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नारीवाद सिर्फ एक लहर नहीं, यह जरूरत है

इस समाज में एक लड़की के रूप में जन्म लेना बहुत बड़ी चुनौती है। जब बात उनके समान अधिकारों की आ जाती है तो यह चुनौती एक संघर्ष बन जाती है।

अक्सर हमें अपने आसपास ‘, ‘फ़ेमिनिज़्म’ ,’ फे़मिनिस्ट’, ‘ शब्द सुनने को मिलते रहते हैं। हर शब्द का अर्थ अलग है मगर यह सभी शब्द जुड़े हैं – महिलाओं से। कुछ लोग नारीवाद शब्दों के सकारात्मक पक्ष का साथ देते हैं वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इसे सिर्फ कुछ संकी और गु़स्सैल महिलाओं की सोच मानते हैं। मगर क्या कभी आपने सोचा है कि इन महिलाओं के ग़ुस्से का कारण है क्या? आख़िर क्यों यह महिलाएं इस विषय के साथ इतनी चर्चा में है ? 

महिलाओं के साथ शुरुआत से ही घरेलू हिंसा आम बात रही है। महिलाओं के अधिकारों और उनके विचारों को कभी महत्व ही नहीं दिया गया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्थिति में कुछ ज़्यादा बदलाव देखने को नहीं मिला। महिलाओं को अधिकार और स्वतंत्रता तो दी गई मगर ज़मीनी स्तर पर उन्हें यह स्वतंत्रता आज भी पूर्ण रूप से नहीं मिली है। क्योंकि आज भी हमारा समाज महिलाओं कि आवाज़ को दबाने की कोशिश करता रहता है। 

आए दिन हमें ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं। जहां महिलाओं को घरेलू हिंसा, शारीरिक उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

समाज तो दूर की बात है हमारे खुद के परिवार में ही ऐसे क़िस्से देखने और सुनने को मिल जाते हैं। फिर भी हम में से हर कोई इसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठा पाता और महिलाओं के साथ अत्याचार की यह परम्परा चलती रहती है। समाज ने परिवार की इज़्ज़त और रिश्तों के दबाव में अक्सर कुछ आवाज़ें कभी उठ ही नहीं पाती और न ही कोई उन्हें सुन पाता है।

मगर नारीवाद की लहर ने महिलाओं के अंदर एक नया हौंसला भर दिया है। धीरे धीरे महिलाएं अपने हक और अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। नारीवाद की लहर ने महिलाओं को केवल जागरूक ही नहीं बल्कि सशक्त भी बनाया है। नारीवाद ने महिलाओं को हिम्मत दी है कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो वह अकेली नहीं है।

दिल्ली की रहने वाली अमृता (बदला हुआ नाम) एक 20 वर्षीय लड़की हैं। वह वहां अपने परिवार के साथ रहती हैं। अमृता बताती हैं कि किस तरह बचपन में उनके साथ हुए एक हादसे ने किस तरह उनके जीवन को बदल दिया था। इस हादसे का जिम्मेदार एक आदमी था जिसने उसके हंसते खेलते बचपन को डर में बदल दिया। 

अमृता ने बताया, “ आज से करीब 12 साल पहले जब मैं 8 साल की थी और  3rd क्लास पढ़ती में थी। उस समय मेरे एक अंकल मुझे हमेशा चॉकलेट और दूसरी खाने की चीजें ला कर देते थे और मैं एक मासूम नासमझ बच्चे की तरह उनकी बातों में आ गई। उन्होंने मेरे इसी भोलेपन और बचपन का फ़ायदा उठाया और मेरे साथ रेप किया। ऐसा सिर्फ एक बार नहीं बल्कि बहुत बार किया।

उन्होंने हर बार मुझे डराया की अगर मैं इस बारे में किसी को बताऊंगी तो कुछ भी ठीक नहीं होगा। यहां तक कि उन्होंने एक बार उन्होंने मेरे मम्मी पापा तक को नुक़सान पहुंचाने की धमकी भी दी थी। मुझे आज भी याद है कि मैं उस समय बेहद डर गई थी। मगर मुझे उस समय इतना नहीं पता था कि वह मेरे साथ जो कर रहे है वह क्या है। बस इतना पता था कि यह ठीक नहीं है। फिर लगभग दो तीन साल बाद जब मुझे पता लगा कि अंकल मेरे साथ जो करते थे वह रेप है। मैं समझने लगी कि मेरे साथ क्या हो रहा है और जो भी हो रहा वह नहीं होना चाहिए।

