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हिंदी भाषा : इतिहास, पहचान और समस्याएँ

हिंदी करीब 17 अलग-अलग बोलियों में बोली जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्राचीन काल में भारत को हिंद कहा जाता था। इसलिए हिंद में बोली जाने वाली हर भाषा को हिंदी कहा गया। धीरे-धीरे भारतीय भी अपनी भाषाओं को हिंदी कहने लगे जिससे अंतत हिंदी की विभिन्न बोलियों का विकास हुआ।

भारत में राष्ट्र भाषा से सम्बंधित बहस 

यह लेख भारतीय संविधान के तहत राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर बहस और सामाजिक बदलाव लाने में इसके महत्व का विश्लेषण करने के लिए है। इसमें राजभाषाओं के विवाद और बहस से अर्थ  निकालते हुए हल निकालने के प्रयासों पर रोशनी डाली गई है

भारत भाषाओं के मामले में समृद्ध देश रहा है, दूरदराज के क्षेत्रों द्वारा बोली जाने वाली प्रत्येक भाषा को संविधान के अनुच्छेद 29 और आठवीं अनुसूची से सम्मानित करने का प्रयास किया गया है। “इतिहास दर्शाता है कि, अनादि काल से, भारत एक बहुभाषी देश रहा है, प्रत्येक भाषा का एक निश्चित क्षेत्र है जिसमें संदर्भित भाषा का स्थान सर्वोच्च है, लेकिन इन क्षेत्रों में से कोई भी वास्तव में एकभाषी राज्य या रियासत का हिस्सा नहीं रहा है।”

मोटे तौर पर, भारतीय भाषाओं के चार प्रमुख समूह हैं:

हिन्द-आर्यन: संस्कृत, हिंदी, मराठी, मैथिलि, बंगाली, उड़िया, असमिया, कश्मीरी, नेपाली, कोंकणी, पंजाबी और उर्दू।

द्रविड़: तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम और टुल्लू।

मंगोलियन: मणिपुरी, त्रिपुरा, गारो और बोडो।

जनजातीय भाषा और बोलियां: गोंड, उरांव, संताली, मुंडारी आदि.

प्राचीन भारत में संस्कृत विशेष रूप से आर्यों के काल में सबसे प्रचलित भाषा थी। ऐसे प्रमाण हैं जो दर्शाते हैं कि संस्कृत अभिजात वर्ग द्वारा बोली जाती थी जबकि ‘निम्न वर्ग’ आम लोगों ने पाली को संचार के साधन के रूप में इस्तेमाल किया था। इस्लामी शासकों के आने से तत्कालीन भारत के अधिकांश क्षेत्रों में भाषा फारसी हो गई। क्षेत्रीय स्तर पर, स्थानीय बोलियां लोकप्रिय हो गईं जिन्होंने फारसी, तुर्की, अरबी आदि जैसी अन्य मुख्य प्रचलित भाषाओं से शब्द उधार लिए। धीरे-धीरे उर्दू फारसी भाषी वर्गों/विदेशियों और संस्कृत भाषी स्थानीय लोगों के संवाद साधन के रूप में विकसित हुई।

कुछ समय बाद अंग्रेज भारत में आये और अंग्रेजी भाषा ने फारसी को विस्थापित करना शुरू  किया। स्थानीय निवासियों के लिए अदालतों में हिंदी और उर्दू का इस्तेमाल होने लगा। शुरू में, ब्रिटिश अदालतों और अन्य भारतीय मामलों में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया गया लेकिन बाद में अंग्रेजों ने अंग्रेजी के प्रयोग की अपनी सहूलियत को देखते हुए स्थानीय भाषाओँ को दरकिनार कर दिया।

तत्कालीन प्रचलित कार्यालयी अथवा शासन में प्रयोग होने वाली -संस्कृत, अरबी और अन्य स्वदेशी भाषाओं को थॉमस बिंगटन मैकाले द्वारा मिनट ऑफ 1835′ के लागू होने से झटका लगा क्योंकि इसने भारतीय प्रणाली में अंग्रेजी भाषा प्रयोग का मार्ग प्रशस्त किया और इसने भारतीयों को अंग्रेजी सीखने के लिए माहौल बनाना शुरू कर दिया।

अधिकांश सरकारी कार्य अंग्रेजी में ही किए जाने लगे। भारत की कुछ जानी-मानी हस्तियों ने भी अंग्रेजी को भारतीय व्यवस्था में लागू करने का समर्थन किया। उदाहरण के लिए, राजा राम मोहन राय ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली शुरू करने का समर्थन किया ताकि ब्रिटेन के आधुनिक विज्ञान और उदारवादी शिक्षा की पहुंच से जनता को आधुनिक बोध प्राप्त हो सके। लेकिन अंग्रेजों के अत्याचार ने भारतीयों को हर लिहाज से विद्रोही बना दिया। राष्ट्रभाषा या देशभाषा को एकता और राष्ट्रीय/प्रांतीय गौरव के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा और इसे स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाने लगा।

आजादी के बाद, बहस मुख्य रूप से तीन लोकप्रिय भाषाओं अर्थात्: हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी में से एक के लिए थी।

“बंगाली, तमिल, मराठी आदि जैसी अधिकांश क्षेत्रीय भाषाएं भौगोलिक सीमाओं के प्रांतीय प्रचलन के कारण अपनी साहित्यिक उपलब्धियों के बावजूद अखिल भारतीय संवाद की दावेदारी बहस के उपयुक्त नहीं पाई गईं।” ये भाषाएं किसी प्रांत/राज्य से परे नहीं प्रसारित थीं।

प्रस्ताव रखा गया कि हिंदी को देश की राजभाषा बनाया जाए क्योंकि यह भारत में रहने वाले लगभग चालीस फीसद लोगों की मातृभाषा थी और इसे गैर हिंदी भाषी आबादी के एक बड़े हिस्से को भी समझने में सहूलियत होती। इस प्रस्ताव ने गैर-हिंदी राज्यों में एक प्रतिरोध की चिंगारी उठाई और जल्द ही यह चिंगारी पूरे देश में आंदोलनों को जन्म देने लगी। उनका तर्क था कि हिंदी को राजभाषा के रूप में क्यों चुना जा रहा है और तमिल आदि जैसी अन्य भाषाएं क्यों नहीं? जिसका जवाब हमें आगे मिलेगा। संविधान सभा में इस पर विस्तार से चर्चा की गई।

केवल एक ही भाषा के लिए बहस

जब संविधान सभा में भारतीय संविधान का निर्धारण किया जा रहा था तो संविधान निर्माताओं के मन में राजभाषा के रूप में एक भाषा चुनने का विचार भी आया। केंद्र सरकार की आधिकारिक भाषा क्या हो? भारतीय संविधान सभा में एक सबसे विवादित आधिकारिक मुद्दा यही था

