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कामुकता और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों पर चर्चा यू कैन फाउंडेशन के साथ

सबसे पहले तो कोई इस विषय पर बात ही नहीं करना चाहता है, खासकर बच्चे के माता पिता।साथ ही इस विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने से भी कतरा रहे थे।क्योंकि उन्हें लगता है कि यह हमारे बच्चे के लिए जरूरी नहीं है। अब समय आगया है कि लोग साथ में जुड़े और स्वयं इन विषयों पर प्रश्न करना और उनसे अनुभव इकठ्ठा करना शुरू करें।

यू कैन फाउंडेशन (You Can Foundation) द्वारा 18 मई 2020 को एक अहम मुद्दे (Sexuality and Reproductive Health Rights) पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया। यह चर्चा गूगल मीट ऐप की मदद से लाइव आयोजित की गई। चर्चा की शुरुआत 3 बजे हुई। इसकी शुरुआत यू कैन फाउंडेशन के संस्थापक ने अपनी इस संस्था के एक छोटे से परिचय के साथ की । उसके बाद उन्होंने सभी पैनलिस्टों का परिचय दिया और चर्चा को आगे बढ़ाया। इस चर्चा में मुख्य पैनलिस्टों में डॉ. सुरभि सिंह जो एक स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं साथ ही सच्ची सहेली नामक संस्था की संस्थापक भी हैं । रीमा अहमद एक कॉम्प्रिहेंसिव सेक्शुअलिटी एजुकेटर हैं , इन्होनें समय समय यौन शोषण जागरूकता और रोकथाम के लिए अनेक प्रयास किए हैं ।इसके साथ ही ये कैंडिडली की सह-संस्थापक भी हैं।इनके साथ  भुवना जी जो नोएडा इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल हैं।डॉ. अविजित चक्रवर्ती एक शिक्षाविद् और विकास सलाहकार है। वह पहले टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, तहलका, द पायनियर और द मैनमैन जैसे संगठनों में वरिष्ठ संपादकीय पदों पर रहे हैं । इन सभी के साथ ज्योत्सना मोहन जो एक पत्रकार हैं और इन्होंने बाल अधिकारों को लेकर काफी काम किया है, ने बतौर मध्यस्थ के रूप में भाग लिया और इस चर्चा को एक सफल मुकाम दिया।

इस चर्चा का मुख्य मुद्दा था कि किस तरह शिक्षक , माता पिता आपस में मिलकर अपने बच्चों को आने वाले समय में सेक्स एजूकेशन की तरफ एक सही रास्ता दिखा सकते हैं। इसकी शुरुआत ज्योत्सना मोहन करती हैं और समझाने का प्रयास करती हैं कि किस तरह हमारी सोसाइटी में  बच्चों तथा माता पिता के बीच विचारों की दूरी बन गई है। किस तरह बच्चे एक दोहरी मानसिकता -एक जिसकी उम्मीद समाज करता है और दूसरी उनकी वास्तविक मानसिकता के साथ जीते हैं । साथ ही इसमें उन्होंने इस बात को भी जोड़ा की माता पिता नहीं जानते कि उनके बच्चे को किसी विषय पर कितनी जानकारी है जिससे उन्हें लगता है कि बच्चा उतना ही जानता है जितना उसे सिखाया गया है। लेकिन वो इस बात को नजरंदाज कर देते हैं कि आज  के तकनीकी युग में बच्चों को उससे कहीं अधिक ज्यादा जानकारी है। इस विषय को आगे बढ़ाते हुए डॉ. चक्रवर्ती कहते हैं कि आज के माहौल में सोशल मीडिया के अपने कुछ नियम हैं। यहां हर विषय की जानकारी के लिए अनेकों स्त्रोत हैं । ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम एक सही स्त्रोत का चयन करे और यह निर्धारित करें कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी का जो अधिभार है उससे हम क्या सीख रहे हैं, उस जानकारी को हम किस दिशा में ले जा रहे हैं।डॉ. चक्रवर्ती ने साथ ही इसमें जोड़ा की अब समय आगया है कि लोग साथ में जुड़े और स्वयं इन विषयों पर प्रश्न करना और उनसे अनुभव इकठ्ठा करना शुरू करें।

इसके बाद भुवना जी से प्रश्न किया गया कि आप बतौर एक प्रिंसिपल इस तरह की परिस्थितियों को कैसे संभालती हैं। भुवना जी ने कहा कि सबसे पहले तो कोई इस विषय पर बात ही नहीं करना चाहता है, खासकर बच्चे के माता पिता।साथ ही इस विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने से भी कतरा रहे थे।क्योंकि उन्हें लगता है कि यह हमारे बच्चे के लिए जरूरी नहीं है। 

रीमा अहमद ने इस विषय पर आगे कहा कि सभी इस विषय से इसलिए पीछे हट जाते हैं, क्योंकि वो इस बात को नहीं जानते कि उनका बच्चा कितनी जानकारी रखता है और क्या वह जानकारी सही है।यदि उनको इस बात का पता हो कि उनके बच्चे को उनके शरीर और इच्छाओं के बारे में कितनी जानकारी किस उम्र में मिलनी चाहिए तो जो विचारों की दूरी उनके बीच बन जाती है उसको ख़त्म किया जा सकता है।इसलिए  यह जरूरी हो जाता है कि हम नए रास्तों कि खोज करें जिससे माता पिता और बच्चों को इस विषय में समझाया जा सके ।

