चाहे वह काम का सोपानक्रम हो या किसी योजना का हिस्सा हो.

सफाई कर्मचारी के लिए सुविधाओ का आभाव   

भारत में कोविड-19 के खिलाफ इस लड़ाई की अग्रिम पंक्ति में हजारों स्वास्थ्य विशेषज्ञ और स्वास्थ्यकर्मी हैं। लेकिन, उन्हीं में शामिल सफाईकर्मी, उपेक्षित महसूस कर रहे हैं क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें, सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने के मामले में उन लोगों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है और जिनके काम को समाज में अधिक मान्यता दी जाती है – जैसे कि डॉक्टर, नर्स और अन्य सहायक चिकित्सा कर्मचारी, पुलिस. हालांकि स्वास्थ्य कर्मियों के पास आवश्यक सुरक्षा उपकरण होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन सफाई कर्मचारी भी अपने काम की वजह से संक्रमण के खतरे का सामना कर रहे. एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया में छपे लेख के अनुसार,  ज़्यादातर सरकारों के लिए सफाईकर्मियों की सुरक्षा और कल्याण का मुद्दा अप्रधान है.सफाईकर्मचारियों का कहना है, “यह उपेक्षा हमेशा से रही है, ऐतिहासिक तौर पर भी, क्योंकि हम दलित हैं।” वह आगे कहते हैं, “जिन गंदी, मैली और मर्यादाहीन परिस्थितियों में हमें काम करने पर मजबूर किया जाता है उनकी किसी को कोई परवाह नहीं है। और आज, इस महामारी के दौरान भी, यह उदासीनता जारी है। हमें कभी भी अपने हाथों से कचरे को छूने की ज़रुरत नहीं पड़नी चाहिए। लेकिन, पहले हमें दस्तानों, रेनकोट, गमबूट्स के लिए लड़ना पड़ता था, आज हमें व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट के लिए लड़ना पड़ रहा है। बावजूद इसके कि सफाईकर्मियों को अस्पताल के कचरे को साफ़ करने के साथ-साथ प्रभावित रोगियों की देखभाल करने को भी कहा जाता है।”

इसी प्रकार, ईनेक्स्ट न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, प्रयागराज में नगर निगम के 3100 के करीब सफाई कर्मचारी शहर को सेनेटाईज़ कर कोरोना रोकने के मुहीम में लगे हुए हैं. सफाई कर्मियों कहना है कि  “ग्लब्स, मास्क, सेनेटाईजर तो दूर की बात हैं हाथ धोने के लिए साबुन तक नहीं मिला”. साहब मैं भी इंसान हूँ, मेरा भी परिवार हैं मुझे भी अपने जीवन की परवाह हैं , इसके बावजूद बिना सफाई किट के मैं स्वच्छता की मुहीम में जुटा हुआ हूँ, आगे कहते हैं कि आठ घंटे काम करने के बाद खुद को कैसे साफ़ करे इस वजह से सफाई के दौरान हमारे अन्दर भी संक्रमण को लेकर खौफ बना रहता हैं.

नियमावली का नियमन मैनुअल स्कैवेंजर्स और उनके पुनर्वास नियम, 2013 (नियमों की धारा 4 और 5 के तहत) में कहा गया है कि नौकरी पाने वाले व्यक्ति को सुरक्षात्मक गियर श्रमिकों को प्रदान करना होगा। कई संगठनों, यूनियनों और कार्यकर्ताओं के प्रयासों के बावजूद, सरकार अनिवार्य कानून का पालन नहीं कर रही है.

जाति और कोरोना वायरस 

सीवर व स्वच्छता कार्य के लिए हमेशा दलितों को ही “आरक्षित” किया जाता है उदाहरण के लिए, लगभग 30,000 सफाई कर्मचारी ग्रेटर मुंबई नगर निगम द्वारा कार्यरत हैं और सभी 30,000 दलित हैं. अनुमान कहते हैं कि दलित उप-जातियों के छह मिलियन परिवारों में से 40-60% लोग स्वच्छता के काम में लगे हुए हैं.

उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से भारत में लगभग 50 लाख़ सफाईकर्मी हैं, जिनमें से अधिकांश दलित समुदाय से आते हैं. उनमें से कई या तो नगर निगम या पंचायतों के लिए ठोस कचरा इकट्ठा करते हैं (आमतौर पर इहें सफाई कर्मचारी कहा जाता है) या मलीय (शौच से उत्पन्न) कीचड़ साफ़ करते हैं (नाली, सेप्टिक टैंक इत्यादि  की सफाई, जिन्हें मैनुअल स्केवेंजर्स (मैला ढोने वालों) के रूप में जाना जाता हैं).

