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जनता के प्रतिरोध संघर्ष की नई इबारत है किसानों का दिल्ली पड़ाव

यह आन्दोलन कब तक चलेगा इस बारे में अभी से कुछ भी कहना कठिन है। पर यह आन्दोलन अपनी जीत पर ही समाप्त होगा, यह निश्चित ही कहा जा सकता है। इस आन्दोलन को अपनी आँखों में कैद करना और इस आन्दोलन में आए सामान्य किसानों से मिलना एक अलग ही अनुभूति देता है।

भारत की खेती और खाद्य सुरक्षा को कॉरपोरेट व बहुराष्ट्रीय निगमों का गुलाम बनाने वाले मोदी सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ देश के किसानों का ऐतिहासिक आन्दोलन आज पूरी दनिुया में चर्चा का विषय बन गया है। इस आन्दोलन के ऐजेंडे में तीन कृषि कानूनों के अलावा बिजली के निजीकरण और वायु प्रदषूण से जुड़े दो अध्यादेशों को वापस लेने की मांग भी है। इस तरह देखें तो किसानों का यह संघर्ष सीधे-सीधे केन्द्रीय सत्ता के खिलाफ है और भारत में आर्थिक सुधार के नाम पर कॉरपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों देश के संशाधनों को लुटाने के विरोध में खड़ा है। भारत की सत्ता के केंद्र दिल्ली को घेरे लाखों किसानों ने आजाद भारत के इतिहास में और खासकर भारत में बढ़ते फासीवादी निजाम के दौर में जनता के प्रतिरोध की एक नई इबारत लिख दी है। आन्दोलन में बैठे किसानों का मूड बता रहा है कि वे इस जंग को जीते बगैर वापस लौटने वाले नहीं हैं। वे जानते हैं, अगर वे जीत के बिना वापस लौटे तो उनके पास बचा वह छोटा सा जमीन का टुकड़ा भी कॉरपोरेट लूट लेंगे और देश की खाद्य सुरक्षा भी उनकी गुलाम बन जाएगी।

यह आन्दोलन कब तक चलेगा इस बारे में अभी से कुछ भी कहना कठिन है। पर यह आन्दोलन अपनी जीत पर ही समाप्त होगा, यह निश्चित ही कहा जा सकता है। इस आन्दोलन को अपनी आँखों में कैद करना और इस आन्दोलन में आए सामान्य किसानों से मिलना एक अलग ही अनुभूति देता है। इस आन्दोलन की खासियत है कि इसको कोई एक नेता नेतृत्व नहीं दे रहा है, इस आन्दोलन का अपना कोई एक बैनर और एक झंडा भी नहीं है। अलग-अलग रंग के सैकड़ों झंडे और बैनर लिए किसानों का यह हुजूम एकदम एकताबद्ध, अनुशासित है। ख़ासबात यह है कि इस आन्दोलन में नई पीढ़ी की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। जो पिछले 30 वर्षों से किसान आन्दोलन से लगभग किनारा ही किए रहती थी। किसानों की यह नई पीढ़ी इस आन्दोलन में भाग लेकर काफी उत्साहित है। उन्होंने अपने बुजुर्गों के मुख से और साहित्यमें जो किसानों के विद्रोह और क्रांतियों की कहानियां सुनी और पढ़ी थी, उसी तरह का संघर्ष अपनी आखों से देखना और खुद उसका प्रत्यक्ष भागीदार बनना उन्हें गौरान्वित करा रहा है। इसी लिए यह आन्दोलन जितना लम्बा होता होता जा रहा है, इसमें युवाओं की भागीदारी उतनी ही बढती जा रही है।

सच्चे लोकतंत्र की पाठशाला बना यह किसान आन्दोलन

दिल्ली के दरवाजे पर पड़ाव डाला वर्तमान किसान आन्दोलन सच्चे लोकतंत्र की पाठशाला के रूप में विकसित हुआ है। इस आन्दोलन में भारत के भविष्य के लिए यह देखना काफी प्रेरणादायक है कि कैसे विभिन्न विचारधाराओं से बंधे लोग भी जनता और राष्ट्र के सामूहिक हितों के लिए एकताबद्ध रूप से काम कर सकते हैं। इसमें शामिल किसान संगठनों में वामपंथी से लेकर दक्षिण पंथी, मध्य मार्गी से लेकर स्वयंसेवी विचारधारा तक के सभी किसान संगठन शामिल हैं। इन सभी संगठनों में आन्दोलन की रणनीति को लेकर अपनी आंतरिक बैठकें होती हैं। फिर इसमें शामिल सभी बड़े समन्वयों की अपनी बैठकें होती हैं। पंजाब के 32 संगठनों की अलग से बैठक होती है। उसके बाद पंजाब के संगठनों और अन्य समन्वयों के साझे मंच की बैठक कर आम राय से अंतिम निर्णय लिया जाता है। साझे मंच के इस अंतिम निर्णय को आन्दोलन में शामिल सभी किसान संगठन स्वेच्छा और पूर्ण अनुशासन के साथ लागू करते हैं। इस तरह से देखें तो वर्तमान किसान आन्दोलन की रणनीति और कार्यनीति को सजाने में हर संगठन की अपनी बराबर की भूमिका है। यही कारण है कि लाख कोशिशों के बाद भी केंद्र सरकार किसान संगठनों के बीच फूट डालने में सफल नहीं हुई है।

इस आन्दोलन को न किसी नेता की गद्दारी से कोई फर्क पड़ने वाला है और न ही किसी संगठन के मुखिया के आन्दोलन से हट जाने से आन्दोलन बिखरने वाला है। सच तो यह है कि वर्तमान किसान आन्दोलन में किसान इतने जागरूक और एकताबद्ध हैं कि उनमें से किसी के संगठन व नेता ने अगर आन्दोलन से खिसकने की कोशिश की तो वह खुद अपने ही संगठन व आधार को खो बैठेगा। इसलिए कुछ ऐसे किसान संगठन भी हैं जिनके नेताओं पर लोगों को कम भरोसा था। ऐसे संगठन भी इस आन्दोलन में हैं जो सिर्फ एमएसपी के सवाल पर ही इस आन्दोलन में कूदे थे। पर आज किसानों के संघर्ष के जज्बे और बिना जीते न लौटने की उनकी संकल्पशक्ति के आगे वे नेता भी नतमस्तक हैं और तीनों किसान कानूनों की वापसी की मांग पर अडिग हैं। केंद्र सरकार ने एक तरफ वार्ता का नाटक करने और दूसरी तरफ किसान नेताओं में फूट डालने, उन्हें अलग-अलग कर समझाने और आन्दोलन को खालिस्तानी, विपक्ष का उकसाया और माओवादी तक बताने की कोशिशें की ताकि आन्दोलन में बिखराव पैदा हो जाए। पर वे किसानों और उनके नेतृत्व की चट्टानी एकता को तोड़ने में पूरी तरह असफल हुए।

This article was originally published by Purushottam Sharma in Trolley Times.

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