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फेरीवालों का शोषण

वे आज भी अपनी रेहड़ी-ठेला लगाने के लिए MCD से लेकर पुलिस तक को पैसा देते हैं, इसके बाद भी उन्हें कभी भी उजाड़ दिया जाता है।

Hawkers

सुबह उठते ही जो आवाज पहले कान में पड़ती है वो किसी फेरी वाले की ही होती है। झाडू वाला, रद्दी वाला, पालिश वाला, सब्जी वाला, हर माल वाला, पानी पतासे वाला, प्रेशर कुकर वाला- सब फेरी वाले एक के बाद एक आते हैं और चले जाते हैं।      

लेकिन हमारा समाज और कानून व्यवस्था इन लोगों को हमेशा नजरंदाज करती रहती है।रेहड़ी पटरी आजीविका संरक्षण कानून 2014 में पारित हो गया लेकिन ज़मीन पर आज तक नहीं उतरा। लोगों का कहना है कि वे आज भी अपनी रेहड़ी-ठेला लगाने के लिए MCD से लेकर पुलिस तक को पैसा देते हैं, इसके बाद भी उन्हें कभी भी उजाड़ दिया जाता है।

अलग अलग राज्यों में इन रेहड़ी पटरी वालों की संख्या अलग अलग है। परंतु कोई भी राज्य आजतक इसके स्टीक आंकड़े सामने नहीं रख सका है। 

मुंबई की राजनीति में इन फेरीवालों की एक अहम भूमिका है । क्योंकि मुंबई में राजनीति चमकाने के जितने भी तरीके हो सकते हैं उनमें सबसे सरल तरीका है फेरीवालों की पिटाई करना। क्योंकि वहां यह मान लिया गया है कि फेरीवाले आम आदमी के लिए समस्या हैं। यह सच है कि सड़क पर रेहड़ी लगाकर धंधा लगाने वालों से आम आदमी को चलने-फिरने में तकलीफ होती है, यातायात अवरूद्ध होता है, सड़कों पर गंदगी होती है। लेकिन इसके लिए सड़क पर रेहड़ी लगाकर दो वक़्त की रोटी कमाने वालों को दोष देना सरासर नाइंसाफी होगी। इसके लिए हमारी-आपकी सरकारें और सरकारों को सलाह देने वाला प्रशासन फेरीवालों से कहीं ज्यादा जिम्मेदार है।

अगर फेरीवालों को मार-पीटकर भगाने से इस समस्या का समाधान होना होता तो बहुत पहले हो गया होता। परंतु हकीकत यही है कि तेजी से विकसित होते तमाम शहरों और महानगरों में विकराल होती इस समस्या का समाधान किसी को नहीं चाहिए। क्योंकि वहां किसी के किसी को वोट चाहिए तो किसी को नोट चाहिए।

मुंबई में फोरीवालों का मुद्दा 80 के दशक से राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस का मुद्दा बना हुआ है। 80 के मध्य में जब फेरीवालों को हटाने के लिए शासन और प्रशासन के स्तर पर मुहिम चलाई गई तो 1985 में फेरीवालों ने सर्वोच्च अदालत में गुहार लगाई। अदालत ने फेरीवालों के पक्ष में फैसला दिया और कहा कि फेरीवाले फुटपाथ पर धंधा कर सकते हैं लेकिन राहगीरों को चलने के लिए जगह मिलनी चाहिए।

तीन बार 2003, 2007 और 2010 में ‘हॉकर्स पॉलिसी’ लाई गई। यह काम बड़े सोचे-समझे तरीके से किया गया क्योंकि अगर पॉलिसी की जगह कानून लागू किया जाता तो उस पर अमल करना अनिवार्य हो जाता। 2010 में फेरीवाले फिर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए। तब सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त आदेश दिया कि जब तक केंद्र सरकार कानून नहीं बनाती, तब तक 2010 की पॉलिसी के अनुसार फेरीवालों को कानूनी संरक्षण दिया जाए। 2010 की हॉकर्स पॉलिसी के मुताबिक, शहर की कुल जनसंख्या जितनी है उसके ढाई प्रतिशत तक फेरीवाले शहर में हो सकते हैं।

अगर सरकार मानती है कि फेरीवाले आम नागरिकों के लिए, यातायात के लिए, कानून और व्यवस्था के लिए समस्या हैं तो वह इसे हल करने के लिए युद्ध स्तर पर उसी तेजी के साथ काम क्यों नहीं कर रही । 30 साल पहले सरकार ने मुंबई में 15 हजार फेरीवालों को लाइसेंस दिए थे। उसके बाद से सरकार को पता ही नहीं है कि मुंबई में कितने फेरीवाले हैं।

सरकार कहती है 1 लाख फेरीवाले हैं। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने 18 साल पहले एक सर्वे किया था, जिसमें 1 लाख 8 हजार फेरीवाले होने का दावा किया गया था। फेरीवालों की यूनियन का दावा है मुंबई में ढाई लाख फेरीवाले हैं । सरकार ने आखिरकार एमएनएस की गुंडागर्दी के सामने नतमस्तक होकर मेहनत से रोजी-रोटी कमाने वाले फेरीवालों को पिटने के लिए क्यों छोड़ दिया? क्या सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब है?

