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लड़कियों की शिक्षा पर कोरोना का गहरा नकारात्मक प्रभाव

भले ही डिजिटल क्लासेस और परिक्षाएँ लेकर हमारे देश के शिक्षण संस्थान अपना सामर्थ्य साबित करने में लगे हुए हैं। किंतु जमीनी हकीकत यह है की इस महामारी के दौर में अनेक बच्चों ने अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ दी। इनमें सबसे अधिक संख्या लड़कियों की है, जिन्हें अनेक कारणों से शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी । जिनमें से मुख्य कारण है साधनों की कमी।

वैश्विक महामारी कोरोना ने सभी का जीवन अस्त व्यस्त कर दिया है। अनेक उद्योगों और अन्य कार्य क्षेत्रों में भारी गिरावट देखने को मिली। किंतु यदि सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस महामारी की वजह से शिक्षा के क्षेत्र में सबसे भारी नुकसान हुआ है।विद्यार्थियों के शैक्षिक स्तर में गिरावट आई है। खासकर लड़कियों कि शिक्षा की स्थिति में एक बड़ा अंतर देखने को मिला है।

जैसा की सभी जानते हैं की इस महामारी ने पूरे विश्व में हर एक प्रणाली को कई दशकों पीछे की ओर धकेल दिया है। बड़े बड़े विकसित देश इसकी मार से स्वयं को न बचा सके, तो अन्य विकासशील या अविकसित देश इसके सामने क्या ही टिक पाते। ऐसे में भारत देश में सबसे बड़ा नुकसान हुआ है तो यहाँ की शिक्षा प्रणाली को। भले ही डिजिटल क्लासेस और परिक्षाएँ लेकर हमारे देश के शिक्षण संस्थान अपना सामर्थ्य साबित करने में लगे हुए हैं। किंतु जमीनी हकीकत यह है की इस महामारी के दौर में अनेक बच्चों ने अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ दी। इनमें सबसे अधिक संख्या लड़कियों की है, जिन्हें अनेक कारणों से शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी । जिनमें से मुख्य कारण है साधनों की कमी।

अब पूरे देश में जब धीरे धीरे स्थिति को शांत करने का प्रयास कर देश के हालातों को पुनः सामान्य करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में चिंता का विषय यह है की जब बच्चे स्कूलों में जाने लगेंगे तो लड़कियों की संख्या का एक बड़ा हिस्सा कक्षाओं से गायब मिलेगा। लड़कियों के जीवन पर इसका काफी गहरा प्रभाव पड़ रहा है।

भारत जैसे देश में जहाँ पर कन्या शिक्षा इस महामारी के पहले से ही एक चुनौती थी, वहाँ इस महामारी के आ जाने से स्थिति अब और भी ज्यादा चिंताजनक होती जा रही है। क्योंकि लॉकडाउन के दौरान निम्न आय वर्ग की लड़कियों को या तो घरेलू कार्यों में लगा दिया गया या फिर उनकी शादी करा दी गयी। ऐसे में उनकी रूचि शिक्षा से हट गई। साथ ही आर्थिक तंगी के कारण अनेकों लड़कियों के नाम स्कूलों में अगले सत्र के लिए दर्ज ही नहीं कराये गए। ऐसे में यदि कोई पढ़ना चाहे भी तो आर्थिक स्थिति और साधनों की कमी के कारण वह ऐसा करने में सक्षम नहीं होती।

दूसरा बड़ा कारण है कि भारत में ज़्यादातर घरों में बेटियों की शिक्षा से अधिक महत्व बेटों की शिक्षा को दिया जाता है। ऐसे में जब इस महामारी के कारण सभी रोजगार ठप्प हो चुके हैं तो, आर्थिक तंगी के कारण अनेक परिवार केवल अपने लड़कों की शिक्षा को ही बढ़ावा देते हैं और लड़कियों से त्याग की उम्मीद रखते हैं। अतः न चाहते हुए भी अपने परिवार की खातिर वह पढ़ाई छोड़ देती हैं।

एक और मुख्य कारण है – विवाह। कहने को आज भारत से बाल विवाह की प्रथा को कानूनी रूप से समाप्त किया जा चुका है और इसके लिए ठोस कानून भी बनाए गए हैं। लेकिन वस्विकता किसी से छिपी नहीं है। आज भी देश में लड़कियों के बालिग होने से पहले ही उनकी शादी करा दी जाती है। इसका मुख्य कारण है ग़रीबी और लड़कियों की सुरक्षा से जुड़ी एक संकुचित सोच। इस महामारी के दौर में अनेक लड़कियों की शादी करा दी गई। जिसकी वजह से उन्हें अपनी पढाई छोड़नी पड़ी। शायद ही आने वाले समय में उनमें से कोई अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी और स्कूल दोबारा जा पाएंगी।

यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार कम से कम एक करोड़ लड़कियां है, जिनका लॉकडाउन की वजह से स्कूल छूट सकता है या फिर उनकी रूचि धवस्त हो सकती है। यूनेस्को के असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल फॉर एजुकेशन का कहना है कि लड़कियों के स्कूल को ड्राप आउट करने के आंकड़े अत्यंत चिंताजनक हैं। 154 करोड़ विद्यार्थियों में 74 करोड़ छात्राएं हैं। इनमें से 11 करोड़ लड़कियां उन देशों से हैं, जहां पर शिक्षा प्राप्त करना किसी संघर्ष से कम नहीं है। वहीं बात करें भारत की, तो यहां पर केवल 63% लड़कियां ही अपनी पूरी शिक्षा हासिल कर पाती हैं।

ऐसे में जब हमारे देश में लड़कियों की शिक्षा की हालत पहले भी कोई खास अच्छी नहीं थी। इस महामारी से स्तिथि और कमज़ोर होती जाएगी। इससे निकलने के लिए सरकार को जल्द से जल्द अपने देश की बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करने और आने वाले समय में 100% शिक्षा स्तर हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। क्योंकि विश्व से भविष्य में यह महामारी अवश्य दूर होगी। मगर इसके परिणाम काफी नुकसानदयक होंगे। अतः जरूरत है की इस समस्या पर अधिक से अधिक गौर किया जाए।

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