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नरसंहार – रेडियो रवांडा और भारतीय मीडिया 

रवांडा में जो 1994 में नरसंहार हुआ उसमें हूतू समुदाय के लोगों ने 80000 से भी ज्यादा लोगों को 100 दिन के अंदर मार डाला यह सभी लोग तुत्सी समुदाय से संबंध रखते थे।

(रेडियो रवांडा और भारतीय मीडिया) मीडिया ऐसे दौर से गुजर रही है जहां नफरत, भेदभाव, सांप्रदायिकता आदि जैसे नकारात्मक तत्व इसकी पहचान को नष्ट कर रहे हैं।

नरसंहार – रेडियो रवांडा और भारतीय मीडिया 

रवांडा एक ऐसा देश जो मध्य पूर्वी अफ्रीका में स्थित है रवांडा एक ऐसा देश है जो अपने हिंसक इतिहास के कारण दर्दनाक रूप से तनावग्रस्त है। रवांडा में जो 1994 में नरसंहार हुआ उसमें हूतू समुदाय के लोगों ने 800000 से भी ज्यादा लोगों को 100 दिन के अंदर मार डाला यह सभी लोग तुत्सी समुदाय से संबंध रखते थे।


जैसा कि हम जानते हैं किसी भी देश के लिए उसकी मीडिया एक सशक्त स्तंभ का कार्य करती है किंतु रवांडा की मीडिया नफरत से भरी हुई थी । मीडिया ने इस नरसंहार में इतनी बड़ी भूमिका निभाई कि पत्रकारों और मीडिया पर से लोगों का भरोसा पूरी तरह से गायब हो गया था।

अप्रैल 1992 में संक्रमणकालीन सरकार स्थापित की गई थी, तो उसने राष्ट्रपति हबरिमाना द्वारा रेडियो के एक प्रोग्रामिंग परिवर्तन की मांग की।इसने राज्य रेडियो में संक्रमणकालीन सरकार की भूमिका को संरक्षित किया, लेकिन राष्ट्रपति की पार्टी, एमआरएनडी को रोक दिया। 

रेडियो मुहब्बुरा के बढ़ते प्रभाव के कारण, रैडिकल हुतू ने 1993 में एक नया रेडियो स्टेशन बनाया, जिसका नाम रेडियो टेलेविजन लिबरे डेस मिल कोलिन्स था, जिसे RTLM के रूप में संक्षिप्त किया गया।आरटीएलएम अक्सर  तुत्सियों के खिलाफ घृणित बयान देते थे, और इसके कई पत्रकारों को अंततः तुत्सी के खिलाफ नरसंहार के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था।

जब भी रवांडा में हुए नरसंहार की चर्चा होती है तो कहीं ना कहीं उसमें सबसे प्रमुख अपराधी और उस नरसंहार के माहौल को बनाने वाले के तौर पर वहां की मीडिया का नाम सामने आता है। खासकर एक पत्रिका कंगूरा और कुछ रेडियो स्टेशन जैसे आरटीएलएम और रेडियो रवांडा जिन्होने खुले आम लोगों के खिलाफ आखरी युद्ध छेड़ने और तिलचट्टों यानी तुत्सियों का सफाया करने का आह्वान किया था।

भारत में मीडिया को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है किंतु वर्तमान दौर में भारतीय मीडिया ऐसे दौर से गुजर रही है जहां नफरत, भेदभाव, सांप्रदायिकता आदि जैसे नकारात्मक तत्व इसकी पहचान को नष्ट कर रहे हैं। विविधताओं का देश होने के कारण भारत में अनेक समुदायों के जातियों के धर्मों के लोग एक साथ भौगोलिक विविधताओं विभिन्न संस्कृति और विभिन्न ऐतिहासिक परिदृश्य के साथ एक साथ रहते हैं। विश्व स्तर पर भारत अनेकता में एकता की मिसाल देता है। किंतु आंतरिक तौर पर भारत विशेष गुटों में बंटा हुआ है जो सदैव एक दूसरे पर किसी न किसी माध्यम से आक्रमण करने के लिए तैयार रहते हैं। इसका एक मुख्य कारण लोगों के बीच झूठी तथा गलत जानकारी का पहुंचना है ,जिसमें कहीं ना कहीं हमारी भारतीय मीडिया का हाथ है।

