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अपने ही हक़ की लड़ाई में सड़क पर पिसता किसान

जो इस वक्त किसानों के साथ हो रहा है, उन्हें अपने ही देश की राजधानी जाने से रोका जा रहा है। सरकार से सवाल करने पर , अपना ही अधिकार मांगने पर मारा जा रहा है , क्या यह लोकतंत्र का उपहास नहीं ?

Bharat Bhushan/HT Photo

बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार , अबकी बार भाजपा सरकार”

नारे को सुनने पर तो लगता है जैसे यह सरकार किसानों के लिए संकटमोचन का काम करेगी।  लेकिन यह क्या इस नारे के तो वारे न्यारे हो गए! इस नारे को देने वाली ही सरकार के खिलाफ आज पूरे देश में किसान आंदोलन की आग भड़क गई है, और इस आग की लपटें धीरे-धीरे आसमान छूने लगी हैं।

फिल्म जगत से लेकर खेल जगत और राजनीति में हर तरफ से किसानों को पूरा-पूरा समर्थन मिल रहा है तो कुछ जगह आलोचना भी की जा रही है। जिसमें सबसे बड़ा नाम है कंगना रनौत का अभी कुछ दिन पहले आंदोलन में शामिल बुज़ुर्ग महिला (बिल्कीस ददाद) पर किसी भी आंदोलन में सौ-सौ रुपए में उपलब्ध होने वाले उनके ट्वीट ने हर तरफ बवाल मचा दिया।

स्थिति ऐसी बन गई कि उन्हें ट्वीट डिलीट करना पड़ा साथ ही उन्हें लीगल नोटिस भी भेजा गया है और जल्द से जल्द माफी मांगने को कहा गया है ।ख़ैर कंगना दीदी के ऐसे उल्टे सीधे बयानों की तो अब देश को आदत हो गई है ,एक तरफ वो किसान हित की बात भी करती है दूसरी तरफ सरकार को समर्थन भी करती है । कहते है लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें ना सिर्फ असहमति की जगह और आदर होता है बल्कि कई राजनीतिक दलों के अस्तित्व के रूप में वह उसकी संरचना में भी गुथी होती है।

असहमति के बिना लोकतंत्र संभव और सशक्त नहीं हो सकता पर क्या जो इस वक्त किसानों के साथ हो रहा है। उन्हें अपने ही देश की राजधानी जाने से रोका जा रहा है। सरकार से सवाल करने पर , अपना ही अधिकार मांगने पर मारा जा रहा है , क्या यह लोकतंत्र का उपहास नहीं ? जो सरेआम उसकी गरिमा को कुचला जा रहा है। जाड़ा, गर्मी, बरसात, बाहर हर मौसम में घंटो-घंटो भूखे प्यासे रहकर पूरे देश की भूख का इंतजाम करने वाले किसानों पर आज लाठियां चलाई जा रही हैं, आंसू गैस के गोले फेंके जा रहे हैं, और तो और इस ठंड में उन पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया जा रहा है। मगर वह भूल गए हैं इससे भी अधिक कड़कड़ाती ठंड में घंटों पानी में रहकर जो किसान खेत में लगातार काम करता रहता है उन्हें उनका यह ज़रा सा वाटर कैनन की बौछार क्या कमज़ोर कर पाएगा।

यहां चुनाव आते ही हर तरफ से कसमें वादों की बौछारें शुरू हो जाती हैं कोई किसानों का कर्ज़ माफ करने का वादा करता है तो कोई बिना ब्याज ऋण देने का वादा करता है , पर पूरा कौन-कौन और कितना-कितना करता है यह तो 7 से 8 साल का बच्चा भी बता सकता है। चुनाव आते ही गली, नुक्कड़, चौराहे पर नेताजी की हाथ जोड़े हंसती हुई फोटो लगा दी जाती है और लंबी लंबी डींगे हांक कर चले जाते हैं, जो चुनाव खत्म होने के साथ-साथ ही खत्म हो जाती हैं।

यह लड़ाई लंबी है इस आग को जिंदा रखना बहुत जरूरी है बाकी असहमति तो साहस और जोखिम का काम है ही उसे व्यक्त करने वाले जोखिम में पड़ते ही पड़ते हैं । पर एक सवाल बाकी है

“यह सिलसिला क्या यूं ही चलता रहेगा ,

सियासत कब तक किसानों को छलता रहेगा !!?“

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