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कृषि बिल किसके हक़ में – किसान या उद्योगपति?

किसानों को यह भी डर है कि इस बिल के आने से एमएसपी छीन जाएगा, जिससे किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य में नहीं बेच पाएगा। हालांकि सरकार का कहना है कि एमएसपी रहेगा।

23 दिसंबर, राष्ट्रीय किसान दिवस, वह दिन जब किसानों द्वारा किए गए योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया गया और कई कृषि बिल पारित किए गए जिनसे किसानों का जीवन बेहतर बना।

परन्तु 23 दिसंबर 2020 को यही किसान दिल्ली कि ठंड में सड़कों पर बैठ कर मोदी सरकार द्वारा लाए गए 3 कृषि बिल का जमकर विरोध किया। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान कई किसानों की जान भी गई।

आइए जानते हैं वे कौन से 3 कृषि बिल है जो सरकार के अनुसार किसानों के हित में है, परन्तु किसान इन बिलो का जमकर विरोध कर रहा है। 

1. आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodity Act)

इस बिल में सरकार ने आवश्यक वस्तुओं की सूची में महत्वपर्ण बदलाव किए है। इस बिल के अनुसार अब इस सूची में अनाज, खाद्य तेल – तिलहन, दाल – दलहन, आलू और प्याज को इस सूची से हटा दिया गया है। सरकार का कहना है कि अब किसान और साहूकार या उद्योगपति दोनों भंडारण कर सकते है और इसकी कोई सीमा भी तय नहीं कि गई है। भंडारण सिर्फ दो ही सूरतों में नहीं हो सकता – युद्ध और आपदा।

1955 में यह बिल कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकने के लिए बनाया गया था। परन्तु पारित हुए बिल से कालाबाजारी को खुलेआम छूट दी गई है। किसान के पास भंडारण के लिए जगह नहीं होता, जिसका अर्थ है भंडारण सिर्फ साहूकार या उद्योगपति ही करेंगे। वे अपने मुनाफे के लिए उन वस्तुओं को तब तक अपने पास रखेगा जब तक इन वस्तुओं की कीमत में बढ़ोतरी ना आ जाए। अब अध्यादेश पारित होने के बाद प्रशासन भी इन्हे भंडारण करने के लिए नहीं रोक सकता। जिससे साहूकार या उद्योगपति अपने मनमुताबिक इन वस्तुओं को बेचेगा जिसमे सरकार भी हस्तक्षेप नहीं कर पाएगा।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे सरकार ने यह बिल किसानों के लिए नहीं अपितु बड़े बड़े उद्योगपति या साहूकारों द्वारा कालाबाजारी को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। 

 2. मूल्य आश्वासन पर बंदोबस्त और सुरक्षा समझौता (Empowerment and Protection Agreement on Price Assurance & Farm Service Act)

यह बिल किसानों को अपनी फसल की बुवाई करने से पहले ही उसकी कीमत तय करने और बेचने की सुविधा प्रदान करता है। अर्थात अब किसान एक कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट कर सकता है, जिसमे किसान वह फसल उगाएगा जो उस उद्योगपति को चाहिए वह भी पहले से तय दामो में। अगर फसल की दाम फसल कटाई के बाद फसल के दाम कम भी हो जाए तो भी किसान को नुक़सान नहीं होगा , परन्तु कीमत बढ़ जाती है तो भी किसान उसी कीमत पर फसल बेचने को बाध्य रहेगा। हम कह सकते है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक तरह का जुआ है। अच्छी बात यह है कि किसान जिस कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट करेगा वह फसल ले जाने के लिए साधन भी देगा जिससे आवागमन का खर्चा बेचेगा।

दूसरी ओर अगर किसान से कंपनी तय दामों पर किसी कारणवश फसल नहीं खरीदती है या फिर अपना तबादला घोषित कर देती है या गुणवत्ता का हवाला देकर किसानों से उनकी फसल तय दामों में नहीं खरीदती है तो ऐसे में किसान कोर्ट नहीं जा सकता। सरकार ने “विवाद निवारण बोर्ड” का गठन किया है, जिसे 30 दिन के अंदर विवाद निपटाना होगा। अगर यह बोर्ड असफल रहती है तो अंतिम फैसला जिला स्तर के सरकारी अधिकारी यानी स.ड.म करेगा। हालांकि किसानों द्वारा भारी प्रदर्शन के बाद सरकार यह कह रही है कि किसान अब कोर्ट में अपील कर सकता है।

जब सौदा उद्योगपति के साथ हो तो हमे याद रखना चाहिए कि बिजनेस में बड़ी मछली छोटि मछली को खाती आई है। अब वोडाफोन को ही देख लीजिए पहले वह हाचिसं और आडिया कंपनी को निगल गई। फिर करोड़ों का घोटाला कर सरकार से झूठे वादे कर अपना करोड़ों रुपए माफ कराया और बाकी घोटाले के पैसों के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस कर भारत सरकार को ही हरा दिया।

उद्योगपतियों को सिर्फ मुनाफे से मतलब है जिसके लिए वह आने वाली हर रुकावट के साथ फायदा का समझौता करना जानता है। उद्योपति विवाद निपटाने के लिए कोर्ट में पैसे फेक सकता है परन्तु किसान नहीं। इसलिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का भविष्य अंधकार में नज़र आ रहा है। 

3. कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (Farmer’ Produce Trade and Commerce (Promotion & Facilitation))

इस बिल के मुताबिक किसान अपनी फसल एपीएमसी मंडी के अलावा देश के किसी भी हिस्से में बेच सकता है। मंडी के अलावा किसान अपनी फसल कहीं भी बेचता है तो उसे शुल्क नहीं देना पड़ेगा। इसके अलावा किसान अपनी फसल ऑनलाइन भी बेच सकता है।