हिंदी के राजभाषा होने के संबंध में दो समस्याएं थीं:

क) हिंदी की बोली; और

ख) भारत में मौजूद अन्य भाषाएं।

हिंदी करीब 17 अलग-अलग बोलियों में बोली जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्राचीन काल में भारत को हिंद कहा जाता था। इसलिए हिंद में बोली जाने वाली हर भाषा को हिंदी कहा गया। धीरे-धीरे भारतीय भी अपनी भाषाओं को हिंदी कहने लगे जिससे अंतत हिंदी की विभिन्न बोलियों का विकास हुआ। इसलिए बहस छिड़ गई कि किस बोली को सरकारी हिंदी बोली के रूप में चुना जाना है। बाद में जिस हिंदी बोली को अपनाया गया वह दिल्ली-आगरा क्षेत्र की संस्कृत शब्दावली के साथ बोली जाने वाली भाषा तय की गई। हालांकि, यह एक मामूली मुद्दा था। इससे पहले जिस महत्वपूर्ण मुद्दे से निपटना था, वह यह था कि किस भाषा को देश की राजभाषा के रूप में चुना जाए?

संविधान सभा के अधिकांश सदस्य महात्मा गांधी के उस सपने को पूरा करना चाहते थे, जिसमें  यह विचार था कि एक राष्ट्रभाषा राष्ट्र को एक विशिष्ट एकत्व का अस्मिता बोध देगी। डॉ एन.जी अयंगर संविधान सभा में अपने एक भाषण में कहते हैं-

एक बात जिस पर हम सभी समान सर्वसम्मत विचार रखते हैं वह यह है कि हमें भारत में एक समान भाषा को पूरे देश की आम भाषा के रूप में चुनना चाहिए। वह एक भाषा जिसका उपयोग संघ के आधिकारिक उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए.

उन्होंने देश की सबसे लोकप्रिय भाषा को भारत संघ की राजभाषा के रूप में चुना। लेकिन समाधान और उस समाधान तक पहुँचने का तरीका सरल नहीं था। जैसे ही सभा के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया, विधानसभा के कई सदस्यों ने इसका विरोध गैर-हिंदी भाषी आबादी के लिए अनुचित होने के आधार पर किया, जो अपनी गैर-हिंदी पृष्ठभूमि के कारण रोजगार के अवसरों, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं के मामले में पिछड़ जायेंगे। हिंदी भाषा को शामिल करने और शामिल न करने के लिए कई तर्क-वितर्क हुए। एल.के मैत्रा और एन.जी अयंगर सहित संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने मांग की कि क्षेत्रीय भाषाओं को भी मान्यता दी जानी चाहिए (राज्य स्तर पर) और चुनी हुई राष्ट्रभाषा को अनन्य नहीं बनाया जाना चाहिए। लोकमान्य तिलक, गांधीजी, सी. राजगोपालाचारी, सुभाष बोस और सरदार पटेल जैसे अन्य लोग थे जिन्होंने मांग की थी कि हिंदी का इस्तेमाल बिना किसी अपवाद के पूरे भारत में किया जाना चाहिए और राज्यों को भी हिंदी भाषा के इस्तेमाल का सहारा लेना चाहिए क्योंकि इससे एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि बाद में सी. राजगोपालचारी के विचार बदल गए पर उस समय वो भी इसी खेमें में शामिल थे।

अन्य सदस्य भी थे जो चाहते थे कि संस्कृत अपनी प्राचीनता और समृद्ध शब्दावली के कारण राष्ट्र की राजभाषा बने। साथ ही यह भी तर्क किया गया कि उस समय प्रचलित अधिकांश भारतीय क्षेत्रीय भाषाएं किसी न किसी तरह संस्कृत से जुड़ी हुई थीं जिसे सभी भाषाओं की जननी के रूप में जाना जाता है। लेकिन इस विचार को सभी ने स्वीकार नहीं किया। कुछ ने उर्दू का प्रस्ताव भी रखा लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जैसे ही भारत और पाकिस्तान के विभाजन की घोषणा हुई और पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी भाषा बताया, हिंदी समर्थकों ने उर्दू पर  ‘अलगाव की भाषा‘ का तमगा गढ़ा और राष्ट्रभाषा के तौर पर  देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी की मांग की। इस प्रकार पूरी सभा दो समूहों में विभाजित थी, एक समूह वह जिसने हिंदी का समर्थन किया और चाहता था कि हिंदी राजभाषा बने और दूसरा जो हिंदी के पक्ष में नहीं था कि वह राजभाषा बने।

कई भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में पेश करना व्यवहार्य नहीं माना गया। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के हवाले से कहा गया, “एक भाषा लोगों को एकजुट कर सकती है। दो भाषाओं से आप लोगों का विभाजित होना सुनिश्चित कर रहे हैं। यह एक उदासीन प्रकृति है। संस्कृति का संरक्षण भाषा से होता है। चूंकि भारतीय एकजुट होकर एक समान संस्कृति का विकास करना चाहते हैं, इसलिए सभी भारतीयों का यह कर्तव्य है कि वे हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में चुनें” 

अंतत जब संविधान सभा अपनी किंकर्तव्यविमूढ़ता के दरवाजे पर खड़ी हो अपनी एकता को संजो रही थी तभी उस संजोते हुए एकमत से मुंशी-अयंगर नामक सूत्र साधन अपना लिया गया।

यह आधे-अधूरे समझौते थे क्योंकि किसी समूह को वह नहीं मिला जो वह चाहता था।

इस सूत्र के अनुसार अंग्रेजी को पंद्रह साल की अवधि तक हिंदी के साथ-साथ भारत की राजभाषा के रूप में जारी रखना था लेकिन समय-सीमा नम्य थी और उसके विस्तार की शक्ति संसद को दी गई थी।

जब पंद्रह वर्ष की अवधि समाप्त होने वाली थी तब गैर हिंदी भाषी राज्यों में आंदोलन को रोकने के प्रयास में राजभाषा अधिनियम, 1963 नामक एक कानून बनाया गया। लेकिन अधिनियम के प्रावधान प्रदर्शनकारियों के विचारों को संतुष्ट नहीं कर सके।

