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गधों की फ़ौज

गधों की फ़ौज

अचानक
एक सपने से जाग गया हूँ
मैं अकेला
घिरा हुआ था
गधों से
चारों तरफ से
जिधर भी नज़र जाए
एक बहुत बड़ी
बहुत भारी
गधों की फ़ौज
आँखें मेरी
खोज रही थीं
बड़ी शिद्दत से
मेरे अपनों को
दोस्तों को
रिश्तेदारों को
एक सहारे के लिए
मगर नज़र आया नहीं कोई
पता नहीं वे भी
उस फ़ौज में
जा मिले थे
कहीं?
आस पास कहीं नहीं था
कोई दूसरा आदमी
दूर कहीं
उस फ़ौज के पार
हो तो हो
नहीं कर रहे थे
मुझ पर कोई वार
वे गधे
बस  मुझे
देख देख हंस रहे थे
और आपस में
खुद ही लड़ रहे थे
एक दुसरे पे दुलत्तिआं झाड़ते
जोर जोर से रेंकते
बड़ा अजीब सा सपना था वो
कभी कुछ गधों के चेहरे की
जगह तैर जाता था
बड़े बड़े दिग्गज
नेताओं का चेहरा
फिर हो जाता
तब्दील गधों में
हे भगवान!
यह क्या हो रहा था
बारी बारी हर कोई तो
नजर आ जाता था उस फ़ौज में
सुबह शाम
अखबारों में
बड़ी बड़ी अक्ल की बात करने वाले
अख़बार-नवीस और दूसरे और
टीवी की चर्चाओं में
बढ़ बढ़ के भाग लेने वाले
संपादक, एंकर
और माननीय अतिथि
उन गधों के चेहरों में
बारम्बार झलकते
अरे यह क्या?
सोशल मीडिया में
बढ़ चढ़ के बातें करने वाले
शब्दों का जाला बुन
अपने को दूसरे से अधिक
बुद्धिमान साबित करने वाले
करोड़ों भी
इस विशाल फ़ौज में!
और वो बड़े बड़े
महान उपदेशक
इस फ़ौज
के बने हुए थे
सेनानायक
वे कानूनों की
लकीर पीटने वाले
उस लकीर के नाम पे लूटने वाले
आ मिले थे सब
इसी फ़ौज में
सब के चेहरे
गधों के चेहरों के साथ
गडमड होते हुए
गधों की
एक अस्सीम फ़ौज
और उस से घिरा
मैं बेचारा
अकेला
निरीह आदमी
हैरान परेशान
बिरादरी भाव
से एक दूसरे से जुड़ी
मुझ पर हंस रही थी
और फिर भी
कभी जान बूझ
कभी अनचाहे अनजाने
गधेपन से मजबूर
एक दूसरे को ही
कुचल रही थी
गधों, सिर्फ गधों की
फ़ौज
अचानक जाग गया मैं
पसीने से तरबतर
सोच रहा हूँ
तब से
इस सपने का मतलब

 

 

 

 

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Written by Atul Kumar

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