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विकलांगता – एक समस्या

लोगों के बीच आज भी ऐसी अनेक पुरानी अवधारणाएं फैली हुई हैं जहां एक विकलांग बच्चे के जन्म को उसके तथा मां बाप के बुरे कर्मों का फल माना जाता है ।

“पागल , मूर्ख ,लंगड़ा , अंधा ” ये शब्द बोलचाल की भाषा में इस्तेमाल किए जाने वाले बहुत ही आम शब्द हैं । इन शब्दों का प्रयोग इसलिए किया जाता है ताकि सामने वाले को यह महसूस कराया जा सके कि उसने को काम किया है वह गलत है या मूर्खतापर्ण है।उस व्यक्ति को यह एहसास दिलाया जाता है कि वह कहीं न कहीं उनसे अलग है,कमतर है, कमजोर है। हालंकि हम इन शब्दों का प्रयोग अपने दोस्तों के बीच कभी भी कर देते हैं।बेशक वो शारीरिक और मानसिक रूप से  स्वस्थ क्यों न हों। हम कभी इस बात पर गौर नहीं करते की इन शब्दों का मज़ाक बना कर हम वास्तव में उन लोगों का मज़ाक बनते हैं जो इस समुदाय से संबंध रखते हैं।

विकलांगता / दिव्यंगता एक ऐसी स्थिति है जो किसी व्यक्ति के जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित करती है। यह व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ बना देती है। इस स्थिति के साथ वाले लोग खराब स्वास्थ्य परिणामों का अनुभव करते हैं। साथ ही शिक्षा और रोजगार के अवसरों के लिए कम पहुंच रखते हैं । विकलांग व्यक्ति व्यापक बाधाओं का अनुभव करते हैं। 

जहां एक ओर समाज और सरकार इन सबके लिए बेहतर अवसरों की उपलब्धि का प्रयास कर रही है।उन्हें एक बेहतर विकल्प के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ने का मौका दे रही हैं।वहीं दूसरी तरफ आज भी ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जहां विकलांगता को एक पाप माना जाता है। लोगों के बीच आज भी ऐसी अनेक पुरानी अवधारणाएं फैली हुई हैं जहां एक विकलांग बच्चे के जन्म को उसके तथा मां बाप के बुरे कर्मों का फल माना जाता है । ऐसा समाज इन विशेष रूप से कमजोर बच्चों को कभी स्वीकार नहीं करता । कभी कभी तो उसके खुद के माता पिता उसे छोड़ देते हैं। 

इन बच्चों के लिए विशेष स्कूलों का निर्माण किया गया है लेकिन हम सभी जानते हैं कि आज भी ऐसे अनेक पिछड़े इलाके हैं जहां के लोगों कि पहुंच इन विद्यालयों एक नहीं है। चाहे वह पैसे की कमी के कारण हो या जानकारी कि कमी के कारण वे अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं भेज पाते। कुछ माता पिता अपने बच्चों को आम स्कूलों में भेजते  हैं कि वहां जाकर उनके बच्चों का विकास होगा । लेकिन ऐसे अनेक उदाहरण हमने देखें हैं जहां अध्यापकों द्वारा इन बच्चों के साथ भेदभाव किया गया। क्योंकि वो सभी अध्यापक ऐसे बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहते जो उनकी किसी भी बात पर कोई प्रतिक्रिया या उनके प्रश्नों के सही उत्तर नहीं देते । उनके मन में पहले से ही यह धारणा बन जाती हैं कि यह शारीरिक / मानसिक रूप से कमजोर है और कुछ नहीं कर सकता ।

ऐसे माहौल में बच्चों की स्थिति पहले से और अधिक विषम हो जाती है। खेल कूद के समय अन्य बच्चे उन्हें खुद से दूर रखते हैं कोई उनके साथ खेलना नहीं चाहता। क्योंकि उन बच्चों को लगता है कि ये बच्चे कमजोर हैं और इनसे कुछ नहीं हो सकता। ऐसे में दिव्यांग बच्चे न चाहते हुए भी अपने ही समाज में एक अलग पहचान के साथ जीते हैं। जो उन्हें उन सभी आम लोगों से अलग बनती है । जिसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है । कभी कभी बच्चे इन बातों को इतना अधिक महसूस करते हैं की उनकी मानसिक स्थिति बहुत अधिक प्रभावित हो जाती है।  जिसके कारण वो कभी भी आम लोगों की तरह जीवन जीने का सपना देखना ही छोड़ देते हैं और एक संकुचित मानसिकता में ही सीमित हो कर रह जाते हैं।

सरकार हर संभव प्रयास कर रही है इन बच्चों की जिंदगी को बेहतर बनाए रखने के लिए । लेकिन सरकार के साथ हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि हम उन्हें खुद से अलग और कमजोर महसूस न होने दे। उनके साथ ऐसा व्यवहार न करें और न ही होने दे जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़े।

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