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इज़रायल फ़िलिस्तीन विवाद की पूरी कहानी

इज़रायल के वुजूद में आने की कहानी समझने के लिए हमें पहली और दूसरी जंग ए अज़ीम यानी प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध तक जाना होगा।

इज़रायल नाम का नया मुल्क 14 मई सन् 1948 को वुजूद में आया, इसके पहले इज़राइल नाम का कोई देश नहीं था। इज़रायल फ़िलिस्तीन (पैलेस्टाइन) का ही बाहरी हिस्सा है। इसके पहले यहूदियों का कोई अलग मुल्क नहीं था, वह पूरी दुनिया के हर हिस्से में फैले हुए थे इसी तरह फिलीस्तीन के इस हिस्से में भी कुछ यहूदी थे।

इज़रायल के वुजूद में आने की कहानी समझने के लिए हमें पहली और दूसरी जंग ए अज़ीम यानी प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध तक जाना होगा। फ़िलिस्तीन में इतने यहूदियों के जमा होने की एक बड़ी वजह ‘बेलफोर डिक्लेरेशन’ भी माना जाता है। 1917 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब ‘ख़िलाफ़त ए उस्मानिया’ (ओटोमन साम्राज्य) हारने की कगार पर था। उस समय ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर आर्थर बेलफोर ने एक डिक्लेरेशन जारी किया। इस डिक्लेरेशन में यह कहा गया कि ब्रिटेन, यहूदियों को उनकी भूमि फिलिस्तीन वापस दिलाएगा देगा, उनकी भूमि ऐसा इसलिए कहा गया कि यहूदी फिलिस्तीन को  हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम का जन्म स्थान मानते हैं  और उन्हें वहाँ अपना धर्मस्थल बनाना है। वहीं दूसरी ओर ब्रिटन ने चुपके से फ्रांस और रूस के साथ साइक्स-पिकॉट एग्रीमेंट साइन किया। इसके तहत उसने पूरे मध्य पूर्व को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया और तय किया कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद कौन सा देश किस के हिस्से में जाएगा। इसमें उसने फिलिस्तीन को अपने हिस्से में रखा। सीरिया और जॉर्डन फ्रांस को दिया गया। वहीं तुर्की का कुछ हिस्सा रूस के पास गया। एक तरफ ब्रिटेन ने सामूहिक तौर पर यह कहा कि फिलिस्तीन हम यहूदियों को देंगे। वहीं दूसरी ओर उसने गुपचुप तरीके से साइक्स-पीको एग्रीमेंट के तहत यह हिस्सा अपने पास रख लिया। प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ओटोमन साम्राज्य की हार हो चुकी थी। फिलिस्तीन में ब्रिटिश शासन की शुरुआत होती है। बेलफोर डिक्लेरेशन के कारण भारी मात्रा में यहूदियों का पलायन फिलिस्तीन में हो रहा था। इस दौरान वहां पर यहूदियों की तादाद तेजी से बढ़ने लगी थी। फिलिस्तीन में जो यहूदी पलायन कर आ रहे थे, उन्होंने यहां आकर जमीनें खरीदनी शुरू कर दी। धीरे धीरे यहूदियों का फिलिस्तीन में विस्तार होने लगा। फिलिस्तीन में अपना प्रभुत्व मजबूत करने के बाद उन्होंने अरब फिलिस्तीनियों को भगाना शुरू किया। इसके कारण 1936 में अरब फिलिस्तीनियों ने विद्रोह कर दिया। इसे दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने यहूदी सेना की मदद ली। बाद में अरब फिलिस्तीनियों को शांत करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने यहूदी माइग्रेशन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी। इसके चलते यहूदी लोग ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हो गए और छुप-छुप कर उन पर गुरिल्ला हमला करने लगे।

द्वितीय विश्व युद्ध

द्वितीय विश्व

इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत होती है। हिटलर के शासन में  पूरे यूरोप में भयंकर तरीके से यहूदियों का नरसंहार हुआ। करीब 42 लाख यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया। यूरोप में रह रहे यहूदियों को महसूस हुआ कि फिलिस्तीन के अलावा कहीं कोई दूसरी जगह नहीं, जहां यहूदी सुरक्षित रह सकें। विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया। वहीं दूसरी तरफ यहूदी और अरब के लोगों के बीच का मतभेद काफी ज्यादा बढ़ गया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन बहुत कमज़ोर हो चुका था, इस मसले को हल करने में सक्षम नहीं था, इसलिए उसने यह मसला संयुक्त राष्ट्र संघ में भेज दिया। इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र संघ में वोटिंग हुई और नतीजा निकला कि जहां यहूदियों की संख्या ज्यादा है ,उन्हें इस्राइल दिया जाएगा। वहीं जिस जगह पर अरब बहुसंख्यक हैं, उन्हें फिलिस्तीन दिया जाएगा।