यहां राष्ट्रभाषा पर शास्त्री के रुख का संदर्भ जरूरी है। प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री ने गैर हिंदी समूहों की राय पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उन्होंने गैर-हिंदी समूहों के चिंता को दरकिनार करते हुए प्रभावी ढंग से हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने की  वकालत की, उन्होंने घोषणा की कि वह सार्वजनिक सेवा परीक्षाओं में हिंदी को एक वैकल्पिक माध्यम बनाने पर विचार कर रहे हैं, जिसका अर्थ है कि गैर-हिंदी भाषी अभी भी अंग्रेजी माध्यम में अखिल भारतीय सेवाओं में प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होंगे, हिंदी भाषियों को अपनी मातृभाषा हिंदी को माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने में सक्षम होने का एक अतिरिक्त लाभ होगा। इससे गैर हिंदी समूहों में रोष बढ़ गया और वे हिंदी विरोधी हो गए और बाद में ‘हिंदी कभी नहीं  अंग्रेजी हमेशा’  के नारे भी बुलंद किये। इस प्रकार लाल बहादुर शास्त्री ने हिंदी के खिलाफ गैर हिंदी समूहों के धधकते आंदोलन को हवा दी।

राजभाषा अधिनियम में अंतत: इंदिरा गांधी की सरकार ने संशोधन किया था जिसमें देश की आधिकारिक भाषाओं के रूप में अंग्रेजी और हिंदी के अनिश्चितकालीन उपयोग का प्रावधान था। इसके बाद 1968 के साथ-साथ 1986 में आंदोलन हुए लेकिन वे केवल कुछ राज्यों तक ही सीमित थे ।

जहां तक अंकों का सवाल है तो एक बहस के बाद भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप को चुना गया और इसमें एक संलग्न किया गया कि पंद्रह वर्षों की अवधि के बाद संसद इस प्रणाली को अंकों के देवनागरी रूप से बदल सकती है।

भाषा के संबंध में संविधान

भारत बहुभाषी देश है। इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने राज्य के कार्यों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषाओं को निर्दिष्ट करने की आवश्यकता महसूस की। इसलिए भारतीय संविधान का 17वां भाग अस्तित्व में आया जो न केवल संघ की आधिकारिक भाषा (अनुच्छेद 343-344) और राज्यों की आधिकारिक भाषाओं (अनुच्छेद 345) का प्रावधान करता है बल्कि अंतरराज्यीय संचार की भाषा (अनुच्छेद 346-347) भी प्रदान करता है, अदालतों और विधायी प्रक्रियाओं (अनुच्छेद 348) में भाषा का उपयोग किया जाएगा। इन प्रावधानों के अलावा, कुछ विशेष निर्देश भी हैं (अनुच्छेद  350-351). वास्तव में, यह अध्याय मुंशी-अयंगर फार्मूले पर आधारित है और तदनुसार भाषा नीति चार भागों में प्रदान की गई है-संघ की भाषा, क्षेत्रीय भाषाएं, न्यायालयों की भाषाएं और विशेष निर्देश ।

संघ की भाषा: अनुच्छेद 343 के अनुसार देवनागरी लिपि में भारत संघ की राजभाषा हिंदी है। अंग्रेजी को हिंदी से बदलने की मंशा संविधान निर्माताओं में हमेशा से रही थी जब भी हिंदी अंग्रेजी को सभी संदर्भों जहां पिछले 100 वर्षों से उसका इस्तेमाल हो रहा है बदलने सक्षम हो जाए तो उस समय हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित किया जाए। लेकिन संविधान के शुरू होने की तारीख से 15 साल की अवधि इसके राजभाषा के रूप में उपयोग के लिए एक अंतरिम अवधि के रूप में प्रदान की गई, जिसके बाद हिंदी को संघ की एकमात्र राजभाषा बनाना था। हालांकि, जब 15 साल की अवधि खत्म होने वाली थी, संसद ने पाया कि हिंदी को एकमात्र राजभाषा के रूप में लागू करने का समय अभी भी परिपक्व नहीं है। इसके अलावा दक्षिण भारत में हिंसा की संभावनाएं भी थीं, जहां लोग अभी भी हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने को तैयार नहीं थे। इसलिए, संसद अनुच्छेद 343 (3) और 120 (2) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए राजभाषा अधिनियम 1963 पारित किया जिसमें संघ के सभी कार्यकारी कार्यों के लिए और संसद के सभी विधायी कार्यों के लिए हिंदी के अलावा आधिकारिक भाषा के रूप में अंग्रेजी को जारी रखने का प्रावधान था। लेकिन यह अधिनियम किसी भी तरह से हिंदी के प्रगतिशील उपयोग और राजभाषा के रूप में इसके संवर्धन को प्रतिबंधित नहीं करता है।

भारतीय संघ बनाम वी.मुरासोलीमारन मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अंग्रेजी भाषा के उपयोग के लिए समय बढ़ाना संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी के उपयोग में प्रगति का परित्याग करने के संदर्भ से उत्तरदायी नहीं है। इसने राष्ट्रपति के उस आदेश को भी बरकरार रखा, जिसके लिए प्रशासनिक कर्मियों को एक निश्चित तिथि से पहले निःशुल्क हिंदी प्रशिक्षण प्राप्त करना था और इस तरह के प्रशिक्षण से गुजरने में विफलता के लिए कोई दंड नहीं है, क्योंकि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 343 (2) के तहत प्रदान की गई शक्ति का वैध अभ्यास यही है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आदेश से किसी भी वर्ग पर विकलांगता या अनुचित बाध्यता नहीं थोपी गई। इसके बजाय, इसने व्यवसायों में समान दक्षता पर जोर दिया।

चूंकि अनुच्छेद 343 के तहत परंतुक में प्रावधान है कि राष्ट्रपति हिंदी के उपयोग के लिए आदेश जारी कर सकते हैं, इसलिए राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर इसका प्रयोग निम्नलिखित के रूप में किया गया:

1952: इस आदेश के माध्यम से, एक राज्य के राज्यपाल और सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के वारंट जारी करने के उद्देश्य से हिंदी को अंग्रेजी के अलावा इस्तेमाल करने के लिए अधिकृत किया गया था।

1955: “जनता के साथ पत्राचार, प्रशासन, कार्यालय पत्रिकाओं और संसद, सरकार के प्रस्तावों को रिपोर्ट तैयार करने के साथ उन राज्य सरकारों के साथ पत्राचार जिन्होंने हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाया है, संधियों और समझौतों, विदेशी अधिकारियों और राजदूतों और कांसुलर प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए भारतीय प्रतिनिधियों के साथ पत्राचार, सिफारिशें और विधायी अधिनियम, के उद्देश्य से अंग्रेजी के अलावा हिंदी के उपयोग के लिए आदेश जारी किया गया था

1960: प्रशासनिक कर्मियों के प्रशिक्षण में हिंदी भाषा के उपयोग के लिए आदेश का प्रावधान किया गया।

