in , , ,

शुरुआती लापरवाही से ग्रामीणों पर कोरोना पड़ा भारी

जांच न होने से बीमारी को पहचानने में देरी, इसे स्वीकार करने में देरी, फिर इलाज शुरू करने में देरी, लक्षण होने के बावजूद जांच रिपोर्ट का इंतजार करना, तुरंत इलाज शुरू न करना जैसे कारण गांव में मौतों की संख्या बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं।

मध्य प्रदेश के गांवों में सन्नाटा पसरा है। ग्रामीण सर्दी, जुकाम, खांसी और बुखार से ग्रसित हैं। अस्पताल न जाने, जांच न कराने और वैक्सीन न लेने की जिद, इन्हें मौत के मुंह में धकेल रहा है। जो अपनों को खो रहे हैं, उनकी आंखें नम है। लेकिन वह कोरोना संक्रमण से मौत पर बात करने को तैयार नहीं है। अधिकतर मृत्यु जांच न होने के कारण सामान्य माना जा रहा है। लेकिन गांव में मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अकेले पन्ना जिले के पवई विकासखंड के 18 गांवों में पिछले एक हफ्ते में 17 लोगों की मौत हुई है। इसी तरह शहडोल जिले के ब्यौहारी विकासखंड में 87, बैतूल जिले के एक ही गांव बोरगांव में 21, यहां तक प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में आने वाला टिकोदा गांव में 20 दिनों में 10 लोगों की बुखार के बाद मौत हो गई और इतने ही लोग हालत बिगड़ने के बाद इलाज के लिए दूसरे शहर गए हैं, जबकि टिकोदा की कुल आबादी ही 350 हैं, जिनमें से तकरीबन आधे लोग बुखार और खांसी से पीड़ित हैं।

लोग बुखार से दम तोड़ रहे हैं। फिर भी समय रहते जांच करवाने को तैयार नहीं है। कुछ दबी जुबान कहते है, कि कुछ लोगों को वैक्सीन लगवाने के बाद बुखार आया, जो बहुत दिनों तक ठीक नहीं हुआ और कई लोगों की तो जान चली गई। उनके भीतर डर इस कदर समा गया, कि कहते हैं, जांच कराने जाएंगे, तो कोविड के लक्षण बताकर अस्पताल में अलग-थलग भर्ती कर देंगे, फिर वहां से हम घर वापस नहीं आएंगे। छिंदवाड़ा में तो स्वास्थ्य विभाग की टीम सहजपुरी गांव पहुंची तो ग्रामीणों ने हंगामा खड़ा कर दिया, टीम को उल्टे पांव वापस भागना पड़ा। हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने वैक्सीन के बाद किसी की भी मौत को नकारा है, लेकिन यह भी सच है, कि सरकारी आंकड़ों में गांव में कोरोना या बुखार से मौतों के सही आंकड़े सामने नहीं आ रहे है। इस तरह कोविड से मौत का सही आंकड़ा कभी हमारे सामने नहीं आ पायेगा। इसलिए आज वैक्सीन से मौत के डर को खत्म करना सरकार और समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

बैतूल जिले की रहने वाली रेखा गुजरे भीमपुर विकासखंड के 155 गांवों में काम करती है। वह बताती है कि ग्रामीण कोविड संक्रमण की जांच के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। दूसरी तरफ लोग इतने डरे हुए हैं कि कहते हैं ‘वैक्सीन लेने से वे मर जाएंगे। टीका लगने के बाद उन्हें बुखार और चक्कर आयेगा। फिर उन्हें अस्पताल में भर्ती कर लिया जाएगा, जहां उसकी मृत्यु निश्चित है।’ वह घर में ही बीमारी का इलाज कर रहे हैं। कुछ तो पूजा-पाठ कर बीमारी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। लोगों के अंदर यह जो भ्रम है, यह बहुत खतरनाक हैं। इसे किसी भी सूरत में तोड़ना ज़रूरी है। जब मरीजों की स्थिति बहुत गंभीर होने लगती है, तभी मजबूरन उसे अस्पताल लेकर जाते है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

वैक्सीन का उल्लेख करते हुए रेखा गुजरे ने कहा, कि भीमपुर विकासखंड के 155 गांवों में तीन फीसदी से भी कम टीकाकरण हुआ है। रेखा ने कहा, कि ग्रामीणों द्वारा वैक्सीन को नकारे जाने पर पूरा प्रशासन और स्वास्थ्य अमला परेशान है। इनका भ्रम दूर करने और उन्हें जागरूक करने के लिए सरकार को कुछ अलग तरीके सोचनी होगी। वह बताती है, कि उनकी संस्था लगातार ग्रामीणों को जागरूक करने का काम कर रही है। उन्होंने बोरगांव का उल्लेख करते हुए कहा, कि यहां एक हफ्ते में 21 लोगों की बुखार से मृत्यु हुई है। डॉक्टरों के अनुसार मरीजों के अंदर लक्षण कोविड के ही थे, फिर भी इन मौतों को सामान्य माना गया। रेखा ने कहा संस्था अपनी तरफ से ग्रामीणों को ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर, स्टीम मशीन आदि दे रही है। उन्हें समझा रही है वह अपना ऑक्सीजन का स्तर बराबर जांचते रहें। ऑक्सीजन का लेवल कम होने पर मरीज को तुरंत अस्पताल लेकर जाये, क्योंकि ऑक्सीजन का कम होना जानलेवा हो सकता है। लेकिन यह काम संस्था के प्रयास से बहुत कम गांव में हो पा रहा है। इसका दायरा बढ़ाने की जरूरत है।