इन सबके बारे में अंदर ही अंदर सोचती रहती थी और मैं एक लंबे समय तक डिप्रेशन में चली गई थी। यह  मेरी जिंदगी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है जिसे याद कर मैं आज भी कई बार कांप उठती हूं, और सोचती हूं कि एक आदमी के लिए कितना आसान है किसी भी लड़की या औरत को डराना , उसके साथ बुरा व्यवहार करना और फिर उसे चुप करा देना।

धीरे धीरे वक़्त के साथ यह डर और दर्द ख़त्म होने लगा। मुझे महसूस होने लगा कि अब सब ठीक है। क्योंकि अब वह इंसान हमसे दूर जा चुका था । मगर मेरा डर पूरी तरह उस दिन ख़त्म हुआ जब कुछ साल पहले वह अंकल फिर से मेरे पास आए । मगर इस बार मैं डरी नहीं बल्कि मैंने हिम्मत करके उनका सामना किया और यह सब देख वह डर गए और वहां से चले गए।

मैंने एक लंबे समय तक इस दर्द को महसूस किया और उसके साथ जीती रही । मगर उस दिन के बाद मेरा नज़रिया बदल गया । उस दि कोन मुझे अहसास हुआ कि इंसान को तब तक अपने अंदर की ताकत का अहसास नहीं होता जब तक वह तनाव के उस स्तर तक नहीं पहुंच जाता जहां हमारी सोचने समझने की शक्ति ख़त्म हो जाती है। हम खुद ही मर्दों की सोच के आगे खुद को बांध कर रख देते हैं और सिर्फ सहते रहते हैं। 

कहीं न कहीं नारीवाद ( feminism) के विचार का भी मुझ पर काफ़ी असर हुआ है। क्योंकि नारीवाद का सीधा सा अर्थ है महिलाओं को बराबरी का हक दिलाना। नारीवाद का अर्थ किसी महिला को पुरुषों से ज्यादा अधिकार देने या केवल महिलाओं को ही सशक्त करना नहीं है बल्कि केवल बराबरी देना है। जब तक हम उनके बराबर का स्थान हासिल नहीं कर सकते तब तक उनसे आगे जाने का तो सोच भी नहीं सकते।इसलिए यह काफी ज़रूरी है कि लड़कियों ओर महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर माना जाए और उनके साथ वैसे ही व्यवहार किया जाए। नारीवाद की लहर इसी दिशा में एक ठोस कदम है। इसके लिए सबसे अधिक जरूरी कि हमारे समाज की सोच का तर्कसंगत होना।”

हमारे समाज में आज एलजीबीटी  समुदाय को एक नई पहचान मिली है हमारी न्यायपालिका ने उन्हें कुछ स्वतंत्र अधिकार दिए हैं। इसके बावजूद भी इस समुदाय के लोग समाज में सुरक्षित महसूस नहीं करते। क्योंकि हमारा समाज आज फिर भी इस समुदाय को भेदभाव की नज़र से देखता है।

इस समुदाय में सबसे ज्यादा असुरक्षित बाइसेक्सुअल समुदाय की लड़कियां करती हैं। क्योंकि हमारा समाज और यहां तक की स्वयं उस लड़की के परिवार वाले उसके विचारों से सहमत नहीं होते। समाज और रिश्तेदारों के डर से इस समुदाय की लड़कियां अपनी आवाज नहीं उठा पाती हैं। क्योंकि उन्हें लगता है की उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। 

मनोसरी कोलकाता की रहने वाली हैं। जो एक बाईसेक्सुअल हैं। अपनी इस पहचान के कारण उन्हें काफी भेदभाव और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा। 