चूंकि हिंदी को अंग्रेजी की जगह लेने के योग्य नहीं माना जाता रहा, तो अनुच्छेद 344 के तहत इसके विकास के लिए प्रावधान किया गया, जिसमें संघ के आधिकारिक उद्देश्य के लिए हिंदी भाषा की प्रगतिशीलता के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिशें करने के कार्य के साथ राजभाषा पर एक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया, अंग्रेजी के उपयोग पर प्रतिबंध को लेकर अदालतों और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए भाषा का उपयोग किया जाएगा। अनुच्छेद 344 का उप-खंड (3) अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी से हिंदी के संक्रमण प्रक्रिया में शामिल कठिनाइयों को दर्शाता है क्योंकि दोषयुक्त संचार आसानी से संभव था। यहाँ तक कि उस समय भारत के संविधान का हिंदी में अनुवाद भी नहीं हो सका था। इस उद्देश्य के लिए भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक प्रगति आयोग द्वारा गैर-हिंदी  भाषी क्षेत्रों से संबंधित व्यक्तियों के दावों और हितों को उचित सम्मान दिया जाना था। साथ ही आयोग की सिफारिशों की जांच करने और राष्ट्रपति को उनकी राय पर रिपोर्ट देने के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया जाना था, जिसमें तीस सदस्य (लोकसभा से बीस सदस्य और राज्यसभा से दस) हैं।

देसी भाषाएं: अनुच्छेद 345 से 347 सरकारी कार्यों में राज्यों द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता देने का प्रावधान है। ये लेख महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि भारत को भाषाई आधार पर फिर से तैयार प्रशासित किया गया है और इसलिए सभी राज्यों में क्षेत्रीय भाषाएं प्रमुख हैं। अनुच्छेद 345 राज्य को अपने आधिकारिक उपयोग के लिए किसी भी क्षेत्रीय भाषा को चुनने और अपनाने का अधिकार देता है कि ऐसी भाषा को आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध किया जा सकता है या नहीं किया जा सकता। इसके अलावा जब तक ऐसा कानून नहीं बन जाता, तब तक अंग्रेजी ऐसे राज्य की भाषा होगी।

अनुच्छेद 345 स्वतंत्र है क्योंकि यह हिंदी को अपनाने के बाद अंग्रेजी को प्रतिबंधित नहीं करता है और इसलिए यह पहले से ही किए गए आदेश या किसी अन्य आधिकारिक कार्यवाही को शून्य करता है क्योंकि वे अंग्रेजी भाषा में किए गए थे। लेकिन ऐसा तब हो सकता है जब राज्य विधायिका अंग्रेजी के उपयोग को छोड़कर इस संबंध में कोई प्रावधान करे। अंतर-सरकारी संचार के उद्देश्य से अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाना था लेकिन केंद्र और राज्य के बीच संचार के लिए राजभाषा का इस्तेमाल किया जाना था। इसके विपरीत राज्य एक-दूसरे के साथ हिंदी का इस्तेमाल करने के लिए सहमत हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, संघ में आधिकारिक उपयोग के लिए अपनाई गई भाषा भी संचार के लिए राज्यों के बीच इस्तेमाल की जाने वाली भाषा थी। हालांकि, अगर दो या दो से अधिक राज्यों ने हिंदी को उनके बीच संचार की भाषा के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला किया तो वे ऐसा कर सकते थे। अनुच्छेद 347 ने यह बशर्ते , जहां इस संबंध में मांग की जा रही है, राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हैं कि किसी राज्य की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त किसी भी भाषा के उपयोग की इच्छा रखता है, वह यह निर्देश दे सकता है कि ऐसी भाषा को भी आधिकारिक तौर पर उस राज्य में मान्यता दी जाएगी या उसके किसी भी हिस्से को ऐसे प्रयोजनों के लिए मान्यता दी जाएगी जैसा कि वह निर्दिष्ट कर सकता है।” राज्यों के भाषाई संगठन की सीमाओं से उत्पन्न क्षेत्रीय स्तर पर भाषा के मामले में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक संघर्ष को हल करने में, यह प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह द्विभाषी नीति सुनिश्चित करने में मदद करता है।

अनुच्छेद 343 और 345 में क्रमशः ‘करेंगे'(shall) और ‘शायद'(may) शब्दों के उपयोग ने एक विवाद पैदा कर दिया है। एक तरफ, अनुच्छेद 343 में कहा गया है कि “संघ की राजभाषा हिंदी होगी”, दूसरी ओर अनुच्छेद 345 राज्यों को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है कि “राज्य की विधायिका कानून द्वारा स्थापित राज्य के सभी या किसी भी आधिकारिक उद्देश्य के लिए राज्य के लिए प्रयुक्त या हिंदी में से किसी भी एक या अधिक भाषाओं को अपना सकती है” इस प्रकार दो विरोधाभासी प्रावधान प्रदान करते हुए राज्यों के बीच और राज्यों और संघ के बीच हिंदी की भाषा को राजभाषा के रूप में इस्तेमाल करने पर संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई है।

विशेष निर्देश भारतीय संविधान का अध्याय चतुर्थ भाषाओं के संदर्भ में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से विशेष निर्देशों से संबंधित है। अनुच्छेद 350 में प्रावधान है कि कोई व्यक्ति संघ या राज्य की किसी भी भाषा में अपनी शिकायत के निवारण के लिए प्रत्यावेदन प्रस्तुत कर सकता है चाहे वह संघ या राज्य के किसी भी अधिकारी को संबोधित करे। अनुच्छेद 350A राज्य और स्थानीय प्राधिकारियों को अपनी सीमा के भीतर एक निर्देश जारी करता है, ताकि भाषाई अल्पसंख्यक समूहों से संबंधित बच्चों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में अनुदेश के लिए पर्याप्त सुविधाएं प्रदान करने का प्रयास किया जा सके। इस अनुच्छेद को सातवें संशोधन के माध्यम से संविधान में शामिल किया गया था।

अनुच्छेद 350B में राष्ट्रपति द्वारा भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति के लिए उन सुरक्षोपायों से संबंधित मामलों की जांच करने का निर्देश दिया गया है जिनके लिए संविधान प्रावधान के अनुसार भाषाई अल्पसंख्यक हकदार हैं। अनुच्छेद 351 में भारत की समग्र संस्कृतियों के लिए अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हिंदी भाषा के विकास और संवर्धन और संस्कृत और अन्य भाषाओं से शब्दावली बनाने का प्रावधान है। इस प्रकार, दो पहलू थे- (क) हिंदी के संवर्धन और प्रसार के लिए प्रयास (ख) भारत की समग्र संस्कृति का प्रतीक बनने के लिए अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के भाषाई तत्वों को शामिल करना।

