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बीते चार सालों में 32 प्रतिशत बढ़ी बिजली सब्सिडी: रिपोर्ट

रिपोर्ट में ऊर्जा मंत्रालय, राज्‍य सरकारों, डिस्‍कॉम्‍स, राज्‍य तथा केन्‍द्र के बिजली नियामक आयोगों तथा नियामकों के फोरम को डेटा रिपोर्टिंग को बेहतर बनाने और नीति निर्धारकों की मदद के लिये मिलकर काम करने की सिफारिश की गयी है।

राज्‍य सरकारों द्वारा बिजली दरों पर दी जाने वाली प्रत्‍यक्ष सब्सिडी में वित्‍तीय वर्ष 2016 से अब तक 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और वित्‍तीय वर्ष 2019 में यह बढ़कर 110391 करोड़ रुपये (15 अरब डॉलर) हो गयी है। इससे जाहिर होता है कि बिजली वितरण कम्‍पनियों (डिस्‍कॉम्‍स) में सुधारात्‍मक कदमों का कोई खास नतीजा नहीं मिला है। ‘अनपैकिंग इंडियाज इलेक्ट्रिसिटी सब्सिडीज’ विषयक एक ताजा रिपोर्ट में यह तथ्‍य सामने आया है।

रिपोर्ट में लगाये गये अनुमान के मुताबिक कुछ उपभोक्‍ताओं को लागत से भी कम दर पर बिजली देने से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये कुछ उपभोक्‍ताओं को ऊंची दर पर बिजली उपलब्‍ध कराने के लिये ‘क्रॉस सब्सिडीज’ के तहत पर वित्‍तीय वर्ष 2019 में कम से कम 75027 करोड़ रुपये अतिरिक्‍त खर्च किये गये। इससे सब्सिडी पर होने वाला कुल खर्च कम से कम 185418 करोड़ रुपये (25.2 अरब डॉलर) हो गया।

बिजली पर बढ़ती सब्सिडी इस बात की निशानी है कि उज्ज्‍वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (उदय) के लिहाज से विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) का प्रदर्शन बहुत खराब है। उदय केंद्र सरकार द्वारा संचालित एक बेलआउट योजना है, जिसके तहत वर्ष 2019 में डिस्कॉम्स से अपने वित्तीय प्रदर्शन को सुधारने की अपेक्षा की जाती है।

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) और काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरमेंट एंड वॉटर (सीपीडब्ल्यू) के अध्ययन के मुताबिक भारत के 31 में से 25 राज्य उदय योजना के तहत अपनी कुल तकनीकी और वित्तीय हानियों को घटाकर 15% तक लाने में नाकाम रहे हैं। इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2016 से सभी बिजली वितरण कंपनियों का बिक्री राजस्व भी 3% तक गिरा है, जबकि 31 में से 24 राज्यों में वर्ष 2019 में राजस्व का अंतर भी पाया गया। बिजली पर सब्सिडी देने वाले 26 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में से कोई भी बिजली दरों पर सब्सिडी दिए जाने के मामले में नेशनल टैरिफ पॉलिसी के नियमों का पालन नहीं कर सका। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक दुष्चक्र है। खराब वित्तीय प्रदर्शन के कारण बिजली सब्सिडी पर निर्भरता बढ़ती है और खराब तरीके से सब्सिडी का आकलन किए जाने से वित्तीय व्यवस्था और भी खराब होती है।

काउंसिल ऑन एनर्जी इन्वायरमेंट एंड वॉटर के प्रोग्राम एसोसिएट प्रतीक अग्रवाल ने कहा ‘‘यह एक गंभीर समस्या है। अगर डिस्कॉम अपनी लागतों की वसूली नहीं कर सकते हैं तो भी उपभोक्ताओं को दूसरे रास्‍तों से इसकी कीमत चुकानी होगी। भारत में हमें बिजली की खराब विश्वसनीयता और गुणवत्ता मिलती है।’’

शोधकर्ताओं ने इन चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए भारत के विभिन्न राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में बिजली सब्सिडी के डिजाइन की पड़ताल की। उन्होंने पाया कि राष्ट्रीय स्तर पर कृषि उपभोक्ताओं को सरकार द्वारा समर्थित बिजली का 75% हिस्सा उपलब्ध कराया जाता है।

प्रतीक अग्रवाल ने कहा ‘‘हालांकि यह किसानों की मदद के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन किसानों को कुल सब्सिडी का बड़ा हिस्सा दिया जाना कोई उदारता नहीं, बल्कि दक्षता के स्तर पर खराबी को जाहिर करता है। ज्यादातर राज्य, खासकर कम आमदनी वाले किसानों को फायदा देने को अपना लक्ष्य नहीं बनाते और ग्रामीण इलाकों में अनमीटर्ड बिजली उपभोग की सामान्य स्थिति का यह मतलब है कि सब्सिडीशुदा उपभोग की कोई अपर लिमिट तय नहीं की गई है।’’

उन्‍होंने कहा ‘‘उत्‍तर प्रदेश जैसे राज्‍य में कुल राजस्‍व का करीब 1.5 प्रतिशत हिस्‍सा ही बिलिंग और कलेक्‍शन पर खर्च किया जाता है। बिल देने जाने वाले कर्मियों पर जबर्दस्‍त दबाव है। सरकार इन खामियों से निपट नहीं पा रही है। इस पर काफी कुछ निर्भर करता है।’’