बहुत से लेखको के अनुसार जाती व्यवस्था लोगों को हाशिये पर रखने वाली जातियों में डालती हैं, जिसे स्थितिजन्य भेद्यता  कहते हैं और दुसरे शब्दों में, वे अपने सामाजिक अलगाव के कारण आधुनिक गुलामी के अधिक जोखिम में हैं जोकि “तत्काल भेद्यता” को बढ़ता हैं. उनके विनाश का परिणाम है.

ये दोनों  कारक हाशिए की जातियों को कचरा बीनने वालों और “मैनुअल मैला ढोने वालों” के रूप में गुलाम बनाने की विशेष कारक निभाते हैं, जिन्हें “विशेष रूप से अपमानजनक रूप” कहा जाता है, जो जाति व्यवस्था के “जड़” में हैं.

जाति आधारित उदासीनता हमेशा से जारी है और, वास्तव में, कोरोनोवायरस महामारी के चेहरे में प्रवर्धित किया गया है. जब नगरपालिका के श्रमिकों ने राष्ट्रीय राजधानी में अपने काम की प्रकृति को देखते हुए सैनिटाइटर्स की आवश्यकता व्यक्त की, तो उन्हें फ्लोरोसेंट जैकेट प्रदान किए गए ताकि उन्हें दूर से “आवश्यक” श्रमिकों के रूप में पहचाना जा सके.  इस तरह का कृत्य जातिगत भेदभाव को दर्शाता है.

जल्दी या बाद में वैज्ञानिक कोरोनोवायरस का टीका विकसित कर ही लेगें, लेकिन एक समाज के रूप में, हम वायरल जातिवाद का सामना करने से बहुत दूर हैं जो लाखों पीढ़ियों के भाग्य का निर्धारण करती है.

बहुत से विद्वानों ने कहा की कोरोना महामारी ने जाति की जड़े कमजोर की हैं लेकिन ऐसा नहीं देखा गया हैं कोरोना दौर में जाति और भी मजबूती से पकडे हुए हैं. जाति के संरचनात्मक ढाचे कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ.

हाशिये पर है इनकी जान 

वर्तमान समय में सफाई कर्मियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई), न्यूनतम मजदूरी, भोजन, बीमा, आवास और परिवहन जैसे अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, पुलिस कर्मियों की तरह ही उनको भी मिलनी चाहिए थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं और सफाई कर्मचारी हाशिये पर कर दिए गए जैसे की इनकी जान की कोई कीमत ही न हो.

आमतौर पर, स्थायी और अनुबंध (ठेके पर रखे गए) कर्मचारियों, दोनों के प्रति उपेक्षा, निम्नलिखित तरीकों में से एक या अधिक के ज़रिये लक्षित होती है:

  • सभी कर्मचारियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) का अपर्याप्त प्रावधान जिसमें चेहरे के लिए मास्क, हाथ के दस्ताने, एप्रन, जूते, सिर ढँकने के लिए उपकरण आदि के साथ-साथ साबुन/सनिटीज़र शामिल हैं। यह “कार्यालयों और आम सार्वजनिक स्थानों के कीटाणुशोधन और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के तर्कसंगत उपयोग” पर केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के विपरीत है।
  • स्वास्थ्य बीमा और चिकित्सा सम्बन्धी प्रावधान (यदि दिए गए हों तो) में गैरबराबरी।
  • स्थायी और अनुबंध (ठेके पर रखे गए) कर्मचारियों को दिए जाने वाले भुगतान और कोविड-19 संबंधित कार्यों के लिए दिए जा रहे अतिरिक्त मुआवज़े में कोई बराबरी नहीं है।
  • ओवर-टाइम करवाना लेकिन उसके लिए अतिरिक्त वेतन (अगर दिया गया तो) में कोई निरंतरता नहीं।
  • सार्वजनिक परिवहन सेवाएँ बंद होने के कारण, सुबह जल्दी ड्यूटी के लिए पहुँचने के लिए परिवहन मिलने में कठिनाई।
  • जो मज़दूर मज़बूरी में मैला ढोने का काम (मैन्युअल स्केवेंजिंग) करते हैं (ज़्यादातर अनौपचारिक अनुबंध के आधार पर) उन्हें इस समय कोई काम नहीं मिल रहा है।

