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आटा–साटा की कुरीति – भारतीय समाज की सच्चाई

कुछ मामलों में लडकियों को छोड़ दिया जाता है जिसमें लडके के परिवार को क़ानूनी कार्यवाही का दबाव बनाकर पैसे लेकर समझौता करते है। यह पैसे लडकी का परिवार लेता है जो लडकी को भी शायद ही मिलता है। 

आटा–साटा एक कुरीति है जिसको हम इस प्रकार समझ सकते है की किसी की बहन की शादी किसी लडके से कर रहे है तो उस लडके की या उसके परिवार की जिम्मेदारी होगी उस लडकी के भाई की शादी करवाना। सीधे-सीधे शब्दों में समझे तो लडकी के बदले लडकी लेना और देना एक आटा–साटा है। राजस्थान के सभी क्षेत्रो में यह कुरीति है जिसको एक बाल विवाह के साथ जोड़ा जा सकता है क्योंकि आटा–साटा बाल विवाह में बहुत होता है !

यह सोच कर बड़ा अजीब लगता है कि वह भारत जो अपने आप को दुनिया की महाशक्ति के रूप में उभार रहा है,  उसमे आज भी एसी कुरीतियाँ है जिन पर कोई बात नहीं कर रहा है। जहाँ बालविवाह की बात करे तो इसमें दो अपरिपक्व लोग आपस में एक बंधन में बंध रहे है, वेसे तो भारत में बाल विवाह क़ानूनी रूप से एक अपराध है। परन्तु बाल विवाह आज भी इस भारतीय समाज का एक काला सच है जिसे आज का युवा और ग्रामीण लोग जानते तो है परन्तु इसमे बदलाव के लिए मानते नही है।

बाल विवाह के साथ एक और कुप्रथा चली आ रही है जो आटा–साटा है जिसके परिणामों से समाज में बहुत गलत कार्य हो रहे है। आटा–साटा मुख्य रूप से पिछडे वर्ग और दलित वर्ग में हो रहे है। जिसके मुख्य कारण लडकी की शादी को माता पिता द्वारा अपने उपर बोझ समझना, शिक्षा का अभाव, रूढ़िवादी अंधविश्वास, निम्न आर्थिक हालात। सबसे ज्यादा आटा–साटा के कारण यह है कि लडकी के परिवार में डर कि उनके लडके की शादी नहीं होगी क्योकि आजकल भारतीय समाज में एक सच है यदि आप गरीब और पिछड़े है तो आपके लडके की शादी नही होगी !

इस डर के कारण कोई भी माता–पिता अपनी लडकी की शादी करते समय तय करते है कि उनके लडके की शादी वो लडकी वाला परिवार करवायेगा। यह आटा–साटा एक चैन की तरह है जिसमे कई परिवार जुड़े हुए होते है। सभी कुछ शर्तों के साथ आपसी सहमती करके इसके लिए तेयार होते हैं और आपस में एक दूसरे के लडके-लडकियों की शादी करवाते है।

उदाहरण के लिए तीन परिवार है जिनके मुखिया का नाम इस प्रकार  है – मदन, मोहन व सोहन। इन सभी के घर  एक लड़का और एक लडकी है (कई  केसों में कम ज्यादा भी हो सकते है) “मदन” अपनी लडकी की शादी “मोहन”  के लडके से तय करता है इस शर्त के साथ की “मदन” के लडके की शादी करवाना “मोहन” की जिमेदारी है, तो “मोहन” अपनी लडकी की शादी “सोहन” के लडके के साथ तय करेगा साथ में शर्त रहेगी की “सोहन” अपनी लडकी की शादी “मदन” के लडके से करेगा। इस तरह आप इससे समझ सकते हैं कि किस तरह आपस में यह समझौता होता है, जिसमें आपस में लड़की देना और लडकी लेना की परंपरा चलती है ।

वर्तमान समय में इस आटा–साटा के कारण आपस में अनेक रिश्ते टूट रहे हैं। जिससे ऐसे कार्य होते है, जिनसे समाज में और कई कुरीतियाँ जन्म ले रही हैं। इन कुरीतियों के कारण लड़की और लडके की जींदगी में सामाजिक समस्याएं आती हैं और समाज में उनको एक अलग नजर से देखा जाता है। इनमे से कई लडके और लडकियों के आपस में तालमेल नही होने के कारण ये रिश्ते टूट जाते है।

कुछ मामलों में लडकियों को छोड़ दिया जाता है जिसमें लडके के परिवार को क़ानूनी कार्यवाही का दबाव बनाकर पैसे लेकर समझौता करते है। यह पैसे लडकी का परिवार लेता है जो लडकी को भी शायद ही मिलता है।

कई ऐसे भी केस होते जिनमें लडकी को मजबूरन लडके के साथ रहना पड़ता है उसकी इच्छा के विरुद्ध भी। क्योकि अगर वह वहाँ नहीं रहती है तो उसके परिवार की इज्जत ख़राब हो जायगी और समाज में लोग उसके परिवार पर उंगुली उठायेंगे। इसलिए लडकियां सबकुछ सहन करती है, उस परिवार में रहकर।

इस कुरीति के कारण लेखक के निजी अनुभव से पिछले एक साल में राजस्थान के दुदू और किशनगढ़ के गावो में 50 से अधिक मामले सामने आये हैं। जिनमें से एक भी क़ानूनी कार्यवाही के लिए नहीं गये है। आप सोच सकते हैं राजस्थान के दो तालुकों में इतने मामले आये तो बाल विवाह तो सम्पूर्ण राजस्थान में होता है। इस तरह के कितने युवा विशेष रूप से लडकियों को कितना कुछ सहना पड़ रहा है।

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