ऐसे ही उत्तर पूर्वी दिल्ली  के खजुरी चौक पर कई सारे लोग रेहड़ी पटरी लगाते हैं। ऐसे ही अनेक रेहड़ी वाले जो पिछले 10  सालों से फल का ठेला लगाते हैं। उन्होंने कहा कि इतने साल हो जाने के बाद भी आजतक वो अपने आजीविका को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। वे कहते हैं कि हम आज भी यहाँ ठेला लगाने के लिए MCD से लेकर पुलिस तक को पैसा देते हैं,  इसके बाद भी कभी भी MCD और दिल्ली पुलिस के लोग आकर उनके फल का ठेला पलट देते हैं।

उन्होंने बताया कि अधिकतर ऐसी घटनाएं तब होती हैं जब कोई नया अधिकारी इलाके में आता है, तो वो अपनी धौंस दिखाने और रिश्वत की दर बढ़ाने के लिए ऐसा करता है। 

देश की राजधानी  दिल्ली में एक बड़ी समस्या रेहड़ी पटरी वालों की  है, लेकिन यह कभी किसी भी दल के लिए मुख्य मुद्दा नहीं बनती। कभी-कभार कोई दल इनकी बात करता है। अभी भी अक्सर दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में ये देखा जाता है कि पुलिस से लेकर एमसीडी तक इन रेहड़ी पटरी वालों को अपनी जगह से हटा देती है। कभी भी इनके सामान को सड़क पर फैला देती है तो कभी गाड़ियों में भरकर अपने साथ ले जाती है। 

एक अनुमान के मुताबिक पूरे देश में 2.50 करोड़ रेहड़ी पटरी वाले हैं। इनकी समस्या को देखते हुए ही पूर्व यूपीए की सरकार में रेहड़ी पटरी आजीविका संरक्षण बिल 2013 में तैयार हुआ जिसने 2014 में संसद से पास होकर कानूनी रूप ले लिया। इस कानून के द्वारा रेहड़ी पटरी वालों पर पुलिस व नगर निगमों द्वारा होने वाले अत्याचारों पर भी लगाम लगाने का प्रयास किया गया।

दिल्ली में रेहड़ी पटरी आजीविका संरक्षण कानून 2014 को लागू करते हुए निम्न बिन्दुओं पर ज़ोर दिया गया-

  1. क्षेत्र की कुल आबादी के ढाई प्रतिशत रेहड़ी पटरी वालों को काम करने के सर्टीफिकेट दिए जाएंगे अर्थात दिल्ली में लगभग 5 लाख रेहड़ी पटरी वालों को कानूनी रूप से अपनी आजीविका कमाने की अनुमति मिलनी चाहिए।
  1. टाउन वेंडिंग कमेटी में रेहड़ी पटरी वालों की ओर से प्रितिनिधित्व करने वालों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। 
  1. टाउन वेंडिंग कमेटी क्षेत्रों का सर्वे करेगी जिसके बाद दिल्ली में जगह चिह्नित करके 5 लाख लोगों को आजीविका कमाने के लिए अनुमति देगी।
  1. रेहड़ी पटरी वालों को जब तक एक स्टीक और टिकाऊ जगह नहीं मिल जाती तब तक उनको हटाया नहीं जाएगा।

 दिल्ली सरकार को इस कानून को छह महीने के भीतर नियम बनाकर एक वर्ष की पॉलिसी बनानी थी लेकिन अभी  तक दिल्ली सरकार ने रेहड़ी पटरी जीविका संरक्षण कानून को दिल्ली में पूरी तरह से लागू नहीं किया है। जबकि रेहड़ी पटरी वाले गरीब व मजदूरों के वोटों के द्वारा ही दिल्ली में ऐतिहासिक जीत  दर्ज की थी |

यदि हाल ही कि बात की जाए तो इस महामारी के समय में इन लोगों की हालत और भी अधिक खराब हो गई है। लॉकडाउन के चलते इन लोगो की रोजी रोटी कमाने के सारे रस्ते बन्द पड़ गए हैं। हालांकि देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) के रेहड़ी-पटरी वालों को 5 हजार करोड़ रुपये लोन के लिए घोषणा की । मगर इससे अभी भी हजारों पटरी वालों में असंतोष है।

देश के 24 राज्यों से 9 लाख 90 हजार पटरी वालों के रजिस्ट्रेशन वाली संस्था नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्ट्रीट वेंडर्स इन इंडिया (NASVI) का कहना है कि लॉकडाउन (Lockdown) के बाद से अधिकांश पटरी वाले भूखे मरने को मजबूर हैं। चौतरफा मार झेलने वाले रेहड़ी पटरी वालों के लिए सरकार ने ऋण की घोषणा तो कर दी है लेकिन यह ऋण तभी लिया जाएगा जबकि वे लोग भूख से जिंदा बच पाएंगे। 