प्रतीक ने कहा कि कोविड काल में मांग सर्वकालिक निचले स्‍तर पर पहुंच गयी, जिससे डिस्‍कॉम्‍स की हालत और खराब हो गयी। इससे उबरने के लिये उन्‍हें टैरिफ ढांचे पर ध्‍यान देना होगा। यूपी की मिसाल लें तो वहां फिक्‍स और वेरियेबल चार्जेस में काफी अंतर है। इसे दूर करने की जरूरत है। सरकार को मूल्‍य श्रंखला में सततता लानी होगी।

इस रिपोर्ट में घरेलू उपभोक्ताओं को दी जाने वाली सब्सिडी की डिजाइन से संबंधित समस्याओं की भी पहचान की गई है। ज्यादातर राज्यों में घरेलू उपभोक्ताओं को दी जाने वाली सब्सिडी अनकैप्ड है और उपभोग बढ़ने की वजह से डिस्कॉम की वित्तीय व्यवहार्यता पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकते हैं।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि सब्सिडी में पारदर्शिता के स्तर पर और भी सुधार की गुंजाइश है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने सब्सिडी डाटा को स्पष्ट रूप से जाहिर करते हैं।

रिपोर्ट में ऊर्जा मंत्रालय, राज्‍य सरकारों, डिस्‍कॉम्‍स, राज्‍य तथा केन्‍द्र के बिजली नियामक आयोगों तथा नियामकों के फोरम को डेटा रिपोर्टिंग को बेहतर बनाने और नीति निर्धारकों की मदद के लिये मिलकर काम करने की सिफारिश की गयी है। इसके अलावा रिपोर्ट में डेटा रिपोर्टिंग का एकसमान प्रारूप तैयार किये जाने, उपभोक्‍ताओं के बिजली के बिल और सब्सिडी वितरण में विलम्‍ब पर लगने वाले शुल्‍क में पारदर्शिता सुनिश्चित करने, नियामक आदेशों और डेटा रिपोर्ट्स को समयबद्ध ढंग से जारी होना सुनिश्चित और बेहतर सब्सिडी टारगेटिंग के लिये सब्सिडी वितरण से सम्‍बन्धित डेटा में सुधार लाने की संस्‍तुतियां भी गयी हैं।

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट की कंसलटेंट अंजलि विश्वमोहनन ने कहा ‘‘सब्सिडी के आवंटन की सूचनाओं को जाहिर करने कि कोई समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण ज्यादातर मामलों में केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं की प्रभावशीलता का अंदाजा लगाना नामुमकिन होता है।’’

विशेषज्ञों का मानना है कि हालात और खराब होंगे, क्योंकि बिजली वितरण कंपनियां कोविड-19 के कारण हुए अतिरिक्त नुकसान से निपटने की जुगत में लगी हैं।

अंजलि ने कहा ‘‘बिजली दरों में बढ़ोत्‍तरी और वित्तीय बेलआउट विकल्प, दोनों ही सीमित हैं, क्योंकि उपभोक्ता और सरकार कोविड-19 के खिलाफ जारी लड़ाई के कारण नकदी की कमी से जूझ रहे हैं।’’

रिपोर्ट में कुछ ऐसी पद्धतियों की पहचान की गई है जिन्हें पूरे भारत में अपनाया जा सकता है। सब्सिडी देने वालों में से कोई भी परिपूर्ण नहीं है लेकिन अनेक उदाहरण भी हैं। पंजाब अपने यहां दी जाने वाली बिजली सब्सिडी की सूचना देने तथा सब्सिडी देने में विलंब के कारण लगने वाले जुर्माने को लेकर खासी पारदर्शिता दिखाता है। वहीं, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश ने अपने-अपने यहां प्रत्यक्ष सब्सिडी पर कुल निर्भरता में कमी हासिल की है।

विशेषज्ञों ने इस बात की पुरजोर वकालत की है कि बिजली सब्सिडी का बेहतर तरीके से लक्ष्य तय किया जाना चाहिए और यह समस्या समाधान का एक हिस्सा होना चाहिए। बेहतर लक्ष्य तय किए जाने से कुल खर्च में कटौती की जा सकती है। अधिक आय वाले उपभोक्ताओं के लाभों में कटौती करके तथा कम आमदनी वाले उपभोक्ताओं को मिलने वाली सब्सिडी बरकरार रखने या फिर उन्हें प्राप्त लाभों को और बढ़ा करके भी हालात को बेहतर किया जा सकता है। हालांकि डाटा से पता चलता है कि अनेक राज्यों ने अभी तक इस उपाय को नहीं अपनाया है। पिछले साल 24 में से 12 राज्यों ने अपने-अपने यहां बिजली सब्सिडी में इजाफा किया है।

आईआईएसडी में एनर्जी विशेषज्ञ श्रुति शर्मा ने कहा ‘‘सबसे पहले तो सब्सिडी देने में पारदर्शिता को बढ़ाना चाहिए और सब्सिडी संबंधी सूचनाओं को साझा करने की समुचित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। बिजली दर तथा सब्सिडी डिजाइन से संबंधित प्रभावी नीति बनाए जाने के लिए सब्सिडी आवंटन को लेकर स्पष्टता बेहद जरूरी है।’’

श्रुति ने कहा ‘‘सभी को बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सब्सिडी की अहम भूमिका है लेकिन अगर उनकी दिशा सही नहीं हो, तो बिजली  वितरण कंपनियों को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। आखिरकार इसका असर सभी उपभोक्ताओं को मिलने वाली बिजली की विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर पड़ता है। देश में बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय हालत में सुधार के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।’’

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Written by Nishant

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