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शिक्षा प्रणाली की बदलती गतिशीलता – यू कैन फाउंडेशन द्वारा आयोजित श्रंखला का चौथा चरण

हम कितना ही इसके बारे में विचार विमर्श कर ले  कि  शिक्षा क्या है, मगर कभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। क्योंकि शिक्षा एक सीमित विषय नहीं है।

यू कैन फाउंडेशन द्वारा शिक्षा प्रणाली की बदलती गतिशीलता के विषय पर ऑनलाइन वेबिनार श्रृंखला के चौथे चरण का आयोजन किया गया।यह वेबिनार 18 जुलाई 2020 को श्याम 4:00 बजे आरंभ हुआ। इस वेबिनार के मुख्य वक्ता डॉ सहर सैयद ,जो हमदर्द पब्लिक स्कूल दिल्ली की प्रिंसिपल है ।दूसरे वक्ता डॉ अरुणा वाडकर,जो एक शिक्षाविद है। तीसरे वक्ता डॉ बिभूति भूषण जो एसआरएमपी नूतन ग्लोबल स्कूल, गुजरात के प्राध्यापक हैं, इनके साथ ही चौथे वक्ता डॉ मोहम्मद इमरान, इंटरनेशनल इंडियन पब्लिक स्कूल के प्राध्यापक, थे।इस सत्र के मध्यस्थ यू कैन फाउंडेशन के संस्थापक मोनिस शमसी थे।

सबसे पहले दृष्टि ने अपनी संस्था के बारे में सबको अवगत कराया। उसके बाद रिया जैन ने सभी मुख्य वक्ताओं का परिचय श्रोताओं से कराया और चर्चा को आगे बढ़ाया।

सत्र की शुरुआत में मोनिस ने सभी वक्ताओं से प्रश्न किया की उनके लिए शिक्षा की परिभाषा क्या है ?और किस तरह शिक्षा ने उनके जीवन को बदला? इस प्रश्न के जवाब में डॉ सहर सैयद ने जवाब दिया की शिक्षा केवल पढ़ने लिखने से संबंधित नहीं है। बल्कि यह पूरी तरह से सीखने की प्रक्रिया से जुड़ी एक व्यवस्था है। आज के समय में तकनीक ने हर स्थान को घेर लिया है। आज सभी अध्यापक बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा दे रहे हैं। ऐसे में सीखने की प्रक्रिया कहीं भी रुकी नहीं है। हम लगातार सीख रहे हैं और आगे भी सीखते ही रहेंगे।

इसी प्रश्न के जवाब में डॉ अरुणा वाडकर ने अपने विचार साझा किए और बताया की हम कितना ही इसके बारे में विचार विमर्श कर ले  कि  शिक्षा क्या है, मगर कभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। क्योंकि शिक्षा एक सीमित विषय नहीं है यह जीवन भर सीखने की प्रक्रिया है सीखने की प्रक्रिया है। हम सिर्फ समय के साथ खुद को को एक कदम आगे बढ़ाते हैं लेकिन सीखने की प्रक्रिया कभी रुकती नहीं है। शिक्षा की कोई सीमाएं नहीं है यह एक व्यक्ति को सीमाओं से भी परे अवसर प्रदान करती है।

डॉ मोहम्मद इमरान ने बताया कि शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम एक बच्चे के अंदर सबसे बेहतर सोचने समझने की शक्ति कोई जागृत कर सकते हैं। समय के साथ बेशक शिक्षा प्रणाली में बदलाव आते रहेंगे। ऐसे में हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को इस तरह से बनाना होगा ताकि हम बच्चे को बेहतरीन से बेहतरीन शिक्षा प्रदान कर सके। इसके लिए सबसे पहले हमें खुद के शिक्षा प्रणाली की रचना करनी होगी। हालांकि हम उसमें अन्य देशों की शिक्षा प्रणाली को भी जोड़ सकते हैं। ताकि बच्चों को उनकी क्षमता के अनुसार सिखाया जा सके।

इस सत्र का अगला प्रश्न था कि, क्या प्रत्येक स्कूल में केेवल बच्चों पर केंद्रित शिक्षा प्रणाली को लागू किया जा सकता है? इसके जवाब में डॉ सहर ने बताया कि यह बिल्कुल संभव है। प्रत्येक स्कूल में केवल बच्चों पर केंद्रित शिक्षा प्रणाली को लागू किया जा सकता है फिर चाहे प्राइवेट या सरकारी कोई भी स्कूल हो। हर जगह सीखने और सिखाने की प्रक्रिया पर ही ध्यान दिया जाता है। जो पूर्णतया बच्चों पर ही आधारित होती है। डॉ अरुणा ने भी इस विषय पर अपने विचार रखते हुए बताया कि यह केवल एक अध्यापक पर निर्भर करता है कि वह बच्चों को किस तरह से सिखाता है। इसके लिए जरूरी है कि एक अध्यापक अपने सिखाने के तरीके में अनुभवात्मक शिक्षा और कौशल विकास पर जोर दें।