अदालतों की भाषा भारत के संविधान के अध्याय III में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के साथ-साथ अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए भाषा का उपयोग करने का प्रावधान है। अनुच्छेद 348 में कहा गया है कि न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी होगी हालांकि राज्यपाल राज्य के आधिकारिक उद्देश्य के लिए और उपरोक्त अदालतों के समक्ष कार्यवाही के लिए हिंदी या किसी अन्य भाषा के उपयोग को प्राधिकृत कर सकते हैं। लेकिन अदालतों के फैसले, फरमान और आदेश अंग्रेजी में होंगे। यह विश्लेषण किया गया था कि “अनुच्छेद 348 के आधार पर (1) (ख) सभी आदेशों के आधिकारिक पाठ, नियम, संविधान या कानूनों और सभी अधिनियमों के तहत जारी किए गए विनियम और उप-कानून, राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित विधेयक, अध्यादेश उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही के उद्देश्य से अंग्रेजी भाषा में होंगे, अनुच्छेद 394-ए अदालतों में आवेदन के लिए अंग्रेजी पाठ के बराबर एक आसन पर हिंदी संस्करण का प्रयोग नहीं करता है.”  अदालतों को अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रखना था। इसका कारण श्री अयंगर ने बताया,

हमारी अदालतें अंग्रेजी के आदी हैं; वे अंग्रेजी में मसौदा तैयार कानूनों के आदी हो गए हैं; वे अंग्रेजी में व्याख्या करने के आदी हो गए हैं। हिंदी भाषा में अंग्रेजी शब्द के बराबर का उचित शब्द खोजना और फिर सभी उदाहरणों और फैसलों के साथ इसकी व्याख्या करने के लिए आगे बढ़ना हमेशा संभव नहीं होता है।.”

यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि हिंदी द्वारा अंग्रेजी के प्रतिस्थापन के लिए 15 वर्षों की समयबद्धता उच्चतम न्यायालयों और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही पर लागू नहीं थी।

मथुरा प्रसाद  बनाम बिहार राज्य, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि एक क़ानून के अंग्रेजी अनुवाद का प्रकाशन न करना, जो मूल रूप से हिंदी में था, अनुच्छेद 348 (1) (बी) (iii) का उल्लंघन नहीं करता था। हाल ही में विधि आयोग की एक रिपोर्ट (216) ने भी अदालतों में अंग्रेजी जारी रखने की सिफारिश की है।

अनुच्छेद 349 में भाषा से संबंधित कुछ कानूनों के अधिनियमन के लिए एक विशेष प्रक्रिया का पालन करने का प्रावधान है जिसके तहत राष्ट्रपति अनुच्छेद 344 के तहत गठित आयोग और समिति पर विचार करने के अलावा भाषा से संबंधित विधेयक पेश करने की अनुमति नहीं देंगे।

जहां अनुच्छेद 120 और 210 के तहत विधानमंडलों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषाओं के प्रावधान किए गए हैं, वहीं न्यायपालिका और कार्यपालिका के कार्यों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषाओं का प्रावधान भारत के संविधान के भाग XVII में किया गया है।

आठवीं अनुसूची: आठवीं अनुसूची मुंशी-अयंगर फार्मूले का परिणाम है जिसने भाषा आयोग को सभी क्षेत्रीय भाषा को शामिल करने की सिफारिश की थी। आठवीं अनुसूची में उन भाषाओं का नाम शामिल है जिन्हें राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई है। 92वें संशोधन के माध्यम से नवीन भाषाओं को जोड़ कर  वर्तमान में अनुसूची में भाषाओं की गणना बाईस हो गई है। यह अनुसूची दो उद्देश्यों को पूरा करती है:

इन भाषाओं का प्रतिनिधित्व आधिकारिक आयोग में किया जाना है।

अनुच्छेद 51 के तहत दिए गए हिंदी के विकास के लिए इन भाषाओं से शब्दावली ली जा सकती है।

1956-1966 के बीच की अवधि के दौरान भाषाओं के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद इन क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व मिला।हालांकि अनुसूची में किसी भाषा के प्रवेश के लिए कोई विशिष्ट स्पष्ट मानदंड नहीं है, मोटे तौर से निम्न अलिखित मानदंडों का पालन किया जाता है:-

  • अलग साहित्यिक परंपराओं का अस्तित्व
  • विशिष्ट स्वतंत्र लिपि

भाषा को बोलने वालों की बड़ी संख्या जो किसी क्रमिक सतत भौगोलिक क्षेत्र में या व्याप्त हो, संस्कृति और विरासत की अभिव्यक्ति का माध्यम हो ताकि यह अन्य साहित्यिक भाषाओं के आधुनिकीकरण के लिए एक संसाधन भाषा बन सके।

इन भाषाओं को अनुसूची में शामिल करने से उन भाषाओं के वक्ताओं और समर्थकों को एक पहचान के साथ-साथ भावनात्मक संतुष्टि मिलती है ।

कन्हैया लाल सेठिया  बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “किसी विशेष भाषा को अनुसूची 8 में शामिल करना और शामिल नहीं करना केंद्र सरकार का नीतिगत मामला है और न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इसके अलावा यह भी है कि किसी को भी केंद्र को विशेष भाषा को शामिल करने के लिए बाध्य करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है।

अंग्रेजी बनाम हिंदी- बहस

भारत अभी भी अपने एक अखिल भारतीय भाषा के सपने को मूर्त रूप देने में सक्षम नहीं हो पाया है एक साझी भाषा जो पूरे राष्ट्र और प्रत्येक नागरिक को स्वीकार्य हो जिसे ‘लोक’ अपना समझे!

कई विद्वानों ने सुझाव दिया है कि अंग्रेजी को राष्ट्र की एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में अपना लिया जाना चाहिए क्योंकि पिछले  लगभग 170 वर्षों से संघ के आधिकारिक कार्यों में इसका उपयोग किया जा रहा है और भारतीय भाषा के आदी हो चुके हैं। इसके अलावा,“अंग्रेजी जानने वाले बुद्धिजीवियों ने न केवल उन आधुनिक संस्थानों के गठन में बहुत योगदान दिया है जो आज हम प्रयोग करते हैं बल्कि समानता, स्वतंत्रता या प्रगति के आधुनिक विचारों के लिए भी यहाँ काफ़ी सहजता है।

दूसरी ओर हिंदी भाषा के समर्थकों का आरोप है कि भारत की आबादी के एक हिस्से के लिए अंग्रेजी आज भी ‘गुलामी का प्रतीक’ है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा कि अंग्रेजी राष्ट्र को 2 जातियों में बांटती है- अंग्रेजी भाषी यानी शक्तिशाली अभिजात वर्ग और देसी भाषा भाषी यानी  कमजोर जनमानस।