इन कोरोना फाइटर्स में से सफाई कर्मचारी आर्थिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग से आते हैं। इसे लेकर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से इनकी विशेष मदद करने की अपील की है। ताजा हालात को देखते हुए उत्तर प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी ने सवाल उठाया है कि सफाई कर्मचारियों को भी अन्य कोरोना फाइटर्स के बराबर मानते हुए 50 लाख रुपये की बीमा राशि का अधिकार दिया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के मीरापुर कस्बे के सफाई नायक सन्नी के अनुसार यह एक बेहद जरूरी मांग है।सफाई कर्मचारियों ने किसी तरह की कोई ढील अपने काम मे नहीं की है। वो पूरी मेहनत से जुटे हैं।हमें समाज के निचले पायदान पर जरूर समझा जाता है, मगर हमारे होने से ही उनकी गदंगी दूर होती है। हम पूरे साल देश के लिए संघर्ष करते हैं। आज ज्यादा जरूरत है तो और अधिक मेहनत कर रहे हैं। सन्नी बताते हैं कि शुक्रवार को जब वो अपने कर्मचारियों के साथ कुछ गली से गुजरे तो उन पर फूल-माला डालकर स्वागत किया गया। यह सब उन्हें बहुत अच्छा लगा, मगर सरकार को हमारे वेतन का भी ख्याल रखना चाहिए और हमें स्थाई कर देना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में अनुबंध वाले सफाई कर्मचारी भी भूखे पेट कोरोना से लड़ रहे हैं। बीना (55) कहती हैं, “बेटा सिर्फ बातों से पेट नहीं भरता।” यह समस्या किसी एक जगह की नहीं है। देश भर में लाखों सफाई कर्मचारी विभिन्न तरह की समस्या से दो चार हैं। ऐसे में उन पर बरसाए जा रहे फूल अच्छे तो बहुत लगते हैं, मगर उन्हें रोटी और दूसरी पारिवारिक जरूरत इससे भी ज्यादा प्यारी है। उत्तर प्रदेश में अब तक दवाई छिड़काव से जुड़े 3 सफाई कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। इनकी सहायता के लिए एसआर दारापुरी ने पीएम को पत्र लिखा है.

निष्कर्ष

सरकार और स्थानीय अधिकारियों को महामारी के दौरान हाथ से मैला ढोने वालों और सफाई कर्मचारियों के मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। हमारे पड़ोस और शहरों को साफ और स्वच्छ बनाने के लिए चौबीसों घंटे काम करने वाले लोगों को पर्याप्त पीपीई और अन्य सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने चाहिए। उन्हें समय पर उनकी पूरी तनख्वाह दी जानी चाहिए। हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि महाराष्ट्र के नागपुर में कमजोर सफाई कर्मचारियों के वेतन में कटौती की गयी है और 15 दिन की पगार नहीं दी गयी.

इसके अलावा, सरकार को उन लोगों को मुफ्त चिकित्सा और परिवहन सुविधाएं सुनिश्चित करनी चाहिए जो अपने जीवन को खतरे में डालकर हमें  कोरोना वायरस से बचाए रखें और स्थानीय प्राधिकरण को अपने कार्य स्थानों पर पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि वे घर लौटने से पहले खुद को सेनीटाईज़ कर सकें.

जब तक कि ये सफाई कर्मचारी कोरोनावायरस के खिलाफ सुरक्षित नहीं होते हैं, तब तक वे अपने परिवार और अंततः अपने इलाके के अन्य लोगों को संक्रमित कर सकते हैं.

देश के लिए उनकी सेवा के बावजूद, स्वच्छता कर्मचारियों को उनके काम के लिए कभी भी मान्यता और सराहना नहीं मिली है. इस महामारी में, केंद्र और राज्य में सरकारों को सफाई कर्मचारियों के साथ न्याय करना चाहिए या एक दिन आएगा जब हमें अपने शहरों और गांवों को साफ करने के लिए एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा क्योंकि उन्होंने कोरोना वायरस के कारण दम तोड़ दिया है.

सन्दर्भ सूची

Centre, I. E. (2013). Prohibition of Employment as Manual Scavengers and Their Rehabilitition Rules, 2013. IELRC.

Rajakumari, R. &. (2020, April 24). Amnesty Inernational India . Retrieved June 12, 2020, fromhttps://amnesty.org.in/abandoned-at-the-frontline-indias-sanitation-workers-seek-immediate-help-from-the-government-amidst-covid-19/

Kumbhare, S. (06/may/2020). sanitation Workers: at the bottom of the frontline Against Covid-19. The Wire.

M.S. Manisha, B. R. (22/MAY/2020). The Coronapocalypse and Sanitation Workers in India . The Wire.

वेबसाइट:

http://sanitationworkers.org/profiles/

https://www.youtube.com/watch?time_continue=2&v=jk5AuyvhYVU&feature=emb_logo

https://www.youtube.com/watch?v=z7YhK2AUEwY

https://thewire.in/urban/sanitation-workers-covid-19

https://www.hindustantimes.com/india-news/six-front-line-workers-covid-sweeper-may-have-died-of-virus/story-xRdQpVDo4HLstbjL1QPRvM.html

https://www.mohfw.gov.in/pdf/GuidelinesonrationaluseofPersonalProtectiveEquipment.pdf

https://www.mohfw.gov.in/pdf/Guidelinesondisinfectionofcommonpublicplacesincludingoffices.pdf

 

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