सभी रेहड़ी पटरी वाले या फेरीवाले इतने अधिक पढ़े लिखे नहीं हैं और नहीं ही उन सबके पास इतने संसाधन है कि इस महामारी के दौर में वो घरों से बाहर निकल कर ऋण लेने जाए। न जाने कितने ही फेरीवालों को संचार के साधनों के अभाव में अभी तक इस खबर का पता भी नहीं लग सका होगा।इससे साफ साफ समझ आता है कि केवल लोन देना रेहड़ी-पटरीवालों की समस्या का समाधान नहीं है। इसके लिए सरकार को धरातलीय स्तर पर उतर कर इन सभी के लिए योजनाएं और कानून लागू करने होंगे। 

क्योंकि रेहड़ी वाले का व्यापार कम पैसों में भी शुरू हो सकता है लेकिन इसके बाद आने वाली मुश्किलें इतनी ज़्यादा हैं कि वह रोजाना कमाकर बमुश्किल ही परिवार का पेट भर पाता है।

आज दिल्ली से लेकर पूरे भारत में ठेला, रेहड़ी और पटरी बाजार की रीढ़ हैं। देश के घरों में ज़रूरत का 80 फीसदी सामान आज इन पटरी बाजार से ही मिलता है । लेकिन कोरोना की इस मार के बाद हुए लॉकडाउन में पटरीवाले सबसे ज्यादा मुसीबत झेल रहे हैं।

आज लॉकडाउन के लगभग 4 महीने बीत जाने के बाद पटरी वालों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल ज़िंदगी बचाने की है। रोज कमाकर रोज खाने वाले इन लोगों को इस वक्त खातों में सीधे कैश की ज़रूरत थी ताकि इस बेरोजगारी और कठिन वक्त में दो जून की रोटी खाकर ज़िंदा रह सकें। लोन की घोषणा करके सरकार ने इन लोगों की समस्या को समझा तो है लेकिन उसका कोई निदान नहीं निकाला है। ये लोग लोन तो तब लेंगे जब लॉकडाउन खुलेगा, बैंक में लोन की कार्रवाई और कागज पूरे होंगे। तब तक न जाने कितने लोग मारे जाएंगे।

कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से देश भर में लोग परेशान हैं लेकिन इसमें सबसे अधिक परेशानी ठेलों पर सब्जी बेचने वाले और छोटे दुकानदारों को हो रही है। बीते कुछ दिनों में सब्जी, फल बेचने वाले खासतौर पर मुसलिम समाज के लोगों के आर्थिक बहिष्कार करने और उन्हें प्रताड़ित करने की घटनाएं सामने आई हैं।

दरअसल लॉकडाउन के बाद और निजामुद्दीन की मरकज वाली घटना के बाद से सोशल मीडिया पर तमाम तरह के नफरत फैलाने वाले झूठे तथा पुराने वीडियो वायरल हुए। इसका असर अब जमीन पर दिखने लगा है।

सब्जी बेचने वाले  बताते हैं, ‘अब से पहले कोई हमारा नाम नहीं पूछता था। अब हर दूसरी गली में कोई आकर आई कार्ड मांग लेता है। यदि ठेले वाला हिंदू है तो छोड़ देते हैं। लेकिन अगर कोई मुसलमान होता है तो उसे भगा देते हैं। इससे दिख रहा है कि हमारे समाज में सांप्रदायिकता का जहर किस तरह से घोला जा चुका है।

मुसलमान सब्जी वालों के साथ क्या हो रहा है यह बात किसी से छिपी नहीं है। आए दिन ऐसे अनेक वीडियो देखने को मिले जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोगों के ठेलों को कॉलोनी में नहीं जाने दिया गया और उन लोगों के साथ भी बुरा व्यवहार किया गया। ऐसे भी वीडियो देखने को मिले जिनमें कहा जा रहा था कि आप लोग केवल हिंदू रेहड़ी वालों से सामान लीजिए और मुसलमानों को अपनी गली मोहल्लों से दूर रखिए। ये आपकी और हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है।

उत्तर प्रदेश में भी ऐसे हालात देखने को मिले। उत्तर प्रदेश पुलिस ने कई ऐसे लोगों को गिरफ़्तार किया जो इस तरह की अफवाह फैला रहे थे। दिल्ली में भी एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जिसने सब्जी विक्रेता के साथ डंडे से मारपीट और गाली गलौज किया था। यह घटना ताजपुर रोड इलाके में घटित हुई थी।  

इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया, जिसके बाद पुलिस को उसके साइबर सेल से एक संदेश मिला। वीडियो में, बदरपुर एक्सटेंशन निवासी प्रवीण बब्बर सब्जी विक्रेता से अपना पहचान पत्र दिखाने के लिए कहता है, लेकिन वह नहीं दिखा सका। वह आदमी फिर गुस्से से उसका नाम और पता पूछता है। जब सब्जी विक्रेता खुद को मोहम्मद सलीम बताता है, तो आदमी उसे गाली देता है और उसकी पिटाई करता है। वह उसे इस  इलाके में नहीं आने की धमकी भी देता है।ऐसे ही न जाने और भी कितने मामले हैं जिनमें इन मेहनत कर के अपना गुजारा करने वाले फेरी वालों पर अत्याचार किए जाते हैं।

 

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