 1994 में अप्रैल से लेकर जुलाई के मध्य तक जो नरसंहार हुआ उसमें आठ लाख से भी अधिक तुलसी जनजाति के लोगों की हत्या कर दी गई ।एक अनुमान के मुताबिक इस आपसी नफरत और हिंसा की आग में लगभग 1000000 लोग मारे गए।कुछ साल पहले बुलंदशहर में गौ हत्या की एक अफवाह फैलाई गई जिसके आधार पर वहां की जनता एक दूसरे को मारने और मरने पर उतारू हो गई इस भीड़ ने एक पुलिस वाले की हत्या कर दी। इस घटना से हम अंदाजा लगा सकते हैं की किस प्रकार जहरीले सांप्रदायिक प्रोपेगेंडा गहराई से हमारे समाज में फैल चुके हैं।

भारत में भी आए दिन हमें न जाने ऐसे कितने ही किस्से सुनने को मिलते हैं जिनमें एक गलत खबर के चलते न जाने कितने ही लोग अपनी जान गवां बैठते हैं। कितने ही दंगे केवल एक छोटी सी अफवाह के कारण भयानक रूप ले लेते हैं इसकी वास्तविकता किसी से छिपी नहीं है।आज के समय में भारतीय न्यूज़ चैनल्स जिस प्रकार एक समुदाय विशेष, धर्म विशेष या जाति विशेष के विरुद्ध खबरें फैला रहे हैं कहीं ना कहीं वह उस समय के रेडियो रवांडा के समकक्ष दिखाई  दे रहे हैं।

एक उदाहरण राम मंदिर तथा बाबरी मस्जिद का भी लिया जाता है। जब यह मामला अदालत में चल रहा था तब हमारे न्यूज़ चैनलों ने न जाने ऐसे कितने ही प्रसारण किए जिनमें उन्होंने उस स्थान पर राम मंदिर होने की वकालत की या राम मंदिर के बनने पर जोर दिया। इतना ही नहीं साथ ही साथ उन्होंने मुस्लिम समुदाय को कटघरे में खड़ा कर दिया तथा बाबरी मस्जिद का विरोध किया ।  

रवांडा में जिस प्रकार मीडिया ने हूतु तथा दूसरे समुदाय के मध्य विरोध बढ़ाने का कार्य किया उसी प्रकार भारतीय मीडिया हिंदू तथा मुस्लिम दो विशेष वर्ग समुदाय के मध्य अलगाववाद तथा विरोध की भावना उत्पन्न करने में अहम भूमिका निभा रही है। हाल ही में कोरोना वायरस की महामारी के चलते जब देशभर में लॉक डाउन बढ़ाया गया तो उस समय मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर एक बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए जिसके कारण वायरस के बढ़ने का खतरा पैदा हो गया था। इस भीड़ में हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर थे । इस भीड़ के जमा होने में कहीं ना कहीं मुस्लिमों का हाथ है यह अफवाह बड़ी तेजी से फैली। इसका एक कारण यह बताया गया कि जहां सबसे ज्यादा लोग इकट्ठे हुए वही बस स्टैंड के पास एक सुन्नी मस्जिद है तथा वीडियो बनाने वाला शख्स रऊफ मुस्लिम समुदाय से संबंध रखता है। 

साथ ही ऐसे अनेक वीडियो सामने आए हैं जिनमें मुस्लिम लोगों द्वारा खाने में जूठन मिलाते हुए, दूसरे लोगों पर खांसते  हुए आदि घटनाओं को दिखाया गया । सोशल मीडिया पर यह वीडियो बड़ी तेजी के साथ वायरल हुई और लोगों के मन में इस समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगलने का कार्य किया। बाद में हुई जांच से पता लगा यह सारी वीडियो झूठी हैं या पुरानी है। इनमें से किसी का भी संबंध कोरोनावायरस को फैलाने से नहीं है।

जिस प्रकार रवांडा में 1904 में आरटीएमएल रेडियो चैनल ने जनता के बीच अंधविश्वास को फैलाया आज के समय में भारतीय मीडिया भी दलदल में फंसने से खुद को नहीं बचा सकी है। ना जाने ऐसे कितने ही झूठे और अविश्वसनीय समाचार समय-समय पर सोशल मीडिया के सहारे भारत में चलते रहे। जो कि हमारी राष्ट्र एकता और राष्ट्रहित के विरुद्ध हैं जिनके द्वारा भारतीय जनता को भ्रमित किया जा रहा है। जनता के बीच ऐसे भड़काऊ तथा निराधार झूठे तथ्यों को रखा जाता है जिससे उनके मन में विद्रोह की भावना पनपती है।

