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दिल्ली और आंदोलन

अन्नदाताओं के इस आंदोलन ने सबको ये सोचने पर मजबूर कर दिया है की आखिर इस सरकार को चुना किसके लिए गया है? किसानों के लिए या अंबानी के लिए?

दिल्ली आज एक नये तरीके का आंदोलन देख रही है। जो उसकी सड़कों पर ना होते हुए भी उसकी जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है। कुछ “सभ्य” आंदोलन देखने वाली ये दिल्ली आज कुछ आम किसानों के आंदोलन का आकलन नहीं कर पा रही है।

अन्नदाताओं के इस आंदोलन ने सबको ये सोचने पर मजबूर कर दिया है की आखिर इस सरकार को चुना किसके लिए गया है? किसानों के लिए या अंबानी के लिए?

2014 से छात्र आंदोलन करते करते हम जैसे बहुत से लोगों को लगता था कि जब हम बच्चों के कम पैसे में पढ़ने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, तब जब मोदी सरकार हमें देशद्रोही बोलती है तो सब मान क्यूँ लेते हैं? लेकिन आज जब अन्नदाताओं को “खालिस्तानी”, “₹500 में आंदोलन करने वाली “, “पिज़्ज़ा खाने वाले” बोला जा रहा है तो लगता है जो देश के लिए अनाज उगाने वाले को देवता मानता था, अब इन्हें इंसान भी नहीं मान रहा है तो हम किस खेत की मूली हैं?

और ऐसा बोलने वाले इन लोगों को पहचाने, हर आंदोलन के समय सरकार के लोग और मीडिया चैनल आपको गाली देते ही नज़र आयेंगे। इनकी पहचान अब आसान हो गई है ये वही प्रज्ञा ठाकुर, वही Zee News, Times Now, कंगना राणावत आदि हैं जिन्होंने अपने अपने बाप चुन लिए हैं मोदी की तरह।

जो किसान आपका पेट भरने के लिए अनाज उगाते हैं वो उसी से बना पिज़्ज़ा भी नहीं खा सकते? शायद अगर ये किसान भी तमिलनाडु के किसानों की तरह अपना मल मूत्र पी रहा होता तो इस सभ्य शहर के लोग  खालिस्तानी  ना मान कर किसान मानता। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है क्योंकि हम में से अधिकतर लोग तमिलनाडु के उन किसानों को जानते भी नहीं है जो महीनों तक दिल्ली की सड़कों पर बैठे रहे? किस लिए अपना घर खेती छोड़ कर ये किसान ठंड में दिल्ली जैसे क्रूर शहर की सड़कों पर हैं? सरकार जो नये बिल लेकर आई है उस से क्या दिक्कत है?

पहला बिल कहता है की किसानों को छूट होगी कि वो अपनी उपज किसी को भी बेच सकते हैं, बीच में कोई नही होगा?

सुनकर अच्छा लगता है। लेकिन इसके पीछे सरकार खुद को किसी भी प्रकार की ज़िम्मेदारी से बच रही है। अगर किसान की फसल अच्छी नही हुई, लागत ज्यादा हुई, तो MSP के बिना कै से किसान अपना घर चलाएँगे, फसल के लिए क्या बचाएँगे? अड़ानी अंबानीअपनी मर्ज़ी से मार्केट का दाम बदलेंगे वो अपना फायदा देखेंगे किसान मरे या जिए। जियो सिम इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है।

दूसरा बिल कहता है किसान किसी के साथ भी कॉंट्क्ट कर सकते हैं, आने वाले कई सालों के लिए। तो क्या अंबानी अड़ानी इस बात का ख्याल रखेंगे किकिसान की फसल कभी मौसम के कारण, कभी सिंचाई के कारण अगर खराब हुई तो किसान जिंदा रह पाए अगली फसल लगाने तक या फिर अंग्रेजों की तरह सिर्फ पैसा वसूली पर ध्यान रहेगा? और अम्बानी से किससे आज तक फायदा हुआ है हमें शायद एक नाम भी याद नहीं आता। जिन किसानों की फसल ठीक नही हुई उनका क्या होगा? और इसमें सरकार कुछ नहीं करेगी क्योंकि तब उसकी कोई ज़िम्मेदारी नही होगी इसीलिए ये बिल है। तब शायद जिन्हें आज किसानों के पिज़्ज़ा खाने से दिक्कत है उनके जहर खाने पर वो चूँ नही करेंगे। क्योंकि अभी तक इस देश में 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं पर इन सरकारी लोगों को हमने कभी नही सुना?

तीसरे बिल में सरकार ने आलू, तेल ,दाल ,प्याज को आवश्यक वस्तु की सूची से हटाने का फैसला लिया है। इसके बाद अब कोई भी इनको खरीद कर गोदाम में रखे और फिर मन माने दाम पर बेचे। इसे इस देश के किसानों के साथ साथ इस देश का सबसे गरीब तबका भूखा मरेगा। और जिसे लगता है कि उनको तो सुपर मार्केट से अनाज सब्ज़ी मिल रहा है वो अपनी बारीका इंतज़ार करे। हमारे यहाँ कहते हैं आदमी को भूख लगी हो तो पेट भरा जा सकता पर किसी की नियत को भरा नहीं जा सकता। अंबानी अडानी की नियत भरने के चक्कर में इस सरकार ने इस देश की शिक्षा बेच दी ताकि Jio University खोल ले। देश की सुरक्षा बेच दी ताकि राफ़ेल की डील अम्बानी को मिले, एयरपोर्ट और पोर्ट बेच दिये ताकि अडानी को पैसा मिले। रेलवे स्टेशन बेच दिये। अब जमीन बची थी वो भी इन्हीं को देने की तैयारी है।

अडानी और अम्बानी ने 53 कृषि क्षेत्र की कंपनियाँ अभी नई रजिस्टर कराई है इससे बड़ा क्या सबूत होगा सरकार की मंशा का।

ये आंदोलन सिर्फ किसानों का आंदोलन नहीं है ये आंदोलन उन छात्रों, महिलाओं, मुसलमानों, बुद्धिजीवियों का भी है जिन्हें इस सरकार ने  देशद्रोही बना कर जेल में डाल दिया। ये आंदोलन आने वाली पीढ़ी के आदर्श को तय करेगा कि उनका आदर्श भगत सिंह, अशफ़ाकुल्लाह खान, सुखदेव, और राज गुरु होंगे या देश बेचने वाला मोदी और अमित शाह?

ये आंदोलन सिर्फ खेत बचाने के लिए नहीं है, बल्कि इस देश की आत्मा बचाने के लिए है।

हम उस मजदूर किसान, जिसके कन्धों पर ये देश चलता है, उनके साथ खड़े हैं या नही? ये हमारे ज़मीर का फैसला करेगा।

This article was originally published by Geeta Kumari in Trolley Times

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