मनोसरी ने बताया, “ जब मैं 4th क्लास में थी उस समय मैं पहली बार लड़कियों की तरह तैयार हुई थी। उससे पहले मैं हमेशा लड़कों की तरह रहती थी और उन्हीं के साथ खेलती थी। उस दिन मुझे लड़कियों की तरह तैयार हुआ देख सभी ने कहा की भगवान ने तुझे गलती से लड़की बना दिया और तू लड़की से ज़्यादा लड़के के रूप में अच्छी लगती है। इतना ही नहीं 6th क्लास में क्लास कैप्टन ने पूरी क्लास के सामने मुझ पर कमेंट किया कि मनोसरी को लड़की नहीं लड़का होना चाहिए था। इसके बाद पूरी क्लास रोज मुझे किसी न किसी बहाने कमेंट करती की तू लड़का बन जा।

मेरे लड़कों जैसे व्यवहार को देखकर शुरुआत से ही सबको लगता था की मुझे लड़कियां पसंद है और मेरे सभी दोस्तों ने खुद ही अपने मन में यह सोच लिया कि मैं लेस्बियन हूं। इस बात का पता मुझे तब लगा जब मैंने अपनी एक सबसे खास दोस्त के साथ इस बात को साझा किया की मैं बाईसेक्सुअल हूं। तब नहीं दोस्त ने मुझे बताया की मेरे बारे में लोग किस किस तरह की बातें करते हैं और मुझे लेस्बियन समझते हैं। उससे पहले मैं सोचती थी की मेरे दोस्त मुझसे इसलिए दूर रहते हैं कि शायद मुझ में ही कोई कमी है या मैं एक अच्छी दोस्त नहीं हूं। मगर उस दिन मुझे पता लगा की वह सब मुझसे इसलिए दूर रहते है क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं  लेस्बियन हूं।

इतना ही नहीं लोग हमेशा मेरी सेक्सुअलिटी का मज़ाक़ उड़ाते थे और कभी-कभी तो मुझे हिजड़ा भी बुलाते थे। जब भी किसी के साथ मेरी कोई बहस होती या कोई मुझे नीचा दिखाना चाहता तो वह मुझे हिजड़ा बुला कर मुझे चुप करा देते थे। उन्हें पता था की मुझे चुप कराना है तो बस एक लाइन बोल दो की भगवान ने तुझे ग़लती से लड़की बना दिया तू तो हिजड़ा और बस बात ख़त्म।

मेरे अपने ही दोस्त मेरी तरफ ठेठ होमोफ़ोबिक (समलैंगिकों के प्रति भय की नजर) तरीके से देखते थे। वह इस तरह जताते थे की मैं उन्हें असहज महसूस करा रही हूं और बड़े ही अजीब तरीक़े से मेरी तरफ देखते थे। इन सब चीज़ों में मेरी मानसिक स्थिति को इतना कमज़ोर कर दिया था की एक समय मैंने सोच लिया था कि मैं किसी से बात नहीं करूंगी। ना ही किसी से मिलूंगी यहां तक कि घर से बाहर भी नहीं निकलूंगी। मगर धीरे धीरे चीज़ें शांत होती गई। लोगों की ज़बान से अब मेरी कहानी गायब तो नहीं हुई मगर उसकी आवाज़ जरूर धीमी हो गई है। 

वक़्त के साथ मैंने भी खुद को बदल लिया और मैं जैसी भी हूं मुझे खुद पर गर्व है और मैं कोई और बन कर नहीं रह सकती।”

मनोसरी की कहानी सिर्फ उसकी ही नहीं है। हमारे समाज में ऐसी सैकड़ों महिलाएं हैं जो इस समाज से डरकर अपने विचारों को खुल कर किसी के सामने नहीं रख सकती। क्योंकि उन्हें पता है उन्हें समझने वाला शायद ही कोई होगा अन्यथा कोई नहीं होगा ।मुझे लगता है इस समाज में एक लड़की के रूप में जन्म लेना बहुत बड़ी चुनौती है। जब बात लड़की के बाईसेक्सुअल होने या समान अधिकारों की आ जाती है तो यह चुनौती एक संघर्ष बन जाती है। मगर जब यहां बात एक लड़के थे बाईसेक्सुअल होने की आती है तो वह बड़ी साधारण सी लगती है। आख़िर ऐसा क्यों? क्या लड़कों ने जन्म लेते समय प्रकृति से कुछ अलग अधिकार प्राप्त किए थे जिनसे लड़कियां वंचित रह गई हैं।

 

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