‘राल्फ फासोल्ड’ के अनुसार, “पूर्व औपनिवेशिक सत्ता की भाषा राष्ट्रीय भाषा के रूप में एक बिल्कुल भद्दा विकल्प हैएक नए देश के चेतना के मर जाने का बुरा प्रतीक इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकता है कि एक देश जिससे आप स्वतंत्र हुए उसी की भाषा को राष्ट्र भाषा मान लिया[26]

इसलिए हिंदी एक बेहतर विकल्प है क्योंकि यह एक स्वदेशी भाषा है और भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से के साथ जान पहचान रखती है। इसकी अपनी एक समृद्ध शब्दावली है और यह दुनिया की सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक संस्कृत की उत्तराधिकारी बनी है, इसके अलावा हिंदी भारत की सबसे विकसित भाषाओं में से एक है। राजभाषा आयोग की रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि हिंदी को केवल इसलिए नहीं चुना जा रहा है क्योंकि यह अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की तुलना में बेहतर विकसित है; बल्कि इसलिए भी नहीं कि साहित्यिक काम का एक बड़ा या अधिक विविध अखिल भारतीय रूप इसमें उपलब्ध है; और न इसलिए की वर्तमान में विज्ञान में और आधुनिक ज्ञान की विभिन्न अन्य शाखाओं में पुस्तकों की एक बड़ी उपलब्धता है। इसे इसलिए चुना जा सकता है… क्योंकि इसे भारत में सबसे बड़ी संख्या में लोग समझ सकते हैं बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के इसमें बात की जाती है ।

1951 की जनगणना के अनुसार, भारत में हिंदी भाषियों की संख्या 149 मिलियन थी, अर्थात्. देश की कुल आबादी का 42% लेकिन इस आंकड़े में हिंदी, उर्दू, हिंदुस्तानी और पंजाबी संयुक्त रूप से थे।

यह राजभाषा आयोग, 1956 की रिपोर्ट का आधार था।

1961 में, विशेष रूप से हिंदी के 133 मिलियन वक्ता थे जो भारत की आबादी का लगभग 30% थे, 1971 की जनगणना में यह सामने आया कि 38% आबादी हिंदी बोलती है जो संख्या  1981 में बढ़कर 42.9% हो गई।

लेकिन निम्नलिखित कारणों से इसे भारत की एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में नहीं लिया जा सका:

  • द्रविड़ मुनेड कड़गम (डीएमके) अपने हिंदी विरोधी चरित्र के कारण तमिलनाडु में सत्ता में आई।
  • शुरू में गैर हिंदी राज्यों पर हिंदी थोपी जा रही थी। (उन्हें हिंदी सीखने के लिए मजबूर करना जिससे इन राज्यों के लोग नाराज थे)।

हिंदी समर्थक, श्री जवाहरलाल नेहरू ने स्वयं संसद में घोषणा की थी कि हिंदी समर्थक समूहों के नेताओं का अति उत्साह है जो हिंदी के प्रसार में बाधा बन गया।

भाषाई आधार पर राज्यों के संगठन ने भी राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के मार्ग में बाधा पैदा की।

इसलिए हिंदी को अंग्रेजी के साथ यह खिताब बांटना पड़ा जिससे आज भी प्रशासनिक क्षेत्र के हर पहलू में अंग्रेजी की स्थिति मजबूत है। 2001 की जनगणना के अनुसार विभिन्न बोलियों में हिंदी बोलने वाले लगभग 422 मिलियन लोग राष्ट्रीय आबादी का 41.03 प्रतिशत हिस्सा हिंदी भाषी हैं। लेकिन भारतीयों ने वैश्वीकरण के इस दौर में दोनों भाषाओं में सामंजस्य बिठाना सीख लिया है। वे विचारों, व्यापार के लिए अंग्रेजी का उपयोग करते हैं ओर दैनिक बातचीत के लिए हिंदी का उपयोग करते हैं, ठीक नेहरु की तरह जिन्होंने मतदाताओं के साथ हिंदी का उपयोग किया और वैचारिक अभिवयक्ति अंग्रेजी में की।

हिंदी को बढ़ावा देने के लिए राजभाषा विभाग का गठन किया गया है जो नीतियां और वार्षिक कार्यक्रम तैयार करता है और हिंदी के कार्यान्वयन में सहायता देता है।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य

बहुभाषावाद भारत के लिए अद्वितीय विशेषता नहीं है। दुनिया में अन्य देश भी हैं जो अपने राज्यों में बहुभाषावाद के प्रचलित होने से सामंजस्य बैठाने में परेशान होते हैं, भारत की तरह उन्हें भी बहुभाषावाद के मुद्दे से निपटने में भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

वे बहुभाषावाद की समस्या से निपटने और आधिकारिक मामलों में संचार की एक आम भाषा की पेशकश करने के लिए नीतियां लेकर आए हैं।

जहां तक फ्रांस का संबंध है, फ्रांसीसी देश की आधिकारिक भाषा है लेकिन यह राज्य के आधिकारिक उद्देश्य तक सीमित है। हालांकि फ्रांस में कई क्षेत्रीय भाषाएं मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सरकार द्वारा कोई तंत्र मुहैया नहीं है। फ्रांस अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में अंग्रेजी के समृद्ध साम्राज्य के खिलाफ सांस्कृतिक विविधता के लिए लड़ रहा है। फ्रांसीसीयों का अब मानना है कि सभी नागरिक  समान हैं और इस प्रकार, कोई भी समूह दूसरों पर अतिरिक्त अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकता, जो पूर्व की साम्राज्यवादी विचारधारा से बिल्कुल अलग और विपरीत है।

यूरोपीय चार्टर फॉर रीजनल या माइनॉरिटी लैंग्वेज’ के जरिए यूरोप में बहुभाषावाद की समस्या से निपटा गया है। यह यूरोपीय संधि है जिसे यूरोप में ऐतिहासिक क्षेत्रीय और अल्पसंख्यक भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए यूरोप परिषद द्वारा 1992 में अपनाया गया था। ऐतिहासिक क्षेत्रीय और अल्पसंख्यक भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए राज्यों ने क्या कार्रवाई की है? यह जानना दिलचस्प है- चार्टर में प्रावधान किया गया है कि क्षेत्रीय या अल्पसंख्यक भाषाओं के लिए यूरोपीय चार्टर के तहत भाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा संरक्षित भाषाओँ में में से कुछ ग्रीक, रूसी, रोमानी, चेक, हंगरी, इतालवी, जर्मन, पोलिश, तुर्की, सर्बियाई आदि हैं। इस प्रकार, चार्टर अल्पसंख्यक भाषा बोलने वालों के अधिकार की गारंटी देता है कि वे अपनी भाषा का पूरी तरह से और स्वतंत्र रूप से उपयोग करें। दिलचस्प बात यह है कि देश के विघटन और विभाजन के डर से फ्रांस ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।