डॉ मोहम्मद इमरान ने बताया कि आज के समय में जब तक शिक्षक खुद अनुभवात्मक शिक्षा के पहलू को नहीं समझता वह बच्चों को भी नहीं सिखा पाएगा। जब तक शिक्षक खुद किसी विषय को लेकर स्पष्ट नहीं होगा कि वास्तव में यह चीज कैसे काम करती है वह बच्चों को नहीं सिखा सकता। केवल किताबों में पढ़ा देने से बच्चे नहीं सीख सकते। साथ ही आज के समय में एक शिक्षक के पास इतना समय नहीं होता कि वह एक कक्षा के अंदर एक निश्चित समय में बच्चों को पढ़ाएं भी और और साथ ही यह भी देखें की बच्चों ने कितना सीखा है।

डॉ बिभूति भूषण मेहता ने आज के समय में अध्यापन कार्य क्षेत्र के प्रति बच्चों के रुझान में कमी के कारण को समझाते हुए बताया की आज की हमारी शिक्षा प्रणाली शिक्षा प्रणाली केवल एक रोजगार का साधन बनकर रह गई है। प्राचीन शिक्षा प्रणाली की प्रशंसा करते हुए बताते हैं कि उस समय के अध्यापकों का समाज में एक सम्मानजनक स्थान होता था। परंतु आज के समय में अध्यापन कार्य केवल भौतिकवाद की दृष्टि में देखा जाता है।

सत्र के बीच में एक एक श्रोता ( रिषभ) ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि आज के समय में किस तरह अध्यापक और विद्यार्थी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव तो चाहते हैं मगर कई बार वह उन बदलावों को अपनाने से झिझकते हैं। इसके उत्तर में डॉ सहर ने बताया कि बदलाव एक मानसिक प्रक्रिया है। यदि हम मानसिक रूप से चाहे तो बदलाव को अपनाया जा सकता है। इसके लिए केवल हमें खुद को तैयार करना होगा।

स्कूल में शिक्षकों के लिए एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण कैसे किया जा सकता है इस प्रश्न के उत्तर में डॉ मेहता ने बताया कि आज के समय में सभी स्कूल केवल शिक्षा को महत्व देते हैं और बच्चों की ही बात करते हैं। लेकिन जब तक शिक्षक बच्चों को नहीं सिखाएगा बच्चे नहीं सीख पाएंगे। इसके लिए अध्यापकों का आर्थिक सामाजिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ होना अत्यंत आवश्यक है। तभी शिक्षक पूरी तरह से स्वस्थ मानसिक स्थिति के साथ बच्चों तक अपने विचारों को पहुंचा पाएगा। इसके लिए आवश्यक है कि स्कूल के प्राध्यापक से लेकर स्कूल मैनेजमेंट और अभिभावकों की तरफ से भी अध्यापकों को हर तरह से साथ और हौसला मिलना चाहिए।

सत्र का आखिरी प्रश्न सभी वक्ताओं से यह था कि ऐसी कौन सी खूबियां हैं जो एक शिक्षक के अंदर होनी चाहिए?
इसके उत्तर में डॉ अरुणा ने बताया कि सबसे पहले एक शिक्षक को अपनी कक्षा को व्यवस्थित रुप से चलाना आना चाहिए। इसके बाद शिक्षक को हमेशा अपने विषय से संबंधित सामग्री के साथ तैयार रहना चाहिए और उस विषय और सामग्री के बारे में पूरी जानकारी भी होनी चाहिए। साथ ही उन्हें हर विषय को अलग अलग ढंग से बच्चों तक पहुंचाने की कला में निपुण होना चाहिए। क्योंकि हर बच्चे का सीखने का तरीका अलग होता है।

डॉ इमरान ने बताया कि एक शिक्षक के अंदर यह क्षमता होनी चाहिए कि वह पहचान सके कि उसका विद्यार्थी किस स्थिति से गुजर रहा है। एक शिक्षक को अपने विद्यार्थियों के बारे में पूरी तरह से जानकारी होनी चाहिए ताकि वह उन्हें बेहतर तरीके से पढ़ा सके। डॉ मेहता ने बताया कि एक शिक्षक को हमेशा एक शिक्षक की तरह ही कक्षा में जाना चाहिए और उन्हें वहां जाकर क्या करना है ,इस बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। इसके साथ ही शिक्षक को अपने विषय सामग्री के साथ हमेशा तैयार रहना चाहिए। चाहे वह मानसिक रूप से हो या शारीरिक रूप से उन्हें तैयार रहना चाहिए। इसके साथ ही एक शिक्षक का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण होना चाहिए। कक्षा में जाने से पहले शिक्षक को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना आना चाहिए ताकि वह बेहतर तरीके से अपने विचारों को बच्चों तक पहुंचा सके। अंत में डॉ सहर ने कहा कि सबसे पहले एक शिक्षक में परिस्थितियों के अनुसार धलने की क्षमता होनी चाहिए। उसके साथ ही शिक्षक के अंदर धैर्य होना चाहिए और एक शिक्षक को एक काउंसलर की तरह बच्चों से घुलना मिलना चाहिए। एक शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि जो भी विषय वह बच्चों को पढ़ाते हैं उससे संबंधित सामग्री को वह कितने आकर्षक ढंग से उनके सामने प्रस्तुत कर सकते हैं। क्योंकि जितनी अधिक उस विषय में रोचकता होगी बच्चे उतने ही मन लगाकर उस विषय को सीखेंगे। इसी के साथ वक्ताओं ने अपने विचारों को समाप्त किया। अंत में मध्यस्थ ने सभी वक्ताओं को धन्यवाद करते हुए इस सत्र को समाप्त किया।

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