चर्चा में लगातार श्रोताओं और वक्ताओं के बीच प्रश्नोत्तर का सिलसिला चलता रहा। रीमा अहमद के विचारों पर एक श्रोता रम्मा रैना ने प्रश्न उठाया कि क्या हमें इसकी शुरुआत बच्चों से करनी चाहिए या माता पिता से? इस पर रीमा अहमद ने बड़े स्पष्ट शब्दों में समझाया कि इसकी शुरुआत हमें बच्चों के घरवालों से ही करनी होगी।सबसे पहले हमें उन्हें इस विषय पर उन्हें सहज महसूस कराने की आवश्यकता है। जिसके लिए शिक्षकों को सीधे सीधे उनसे इस विषय में बात करनी चाहिए,उन्हें इसके बारे में जागरूक करना चाहिए। तभी माता पिता अपने बच्चों को इस मामले में बेहतर तरीके से समझा पाएंगे। रीमा जी ने इस वार्तालाप में एक और बिंदु जोड़ा जो  कि ऐसे विषयों को लेकर किस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है और किस तरह की भाषा का प्रयोग होना चाहिए। उन्होंने बताया कि हमें जरूरत है कि हम सहमति और सीमा की भाषा का प्रयोग करें जिससे माता पिता और बच्चे दोनों सहजता के साथ समझ सकें । रीमा अहमद ने इस इस विषय पर अपनी चिंता भी जाहिर की कि जब इस देश में इन विषयों को लेकर अनेक विशेषज्ञ हैं जो इस तरह के कार्यक्रमों का संचालन करने के लिए अत्यधिक प्रशिक्षित हैं। मगर हमारे शैक्षणिक संस्थान और माता पिता इस तरह के कार्यक्रमों में रुचि नहीं रखते।

इस स्थिति को किस तरह बदला जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ. अविजित चक्रवर्ती कहते हैं कि लोगों की इस मानसिकता को एक दिन में नहीं बदला जा सकता। क्योंकि यह एक लंबे समय से चली आ रही है। हमारे परिवार , दोस्त और समाज शुरू से इसी मानसिकता में जीते आ रहे हैं। एक समाज के रूप में हम लगातार पितृसत्तात्मक सोच के दायरे में ही सिमट कर रहे हैं।इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि माता पिता इस बात को समझे की उन्हें इन विषयों की पूर्ण जानकारी नहीं है। उन्हें पहले इस विषय के बारे में स्वयं को शिक्षित करना होगा और उसके बाद अपने बच्चों को।

डॉ. सुरभि सिंह ने चर्चा में आगे बताया की किस तरह स्कूल लड़कों और लड़कियों के बीच शुरू से ही एक असमानता का भाव जाने अनजाने पैदा कर रहे हैं।सेक्शुअलिटी या उससे संबंधित किसी भी विषय पर चर्चा करते हुए शिक्षक लडको और लड़कियों को अलग अलग पढ़ाते हैं। हालांकि उनका मकसद केवल इतना होता है कि बच्चे इस विषय को सहजता के साथ समझे । ऐसी स्थिति में शिक्षकों के लिए आवश्यक है वो इन विषयों पर पूरी तरह से आश्वस्त हों  ताकि जब भी कोई विद्यार्थी उनसे इन सभी पहलुओं पर बात करना चाहे तो बेझिझक उन्हें पर्याप्त और सही जनकरी दे सकें।अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. सुरभि ने कहा कि शिक्षकों और माता पिता को बच्चों को स्पर्श वृत्ति (touch instinct) की सही पहचान करानी चाहिए । वरना बच्चे एक अच्छे स्पर्श और बुरे स्पर्श में भेद नहीं कर पाएंगे और उन दोनों को आपस में मिला देंगे। 

बच्चों की भावनाओं और विषाक्त संबंधों (toxic relationship) के विषय पर रीमा अहमद ने कहा कि हमें अपने बच्चों को इन सब बातों पर सहज करना चाहिए ।उन्हें समझाना चाहिए कि वो जो भी महसूस के रहे हैं वह सब आम है। साथ ही उन्हें यह भी समझाना चाहिए की उन्हें किसी को भी अपनी भावनाओं और विचारों का फायदा नहीं उठाने देना चाहिए और खुद को बुरे रिश्तों / विषाक्त संबंधों से बचाना चाहिए।इसी विषय पर डॉ. सुरभि सिंह ने कहा कि आज हमारे लिए सबसे ज्यादा जरूरी है बच्चों के साथ एक स्वस्थ तरीके से बातचीत करनी चाहिए और उन्हें यौन शोषण के बारे में समझाना चाहिए । उन्हें  सेक्सुअल हैल्थ के बारे में बताना चाहिए । साथ ही उससे जुड़े कानूनी संदर्भों को भी समझाना होगा। डाॅ. सुरभि ने समझाया कि किस तरह बलात्कार के विषय को सहजता के साथ संभालना चाहिए। इस विषय को लेकर पीड़ित को डराना नहीं चाहिए बल्कि उसे विश्वास दिलाना चाहिए की वह ठीक है और इस घटना के कारण उसकी आने वाली जिन्दगी पर कोई असर नहीं होगा। 

चर्चा के अंतिम चरण में विषय को अच्छे से समझाते हुए डॉ. अविजित ने बहुत उत्साह से बताया कि इसके लिए सबसे जरूरी है कि शिक्षक और माता पिता इस बात को समझें की उनके बच्चे का लरनिंग ऐटिट्यूड कैसा है। फिर उसी के अनुसार हमें बच्चों को सिखाना चाहिए। जिससे बच्चा सरलता और सहजता से इन सभी जानकारियों को स्वीकार के सके।

अंत में चर्चा की मद्यस्थ ज्योत्सना मोहन ने सभी श्रोताओं तथा वक्ताओं का धन्यवाद किया और सभी पैनलिस्टों ने एक दूसरे को धन्यवाद करते हुए चर्चा की समाप्ति की।

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