बहुभाषावाद संयुक्त राज्य अमेरिका में भी एक नई अवधारणा नहीं है। कनाडा का कानून फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेजी में भी है। संयुक्त राष्ट्र 1945 के चार्टर के अनुच्छेद 111 के अनुसार, सभी विधान पांच भाषाओं में निर्मित हैं और सभी भाषाओँ के आधिकारिक ग्रंथों पर विचार करते हुए सबको समान महत्व में रखा जाता है। इन आधिकारिक ग्रंथों के बीच किसी दुविधा के मामले में सामंजस्यपूर्ण व्याख्या का नियम लागू किया गया है।

“भाषाओं के संघर्षों के स्वरूप में एक विस्तार सामाजिक प्रणाली में परिवर्तन के से लाया जा सकता है विभिन्न भाषा समूहों के बीच संपर्क ही इसका एक विकल्प है। बेल्जियम और फ्रांस, कनाडा इसके उदाहरण हैं। ऐसी स्थिति के कारण निम्नलिखित हैं: एक प्रमुख भाषा समूह (बेल्जियम में फ्रेंच, कनाडा में अंग्रेजी) प्रशासन, राजनीति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अधिकार को नियंत्रित करता है, और उन आवेदकों को रोजगार वरीयता देता है जिनके पास इन प्रमुख भाषा की समझ है। इसलिए गरीब या दीन अल्पसंख्यक वर्ग प्रतिरोध से जवाबी कार्रवाई करता है।

चीन इस मामले में भाग्यशाली है। चीन में लगभग 56 जातीय समूह हैं, जिनमें से चीनी भाषा बोलने वाले राष्ट्रीय आबादी का 91.96 प्रतिशत हैं । दूसरी ओर, 55 अल्पसंख्यक जातीय समूहों के बीच में से जो अन्य क्षेत्रीय भाषाएं बोलते हैं केवल जहुआंग भाषा बोलने वालों की संख्या15 मिलियन से अधिक है।

भले ही किसी देश की राष्ट्रभाषा हो, मगर वहां की प्रत्येक क्षेत्रीय भाषा को सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता है क्योंकि राष्ट्रभाषा को लोगों पर थोपा नहीं जा सकता अन्यथा शांति भंग होने की संभावना है।

एक राष्ट्रीय भाषा का महत्व

एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल जो राष्ट्रभाषा के विषय के सामने आते ही उठता है, वह यह है कि राष्ट्रभाषा की क्या जरूरत है?  इसके लिए तमाम हो-हल्ला क्या है?

सामाजिक परिवर्तन में राष्ट्रभाषा की भूमिका का बड़ा महत्व है। यह राष्ट्रभाषा है जिसके माध्यम से समाज को एक साथ एक सुगठित और संगठित इकाई में रचना शीलता दी जाती है। एकल भाषा के अस्तित्व से समाज में एकजुटता और लगाव आता है। विधि आयोग अपनी 216वीं  रिपोर्ट (2008) में इस बात से सहमत है कि भाषा किसी भी राष्ट्र के नागरिकों के लिए अत्यधिक भावनात्मक मुद्दा है। यह एक महान संगठित बल है और राष्ट्रीय एकता के लिए एक शक्तिशाली साधन है। यह सामाजिक परिवर्तन का बहुत मजबूत और प्रभावशाली साधन है। इसमें लोगों की सोच और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता है।

भारत को एकभाषी राष्ट्र बनाने के प्रयास में संविधान निर्माताओं का उद्देश्य अन्य भारतीय भाषाओं को उखाड़ फेंककर हिंदी के एकाधिकार को बढ़ावा देना नहीं था। इसके बजाय वे ‘एक अखिल भारतीय भाषा‘ शुरू करना चाहते थे जिसका उपयोग भारत को अभिव्यक्ति देने के लिए किया जा सकता है और जिसका उपयोग नागरिक उन अन्य लोगों के साथ संवाद करने के लिए कर सकते हैं जिन्होंने अपनी भाषा में शासन का स्वाद नहीं चखा।

साथ ही राष्ट्रभाषा का चयन करने से समाज में एकरूपता आती है। भारतीय संदर्भ में कार्यकारी और न्यायिक कार्यों में एक ही भाषा का उपयोग देश में एकरूपता और अखंडता लाने में मदद कर सकता है। एक राष्ट्रभाषा के महत्व को समझाते हुए संविधान सभा के अध्यक्ष ने कहा-

पूरे संविधान में कोई अन्य मत नहीं है जिसे दिन-प्रतिदिन, घंटे-प्रतिदिन लागू करने की आवश्यकता होगी, मैं लगभग व्यवहार में मिनट से मिनट प्रति भी यह कह सकता हूँ। यहां तक कि अगर हम एक विशेष प्रस्ताव बहुमत से पारित कराने में सफल भी रहेयदि यह देश में किसी भी एक वर्ग के लोगों के अनुमोदन के बिना पूरा होता है चाहे वह उत्तर में हो या दक्षिण तो  संविधान का कार्यान्वयन सबसे कठिन समस्या बन जाएगा

भारत में एक एकीकृत न्यायिक प्रणाली है जिसके तहत अधिकांश कानून पूरे देश में आम हैं और एक उच्च न्यायालय अन्य उच्च न्यायालयों के निर्णयों का हवाला देता है। इसलिए आसान व्याख्या और उदाहरणों के लिए भाषा के मामले में एकरूपता की आवश्यकता है।

गांधी के अनुसार (अध्यक्षीय भाषण, गुजरात शैक्षिक सम्मेलन, बारोच, 1917), निम्नलिखित आवश्यकताएं थीं जिन्हें राष्ट्रभाषा बनने के लिए एक भाषा द्वारा पूरा किए जाने की आवश्यकता थी। ये हैं:-

  1. सरकारी अधिकारियों के लिए सीखना आसान होना चाहिए।
  2. इसे पूरे भारत में धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक समागम के माध्यम के रूप में जीवित रहने में सक्षम होना चाहिए।
  3. यह भारत के बहुसंख्यक निवासियों की भाषा होनी चाहिए।
  4. पूरे देश के लिए सीखना आसान होना चाहिए।

गांधी ने आधिकारिक क्षेत्र से अंग्रेजी भाषा को हटाने का कार्य एक राष्ट्रीय महत्व का कार्य माना। उन्होंने लिखा- हमें अपनी भाषा की और उपेक्षा नहीं करनी चाहिए इस प्रकार हम  हमारी अपनी भाषा को नष्ट कर रहे हैं। अंग्रेज अपनी मातृभाषा बोलने और अपने सभी उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग करने पर जोर देते हैं। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए और इस प्रकार हिंदी को राष्ट्रभाषा के उच्च पद तक बढ़ाना चाहिए।