एनएसएसओ के 2012-13 के रिपोर्ट के मुताबिक भारत के महज 10% किसान ही अपनी फसल एमएसपी पर बेचता है। अर्थात महज 10% किसान ही अपनी फसल मंडी में बेचता है बाकी किसान अपनी फसल बाहर ही बेचता है। सरकार ने जो इस बिल में कहा है वह पहले से ही हो रहा है।

इस बिल के अनुसार किसान अगर अपनी फसल मंडी में बेचता है तो उसे शुल्क देना होगा, वहीं अगर बाहर बेचता है तो कोई शुल्क नहीं लगेगा। जिसका सीधा प्रभाव मंडियों पर पड़ेगा। हालांकि अब केंद्र सरकार का कहना है राज्य सरकार अगर चाहे तो प्राइवेट मंडियों पर भी टैक्स लगा सकती है। परन्तु यह मंडिया पहले है राज्य के अंतर्गत आती है। इन सुरतो में या तो केंद्र सरकार इसमें हस्तक्षेप ना करे या फिर प्राइवेट मंडियों पर टैक्स अनिवार्य करे।

दूसरी ओर अगर किसान अपनी फसल मंडी के बाहर बेचता है तो उसे या तो बाजार में बैठना पड़ेगा क्योंकि वह कहीं भी अपनी दुकान नहीं लगा सकता। या फिर उसे अपनी फसल ट्रैक्टर में ले कर घुमनी पड़ेगी जिससे आवागमन का खर्चा बढ़ेगा और साथ ही फसल ना बेच पाने पर फसल के खराब होने का डर भी रहेगा। वहीं दूसरी ओर आढ़ती (बिचोलिया) जिन्हें हम कहते है उन्हें हटा देना चाहिए वो किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होते है। क्यूंकि आढ़ती भले ही बाजार से 2.5% कम दामों में फसल खरीदेगा परन्तु वह किसान को उसी समय सारी फसल की कीमत अदा कर देगा। जिससे किसान अपना समय बाजार में ना लगाकर अपनी फसल बोने में लगाएगा।

किसानों को यह भी डर है कि इस बिल के आने से एमएसपी छीन जाएगा, जिससे किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य में नहीं बेच पाएगा। हालांकि सरकार का कहना है कि एमएसपी रहेगा। वहीं सांता समिति के अध्यक्ष रह चुके नितिन गडकरी ने यह स्पष्ट शब्दों में कहा था कि एमएसपी सरकार की आर्थिक व्यवस्था पर एक बोझ है। क्यूंकि सरकार जो फसल किसानों से एमएसपी की वजह से ज्यादा दामों मे खरीदती है वह उसे बीपीएल के तहत 2 रुपए गेहूं और 3 रुपए चावल के भाव में गरीबों को देना पड़ता है।

क्यों एमएसपी पर सबसे ज्यादा विद्रोह पंजाब और हरियाणा के किसान कर रहे है, जबकि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में विद्रोह नहीं दिखाई दे रहा है? 

महाराष्ट्र गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है और वहां फेयर एंड रेमुनेरतिव के तहत गन्ने की खरीद बिक्री के लिए मूल्य तय होता है। वहीं उत्तर प्रदेश में भूमि बागवानी कि अधिकता है। वहीं सरकार पंजाब और हरियाणा से 90% अनाज खरीदती है, जिसकी वजह से भारत के बाकी हिस्सों के किसान एमएसपी से भली भांति परिचित नहीं है। सरकार एमएसपी 23 फसलों पर निर्धारित करती है पर किसानों से सिर्फ 2-3 फसलों पर ही एमएसपी पर खरीदती है वह भी सिर्फ पंजाब और हरियाणा में। जिसकी वजह से हम कह सकते हैं कि हरियाणा और पंजाब के किसानों का विद्रोह जायज़ है।

बिहार में एपीएमसी मंडी के हटने से क्या प्रभाव पड़ा?

साल 2006 में बिहार भारत का वह पहला राज्य बना जहां एपीएमसी एक्ट को खत्म किया गया था और यह कहा गया था कि इससे किसानों को फायदा होगा।

भारत के विचारो में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 2001-02 से 2016-17 तक बिहार की कृषि विकास दर देश की औसत कृषि विकास दर से कम रही है।

एपीएमसी के हटने के बाद बिहार के किसान औने पौने दामों में अपनी फसल साहूकारों को बेचने के लिए मजबूर है। जिसकी वजह से बिहार में रह रहे किसान बड़े शहरों में रोजी रोटी के लिए पलायन करते है।

सवाल सरकार से…

सरकार अगर हकीकत में किसानों का भला चाहती है तो सरकार को हर फसल की गुढ़वत्ता के अनुसार एक मूल्य निश्चित करनी चाहिए। अगर साहूकार, उद्योगपति या आढ़ती किसानों से निर्धारित दाम से कम दाम में फसल खरीदेगा तो कानूनी कार्यवाही होगी।

आज भी हमारे देश मे भंडारण की व्यवस्था में कोई सुधार नहीं है। अनाज के भंडारण के लिए अगर अडानी ग्रुप आधुनिक तकनीक (सिलो) का इस्तमाल कर सकता है तो सरकार क्यों नहीं? जीडीपी में भारी गिरावट के बाद भी अगर सरकार नया पार्लियामेंट बना सकती है तो अन्नदाताओं के लिए आधुनिक भंडारण क्यों नहीं बना सकती? क्यों सरकार जीडीपी बचाने वाले किसानों के बारे में ना सोचकर उद्योगपतियों को सहारा दे रही है? सरकार से सवाल अनेक है परन्तु सरकार के जवाब से ना किसान को आश्वासन मिला और ना ही देशवासी संतुष्ट हुए।

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