in , , , ,

व्यंग्य : फेसबुकिया चक्रव्यूह

आज के इस ‘सोशल नेटवर्किंग ‘ युग में फेसबुक पर अकाउंट होना ‘सोशल’ होने का पहला पैमाना है

आज मैं एक सज्जन से मिला। नहीं…भ्रमित मत होइए, वास्तव में नहीं…. फेसबुक पर। आज के इस ‘सोशल नेटवर्किंग’ युग में फेसबुक पर अकाउंट होना ‘सोशल’ होने का पहला पैमाना है। देश दुनिया के विभिन्न राजनैतिक एवं अन्य समसामयिक विषयों पर ज्ञान पेलते नाना प्रकार के “बुद्धिजीवी चिलांड्रू” आपको फेसबुक पर मिल जाएंगे। अरे नहीं! मैं इन सज्जन को “बुद्धिजीवी चिलांड्रू” नहीं कहना चाहता…. पर यदि आप कहना चाहें तो मुझे कोई आपत्ती नहीं होगी।

तो बात कुछ यूं है कि ये सज्जन फेसबुक पर “निडर ब्राह्मण” के नाम से पाए जाते हैं। प्रोफाइल पर एक भगवे फ्रेम में कैद शख़्स का फोटो लगा है जिसने गले में एक भगवा गमछा डाला हुआ है तथा आंखों पर काला चश्मा है। ये महाशय अपने नाम से अपने एक जाति विशेष से ताल्लुक़ रखने का ढिंढोरा पीट रहे हैं, तथा प्रोफ़ाइल चित्र का भगवामय होना उनका किसी विशेष संप्रदाय का कट्टर अनुयायी होने का प्रमाण है। मैं आज कई दिनों बाद अपने फेसबुक अकाउंट के होम पेज को स्क्रॉल कर रहा था, कि तभी मेरी निगाह इन्हीं श्रीमान ‘निडर ब्राह्मण’ की एक पोस्ट पर ठहर गई, जिसमें महाशय दो भिन्न संप्रदायों के पूजन स्थलों में भेद करते हुए, एक को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने में अपना शब्दकोश रिक्त कर चुके थे। मैंने नीचे देखा ‘356 लाइक्स और 57 कमेंट्स’! आम तौर पर मैं ऐसी पोस्ट्स की उपेक्षा कर आगे बढ़ जाने में ही भलाई समझता हूं, परन्तु इन महाशय के शब्दों की मृदुता के गुरूत्वाकर्षण ने मुझे आकर्षित कर लिया था। मैंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पोस्ट पर अपना अंगूठा रख दिया और टिप्पणियों को पढ़ने लगा। मैं यह देख के हैरान था कि तक़रीबन सभी टिप्पणीकार न सिर्फ महाशय की हां में हां मिलाने में मशगूल थे बल्कि उनकी बात को और अधिक तीव्रता दे रहे थे। मैं चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु सा अनुभव कर रहा था जहां मेरे चारों ओर खड़े महारथी मुझे धराशायी करने के लिए तैयार खड़े थे। मैं आम तौर पर ऐसी अनर्गल बहसों में हिस्सा नहीं लेता, परन्तु ‘निडर’ जी के अत्यंत मृदु शब्दों में की गई अपील “आप सभी सुधी पाठकों का विचार जानना चाहता हूं, कृपया मार्गदर्शन करें” से मैं खुद को रोक नहीं सका, और मैंने अपने चिर-परिचित मुखर अंदाज़ में एक टिप्पणी पेल दी और आगे बढ़ गया। मुझे टिप्पणी किए हुए 5 मिनट भी नहीं हुए थे कि ‘निडर’ जी का जवाब मेरे नोटिफिकेशन बॉक्स में चमकने लगा। उनकी सक्रियता देखकर मैं हैरान था। मैंने उनका जवाब खोला और पढ़ना शुरू किया। “अनादि ब्रह्म! आप जैसे लोग हमारे सनातन धर्म के नाम पर कलंक हैं। आप न तो हमारे धर्म के बारे में कुछ सोच सकते हैं, न ही कर सकते हैं। आपको क्या लगता है, कि आप यदि मस्जिद या चर्च में जाकर अपना माथा रगड़ेंगे तो आपका ईश्वर आपसे खुश होगा! गलत फहमी में जी रहे हैं आप। आप जैसे पथभ्रष्ट लोग हमारे धर्म के लिए नासूर बन गए हैं। आपके जैसे भटके हुए लोग जो कम्युनिज्म की गन्दगी में पलते हैं, हम जैसे सनातन धर्मी से कभी सहमत नहीं हो सकते।” उनके शब्दों की मृदुता अब समाप्त हो चुकी थी और अब वो और तल़्ख होते जा रहे थे।

“नाम रखा हुआ है ‘ब्रह्मा’ और ज्ञान दो पैसे का नहीं है। आप जैसे लोग सच्चे सनातनी तो छोड़िए, सच्चे इंसान भी नहीं बन सकते। आपके जैसे भ्रष्ट मानसिकता के लोग पैसों पर भटकने वाली तड़पती हुई आत्मा हैं, जो दूसरे धर्मों का महिमामंडन कर अपने देवी-देवताओं का अपमान करते हैं। इसलिए आप अपना कचरा किस्म का ज्ञान मेरी पोस्ट पर मत देना वरना जैसा आप ज्ञान दोगे वैसा ही जवाब सुनने को पाओगे। बहुत बर्दाश्त कर लिया हमारे धर्म ने, अब सिर्फ प्रतिकार होगा। आप जैसे अधर्मी बस दूसरे धर्मों के प्रति अपनी वफादारी दिखाते रहिए, पर हम अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। जय श्रीराम!”

मैं उनका पूरा जवाब पढ़ भी नहीं पाया था कि आठ अन्य टिप्पणीकार अपनी व्यंग्यात्मक टिप्पणियां मुझे प्रेषित कर चुके थे। कोई मुझे धर्म का ज्ञान दे रहा था, तो कोई अभद्र उपाधियों से नवाज़ रहा था। मैं वाद-विवाद के इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु सा फंसा फेसबुक के इन तथाकथित धर्मगुरुओं के व्यंग्यात्मक बाणों का सामना कर रहा था और सोच रहा था कि, आखिर वास्तव में ‘धर्म’ किस चिड़िया का नाम है? क्या ‘धर्म’ वो मुहर है जो हमारे पैदा होते ही समाज हम पर लगा देता है? या वो नियम, जो ये तथाकथित धर्मगुरु हम पर थोपते हैं? या फिर समस्त मानवजाति के कल्याण के लिए किया गया कर्म ही ‘धर्म’ होगा? मेरे तरकश में अब भी कई बाण हैं जिससे मैं उनके चक्रव्यूह से निकल सकता हूं, परन्तु अब परिस्थितियां और हैं। द्वापरयुग में ‘धर्म’ और ‘अधर्म’ में बड़ा अंतर हुआ करता था, परन्तु इस कलयुग में इनकी परिभाषाएं ही बदल गई हैं, कब ‘धर्म’ ‘अधर्म’ और ‘अधर्म’ ‘धर्म’ की जगह ले ले इसका कुछ पता नहीं। तब अभिमन्यु विवश था क्यूंकि उसे चक्रव्यूह से निकलने का तरीका ही नहीं पता था। पर आज वो इस चक्रव्यूह से निकलकर अपनी कायरता का कारण नहीं बनना चाहता

The views and opinions expressed by the writer are personal and do not necessarily reflect the official position of VOM.
This post was created with our nice and easy submission form. Create your post!

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

Comments

0 comments