भारतीय जनविज्ञान सर्वेक्षण का अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भाषा मुख्यतः नागरिकों का अपना निजी मामला है न कि सरकारी, साथ ही भाषाई एकीकरण को आधिकारिक स्तर के बजाय लोकप्रिय स्तर पर प्राप्त करने की आवश्यकता है।

मूलरूप से राष्ट्रीय भाषा एक ही छत के नीचे एक साथ विविध संस्कृतियों और जातियों को लाने के लिए आवश्यक है ताकि एक राष्ट्र आसानी से और तेजी से कम संघर्ष लीला के साथ विकास  कर सके। एक एकीकृत समाज एक विघटित समाज की तुलना में तेज़ी से विकास करता है। इसलिए, अधिक आंतरिक संघर्षों का मतलब है कि धीमा सामाजिक परिवर्तन और एक भाषावाद आंतरिक संघर्षों को कम करने में काफी हद तक मददगार हो सकता है।

निष्कर्ष

राष्ट्रभाषा का मुद्दा संविधान निर्माताओं ने जितना सोचा था उससे कहीं अधिक जटिल हो गया है। औपनिवेशिक सत्ता ने राजभाषा को जारी रखने के विकल्प को स्वदेशी पहचान और विशिष्ट राष्ट्रीय छवि के अनुसार छोड़ दिया जो विभाजित विचारों के बीच जटिल प्रश्न बन गया है। हाल ही में तेलंगाना का आंध्र प्रदेश से राज्य के रूप में अलग होना भी भाषाई संघर्ष का नतीजा है। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि किसी भाषा में किसी देश को बनाने या तोड़ने की शक्ति होती है। समान भाषा बोलने वालों के प्रति लोगों में आपसी लगाव पनपता है।

लेकिन राष्ट्रभाषा पर जोर इस तथ्य को कम महत्व का नहीं कर सकता कि क्षेत्रीय भाषाओं को भी महत्व दिया जाना चाहिए और उनकी सुरक्षा के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। आखिरकार, वे एक राष्ट्र की विभिन्न संस्कृतियों को दर्शाता है और एक समाज की जातीयता को संरक्षित करने में मदद करता है । गांधी जी ने भी इस संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, “जबतक हम हिंदी को अपना प्राकृतिक दर्जा नहीं देंगे और प्रांतीय भाषाएं लोगों के जीवन में उनका उचित स्थान नहीं प्राप्त करती, स्वराज की सभी बातें बेकार हैं।”

इस विचार के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय चार्टर का अनुच्छेद 2 (2), 1966, भाषा के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय चार्टर, 1966 में यह भी प्रावधान है कि “जिन राज्यों में जातीय, धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक मौजूद हैं, ऐसे अल्पसंख्यकों से संबंधित व्यक्तियों को अपने समूह के अन्य सदस्यों के साथ समुदाय में, अपनी संस्कृति का आनंद लेने, अपने स्वयं के धर्म का दावा करने और अभ्यास करने या अपनी भाषा का उपयोग करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा।

यहां तक कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद 29 के तहत लिपियों और भाषाओं के संरक्षण का प्रावधान है और अनुच्छेद 14 के तहत भाषा के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव का निषेध है

वीएन सुनंदा रेड्डी बनाम आंध्रप्रदेश मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जिन मामलों में सार्वजनिक रोजगार तक पहुंच के मामले में भाषा के आधार पर भेदभाव किया गया था, वह अनुच्छेद 16 (1) के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। लेकिन सावधानी बरती जानी चाहिए कि क्षेत्रीय भाषा पर बहुत अधिक जोर इस प्रकार न दिया जाए कि वह किसी राष्ट्र की अखंडता को दांव पर लगाए। एच.एम.सी.सी.सीरवई का कहना है कि संविधान की स्थापना दो देशों के सिद्धांत (जिसके कारण पाकिस्तान का गठन हुआ) को जोरदार ढंग से अस्वीकार करने पर किया गया है जिससे नस्ल, धर्म और भाषा में अंतर अलग राज्य की मांग करने के लिए पर्याप्त था।  यह एक विडंबना होगी अगर इस तरह के सिद्धांत को अस्वीकार करने के बाद हम अंत में केवल भाषा के आधार पर स्थापित दस-बारह राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार करते हैं।

हालांकि जहां तक एक राजभाषा का संबंध है तो उसे लागू करने में भारत असफल रहा है लेकिन जहां तक भाषा का संबंध है, द्विभाषिता की नीति ने किसी तरह सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को बहाल करने में मदद की है।

लेकिन सच्चाई यह है कि अंग्रेजी आम जनता की भाषा नहीं है। यह सिर्फ देश के विघटन को रोकने के लिए एक समझौता था। यह राष्ट्रभाषा कभी नहीं बन सकती हालांकि इसने भारत में सामाजिक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 19वीं सदी के दौरान अंग्रेजी भाषा ने भारत को राजनीतिक एकता दी। इस राजनीतिक एकता ने स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत किया। फिर भी, अंग्रेजी एक स्वदेशी भाषा के रूप में राष्ट्रीय पहचान कभी हो सकती।

भारत के संविधान की प्रस्तावना में विशेष रूप से राष्ट्र की एकता और अखंडता का प्रावधान है। इसलिए, ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जो आदर्श के साथ असंगत हो। इस प्रकार केवल दोनों ताकतों का सामंजस्यपूर्ण समावेश राष्ट्र के सामाजिक विकास को जन्म दे सकता है। इसी कारण से भारतीय शिक्षा प्रणाली में तीन भाषा नीति’ को लागू किया गया था।

यह नियम “विभिन्न दबाव समूहों की मांगों के बीच एक समझौता है और एक तानाशाही रवैय रोकता है पर यह एक जटिल समस्या का अपूर्ण समाधान भी है यह सामूहिक पहचान (मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं), राष्ट्रीय गौरव और एकता (हिंदी), और प्रशासनिक दक्षता और तकनीकी प्रगति (अंग्रेजी) के हितों को समायोजित करने का प्रयास करता है। हालांकि यह बहुत सफल नहीं रहा है, लेकिन विरोधी समूहों के बीच सद्भाव स्थापित करने का प्रयास सराहनीय है।

कोई भी केवल यह आशा कर सकता है कि एक दिन भारत की अपनी राष्ट्रभाषा होगी। इससे देश को ‘विविधता में एकता‘ की अनूठी मिसाल के रूप में दुनिया में अपने लिए एक जगह बनाने में मदद मिलेगी और सामाजिक बदलाव लाने में उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगा।

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Written by gopal jha

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