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क्या न्याय केवल किताबों तक ही सीमित रह गया है?

दरअसल न्याय पाने की प्रक्रिया सालों से चल रही है। लेकिन पुराने समय मे इसमे व्यापार की भूमिका काफी कम थी। लेकिन वर्तमान में न्याय का मतलब ही व्यापार है।

न्याय, एक ऎसा शब्द जिसका प्रयोग करके हज़ारों सालों से प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे को ठग रहा है । सरकारें बदल रही है, व्यापार चल रहे हैं. युद्ध होते रहे है… किसी भी व्यक्ति से पूछिए क्या उसे न्याय मिला… जबाब मिलेगा नहीं। युवा से पूछिए तो कहेगा वो न्याय पाने के लिए लड़ रहा है और हर कीमत पर न्याय हासिल करेगा। बुजुर्ग से पूछिए तो उसका जबाब होगा… सारी उम्र निकल गई लेकिन न्याय नहीं मिला।

दरअसल न्याय पाने की प्रक्रिया सालों से चल रही है। लेकिन पुराने समय मे इसमे व्यापार की भूमिका काफी कम थी। लेकिन वर्तमान में न्याय का मतलब ही व्यापार है। इस प्रकिया में सर्वाधिक दुख जब होता है जब किसी मरे हुए इंसान की मौत को लेकर व्यापार हो। वर्तमान में सोशल मीडिया पर व्यू और लाइक का व्यापार, मीडिया में TRP का व्यापार और सरकार उसे अपने चुनावी मुद्दा बनाकर व्यापार करते है। सूरत चाहे जो भी हो अंततः सबको उसकी मौत पर अपनी रोटी सेकना है।

अगर हम अपने न्यायलयों में  कुल पेंडेंसी का आंकड़ा देखे  तो सुप्रीम कोर्ट में 69000 केस पेंडिंग है वहीं देश भर के हाई कोर्ट में 45 लाख केस पेंडिंग है, साथ ही निचली अदालतों में देश भर में 3 करोड़ 24 लाख केस पेंडिंग हैं। इस स्थिति से आप न्याय के मंदिर की स्थिति का अंदाजा स्वय लगा सकते है।

एक इंसान होने के नाते हम वर्तमान की स्थिति को क्यूँ नहीं प्राथमिकता पर रख सकते? क्यूँ हमे किसी समुह, समुदाय या दल का हिस्सा बनने मे ही अपना अस्तित्व दिखाई देता है?

टीवी चैनल और सोशल मीडिया से बाहर आकर अपने आसपास देखिए. किसी के साथ कुछ गलत होता देखे तो आवाज उठाए, उसकी मदद करे.. कोशिश करे कि हम ज़िंदा रहते किसी इंसान को न्याय दिला पाए। ऐसे किसी की मौत से उसकी निजी जिंदगी की छीछा-लेदर ना करे।

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