इसी तरह पन्ना जिले के सामाजिक कार्यकर्ता रामनिवास खरे बताते हैं, कि यहां के गांवों में संक्रमण को लेकर ऐसी भ्रम की स्थिति है, कि गांव वाले कहते हैं, कि जांच रिपोर्ट में कोरोना संक्रमित बताकर हमें कोविड केयर सेंटर भेज देंगे। जहां से हम ठीक होकर घर वापस नहीं आयेंगे। रामनिवास ने अपने बड़े भाई जीतेन्द्र खरे का उल्लेख करते हुए बताया, कि भाई बीमार हुए, तो हम लोग उन्हें पन्ना से छतरपुर ले गये। क्योंकि पन्ना में इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही थी। कोविड की जांच हुई रिपोर्ट आने तक उन्हें जनरल वार्ड में रखा गया। रिपोर्ट में कोविड संक्रमण आने के बाद उन्हें कोविड वार्ड भेजने की तैयारी होने लगी। कोविड का नाम सुनते ही उनकी हृदय गति रूक गई।

दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों के लोग समुदाय के साथ मिलकर रहते हैं। कोविड वार्ड में उन्हें अकेले रहना पड़ेगा, यह सोचकर ही वह डर जाते हैं। उन्होंने पन्ना के चिकित्सा सुविधा का उल्लेख करते हुए कहा, कि पवई विकासखंड के तीन आदिवासी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसे मोहन्द्रा, सिमरिया और हरदुआ खमरिया में पिछले एक साल से डॉक्टर नहीं है। यहां कोई बीमार पड़े, तो झोलाछाप डॉक्टर ही इनका इलाज करते हैं। कोरोना संक्रमण की जांच सिर्फ पवई सामुदायिक केंद्र में हो रहा है, जो गांवों से लगभग 55 किलोमीटर दूर है। ग्रामीण जांच कराने इतनी दूर जाने को भी तैयार नहीं है।

मण्डला की अनीता संगोत्रा के अनुसार इस जिले के गांवों में 22 अप्रैल से महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम घर-घर जाकर ग्रामीणों की जांच कर रही हैं। इन्हें बुखार, खांसी की दवा दी जा रही है। ग्रामीणों को कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए जागरूक किया जा रहा है। अनीता बताती है, कि कोरोना की दूसरी लहर पहले जैसी नहीं है, मास्क और सामाजिक दूरी से इससे बचा जा सके। इसलिए ज्यादा बुखार वाले लोगों को तुरंत कोविड केयर सेंटर में भेजा जा रहा है। मवई विकासखंड के 15 गांव में से अभी तक केवल दो गांव में संक्रमित पाये गये है, जिसमें से चंदा गांव के सरपंच और उनकी पत्नी का कोरोना से निधन हुआ है। इसके अलावा यहां विधायक के छोटे भाई की भी मृत्यु कोरोना से हुई है। फिर भी ज्यादा लोग वैक्सीन को लेकर भ्रमित है। बुखार आने पर खुद जाकर जांच नहीं करवा रहे हैं। इस भ्रम को तोड़ने के लिए पॉजिटिव से नेगेटिव हुए लोगों का अनुभव साझा करना बहुत जरूरी है। हालांकि आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्रों में पल्स ऑक्सीमीटर से ग्रामीणों की जांच हो रही है, लेकिन वैक्सीनेशन के बारे में चर्चा करने पर ग्रामीण मुंह फेर लेते हैं। ग्रामीणों का कहना है, कि सरपंच की मौत वैक्सीन लगवाने के बाद ही हुई थी।

दरअसल जांच न होने से बीमारी को पहचानने में देरी, इसे स्वीकार करने में देरी, फिर इलाज शुरू करने में देरी, लक्षण होने के बावजूद जांच रिपोर्ट का इंतजार करना, तुरंत इलाज शुरू न करना जैसे कारण गांव में मौतों की संख्या बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं। इससे पहले कि यह भयावह स्थिति को पहुंचे राज्य सरकार से लेकर स्थानीय प्रशासन को सतर्क होकर काम करने और ज़्यादा से ज़्यादा जागरूकता अभियान चलाने की ज़रूरत है।

यह आलेख भोपाल, मप्र से रूबी सरकार ने चरखा फीचर के लिए लिखा हैइस आलेख पर आप अपनी प्रतिक्रिया इस मेल पर भेज सकते हैं

charkha.hindifeatureservice@gmail.com

 

The views and opinions expressed by the writer are personal and do not necessarily reflect the official position of VOM.
This post was created with our nice and easy submission form. Create your post!

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

Comments

0 comments