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एक कविता थी लिखनी

https://youtu.be/ksQg8UsrPxA

एक कविता थी लिखनी वीरों की,वीरांगनाओं की

एक कविता थी लिखनी प्रेम की परिभाषाओं की !

मां की आंखों के आंसूओं की , मिट्टी के कमज़ोर ढांचो की

देश के रखवालों की ,गुस्से में लिपटी ममता की !

एक कविता थी लिखनी योजनाओं की, बलिदानों की

एक कविता थी लिखनी अमर जवानों की, शहीदों की !

ज़मीन की बटवारों की ,लोगो को बांटते भेदभावों की

युवाओं के गर्म ख़ून की, सर्दी में ख़ुशी की गर्माहट की !

एक कविता थी लिखनी झांसी की, पानीपत की

एक कविता थी लिखनी रामायण की, महाभारत की !

मेरे देश के गरिमाओं की, तख्त में उलझते जहांपनाहों की

गांधी के भारत की ख़्वाब की, प्रजा को कुचलते नवाब की !

एक कविता थी लिखनी फरिश्तों की, ईमानदारों की

एक कविता थी लिखनी राजा और रंक की !

मातृभूमि की पुकारों की ,मेरी ज़मीन और आसमानों के चैन की,अमन की

प्लासी की, सराईघात की!

एक कविता थी लिखनी अनाजों की, महामारियों की

एक कविता थी लिखनी गरीबों की, किसानों की !

पेड़ पे लटकती लाशों की, बेबसों की पुकारों की

आज़ाद हिंद की ख्वाबों, की एक नन्हीं सी जान की !

एक कविता थी लिखनी तुम्हारी और मेरी

एक कविता थी लिखनी हम सब की कहानियों की !

– दीपानिता शर्मा (सांक्रेटिक)

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