जिस प्रकार के हालातों के जिक्र उस समय में रवांडा देश में हुए हैं उसी तरह आज के समय में भारतीय मीडिया लोगों की उनके धर्म और जाति के आधार पर आलोचना करने से पीछे बिल्कुल नहीं हटती है। कहीं ना कहीं किसी भी प्रकार से हिंदुओं को इस बात के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है कि वह हिंदू है और मुस्लिमों पर अत्याचार कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ मुस्लिमों पर इल्जाम लगाए जाते हैं कि वह देश द्रोही है देश के विरुद्ध कार्य करें इस प्रकार दोनों धर्मों को दोनों जातियों के लोगों को एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काया जाता है ।

 जिस तरह से ’राष्ट्रीय हित’ के कुछ स्वयंभू अभिभावकों ने विशेष रूप से कश्मीर पर दुष्प्रचार किया है, दीर्घकालिक सुधारों की अनदेखी करना कठिन है।राष्ट्रवादी मीडिया ने कश्मीर संघर्ष के बारे में भारतीय जनता की धारणा को भ्रमित किया है।युद्ध-विरोधी स्थिति में लगातार उलझने से, यह स्थायी शांति के लिए सबसे बड़ा अवरोध बन जाता है।

जिन अपराधों की कोई धार्मिक प्रेरणा नहीं होती है, उन्हें अक्सर सांप्रदायिक के रूप में चित्रित किया जाता है ताकि हिंदू सिर्फ हिंदू होने के लिए मारे जा रहे हैं और मुस्लिम केवल मुस्लिम होने की वजह से। भारत के समाचार चैनलों में फर्जी खबरें अक्सर असत्यापित तथ्यों पर आधारित होती हैं।वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि समाचार फर्जी है, लेकिन अभी जो तकनीक उपलब्ध है, उसके साथ समाचार को केवल कुछ सेकंड के लिए विभिन्न लोगों के बीच साझा करने की आवश्यकता है । भारत में “नकली समाचार” पोर्टलों की एक बड़ी संख्या है।वे अपनी विशाल सोशल मीडिया टीम पर भरोसा करते हैं जो कई फेसबुक पेज और ट्विटर अकाउंट चलाते हैं और उनके लाखों अनुयायी हैं जो सांप्रदायिक कोण से फर्जी खबरें फैलाते हैं।

जैसा कि उस समय रवांडा में तुत्सी विरोधी कुछ गाने अत्यंत प्रसिद्ध थे जिनमें उनको कॉकरोच कहकर बुलाया जाता था उसी प्रकार भारत में ऐसे ही गाने जो किसी धर्म और जाति के विरोध में हैं गाए जाते हैं। सोशल मीडिया पर हमें इससे अनेक उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। लोग गानों को  बड़े आनंद से सुनते हैं और इसमें सम्मान अनुभव करते हैं कि दूसरी जाति के लोग हमसे कम है। किंतु केवल आनंद और मनोरंजन के लिए बनाए गए यह गाने कहीं ना कहीं राष्ट्रहित को नुकसान पहुंचाते हैं । इन सभी तत्वों से लोगों के मन में विद्रोह की भावना उत्पन्न होती है ।जो आगे चलकर एक बड़े नरसंहार का रूप धारण कर सकती है रवांडा इसका एक जीता जागता उदाहरण है।

रेडियो रवांडा और भारतीय मीडिया के बीच बहुत अधिक समानताएं हैं आज के दौर में सोशल मीडिया की दुनिया में आम आदमी की सोच, और उसके एक दुसरे के साथ हो रहे संवाद पर बेहद गहरा असर डाला है ।यहाँ तक कि मुख्यधारा का मीडिया भी इस आभासी दुनिया में चल रहे झूठ, बनावटी और भ्रामक जानकारी के असर से खुद को बचा नहीं पाया है और इस हालात ने पत्रकारों, शिक्षाविदों और नीती बनाने वाले लोगों को गहरी चिंता में डाल दिया है। सोशल मीडिया हमें हमारे मूलभूत अधिकारों को खुलकर उपयोग करने में एक बेहद कारगार जरिये के रूप में नज़र आता है ,जहां हम सभी अभिव्यक्ति की आज़ादी के हमारे मूलभूत अधिकार को बखूबी आजमाते हैं और यहाँ पर सभी अपनी ज़ात,जन्म और भौगोलिक स्थिति को दरकिनार कर खुल कर अपनी राय और विचार रखते हैं। लेकिन इसी अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में आम जनता के बीच ग़लत जानकारी और नफ़रत फैलाने वाले मुद्दे भी फलफूल रहे हैं। हिन्दुस्तान में ये प्लेटफार्म बहुसंख्यकवादी हिंसा की बढ़ती घटनाओं के लिए एक साफ़ और खुला मंच प्रदान करते हैं क्योंकि पहचान आधारित और लोकप्रिय राजनीति देश के परिदृश्य पर हावी है। 

 

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