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क्या यह लिंग आधारित भेदभाव है?

भारतीय संविधान में कुछ मौलिक अधिकारों के बारे में लिखा गया है। जो कि प्रत्येक भारतीय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। फिर चाहे वो समानता का अधिकार हो या स्वतंत्रता का अधिकार हो, परन्तु आजकल इनका महत्व कम होता दिखाई दे रहा है।

भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ था और उसी दिन उसे स्वीकृत कर लिया गया था। विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान ‘भारतीय संविधान’ वैसे तो 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया थाा, लेकिन इसे 26 नवम्बर 1949 को ही स्वीकृत कर लिया गया था। 29 अगस्त 1947 को संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति की स्थापना की गई थी, जिसके अध्यक्ष थे डॉ. भीमराव अम्बेडकर, जिन्हें भारतीय संविधान का जनक भी कहा जाता है। उनके अथक प्रयासों के कारण ही भारत का संविधान ऐसे रूप में सामने आया, जिसे न केवल भारत में सबने सराहा बल्कि विश्व में कई अन्य देशों ने भी इसे अपनाया। चार साल पहले सन् 2015 में डॉ. अम्बेडकर के 125वें जयंती वर्ष में पहली बार देश में 26 नवम्बर को संविधान दिवस मनाए जाने का निर्णय लिया गया था और इस साल हम 70वां संविधान दिवस मना रहे हैं। भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जो 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था।

परन्तु जैसे जैसे हम जीवन में आगे की ओर बढ़ रहे हैं। वैसे ही शायद हम संविधान को भी नजरअंदाज करने लगे हैं। और यदि भारत सरकार की बात की करें तो शायद संविधान उनके लिये कोई मायने नहीं रखता है। ये वाक्य में यूँ ही नहीं बोल रहा हूँ। बहुत कुछ अपनी आँखों से देखा व कानों से सुन रहा हूँ। इसलिये बोलने की कोशिश कर रहा हूँ।

हमारे भारतीय संविधान में कुछ मौलिक अधिकारों के बारे में लिखा गया है। जो कि प्रत्येक भारतीय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। फिर चाहे वो समानता का अधिकार हो या स्वतंत्रता का अधिकार हो, परन्तु आजकल इनका महत्व कम होता दिखाई दे रहा है।

हाल ही मे हुए एक बड़े बदलाव के बारे में बात करें तो दिल्ली ऐम्स में नर्सिंग ऑफिसर पद के लिये भर्तियाँ निकली थीं। जिसमें उन्होंने कुल सीटों का 80% भाग महिलाओं को आरक्षित किया और बचा हुआ केवल 20% भाग पुरुषों को। जो कि संविधान के दायरे से बिल्कुल अलग है। और समझ पाना मुश्किल है कि आखिर ऐम्स एडमिनिस्ट्रेशन ऐसा निर्णय आखिर क्यूँ लिया।

http://www.aiimsexams.org

ऐम्स एडमिनिस्ट्रेशन के इस निर्णय को यदि भविष्य मे आगे बढ़कर देखा जाए तो इसके कई दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं। वास्तविकता में देखा जाये तो भर्तियों को मेरिट के अधार पर भरा जाना चाहिये, जेंडर के अधार पर नहीं

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