अरब इस्राइल युद्ध 1948-49

युएन के इस फैसले के फौरन बाद ही इस्राइल के पड़ोसी देशों मिस्र, सीरिया, इराक और जॉर्डन ने उस पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में इस्राइल ने अपना बचाव करते हुए इन चारों देशों को हरा दिया। इस लड़ाई के बाद जॉर्डन के पास फिलिस्तीन के पूरे वेस्ट बैंक का नियंत्रण आ गया। वहीं गाजा पट्टी पर मिस्र का। इस जंग के बाद फिलिस्तीन का वुजूद न के बराबर हो गया। जंग में इस्राइल ने फिलिस्तीन के पचास फीसदी हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। इस जंग के वजह से लगभग सात लाख अरब फिलिस्तीनियों को बतौर शरणार्थी अपना देश छोड़ना पड़ा।

सिक्स-डे वॉर (1967 का युद्ध)

अरब इस्राइल युद्ध के बाद मिस्र, सीरीया और जॉर्डन ने 1967 में फिर से इस्राइल पर हमला करने की योजना बनाते हैं। उनके इस हमले से पहले ही इस्राइल ने इन तीनों देशों पर हमला बोल दिया। हमले में तीनों देशों को काफी नुकसान पहुंचा। इस युद्ध में इस्राइल ने सीरीया से गोलन हाइट, मिस्र से गाजा स्ट्रिप एवं सिनाई पेनीसुला और जॉर्डन से वेस्ट बैंक छीन लिया। बाद में कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौतों के कारण इस्राइल को सिनाई पेनीसुला मिस्र को वापस करना पड़ा। उधर दूसरी तरफ इस्राइल के पास पूरा फिलिस्तीन कब्जे में था। इस युद्ध को सिक्स-डे वॉर के नाम से जाना जाता है।

1967 में इजरायल के वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी समेत पूर्वी जेरुसलम पर कब्जा करने के बाद से “अल अक्सा मस्जिद” की इस जमीन को लेकर विवाद और बढ़ गया क्युँकि यह पूर्वी जेरूसलम में ही है। बाद में जॉर्डन और इजरायल के बीच इस बात पर सहमति बनी कि “इस्लामिक ट्रस्ट वक्फ” का अल अक्सा मस्जिद के कंपाउंड के भीतर के मामलों पर नियंत्रण रहेगा जबकि बाहरी सुरक्षा इजरायल संभालेगा। इसके साथ गैर-मुस्लिमों को मस्जिद परिसर में आने की इजाजत होगी लेकिन उनको प्रार्थना करने का अधिकार नहीं होगा। यथास्थिति बनाए रखने के वादे के बावजूद, पिछले कुछ सालों में यहूदियों ने मस्जिद में घुसकर प्रार्थना करने की कोशिश की जिससे तनाव की स्थिति भी बनी। यहूदी लोगों ने येरूसलम स्थित “अल अक्सा” मस्जिद को हड़पने की कोशिश की और इसी कारण फिलिस्तीन और इज़राईल में संघर्ष बढ़ता गया। इस “अल अक्सा मस्जिद” को यूनेस्को ने अपनी विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया हुआ है जो कि तीन धर्मों के लिए महत्वपूर्ण है। यह प्राचीन शहर येरूशलम यहूदी, ईसाई और मुसलमानों का पिछले सैकड़ों सालों से विवाद का केंद्र है। इसका कारण यह है कि तीनों ही धर्म के लोगों का “पैगंबर हज़रत सुलेमान अलैहिससलाम” को लेकर अलग अलग मत है और वह “अल अक्सा मस्जिद” को लेकर अलग अलग योजनाएँ रखते हैं। “हज़रत सुलेमान अलैहिससलाम” तीनों ही धर्म ईसाई, यहूदी और इस्लाम के स्वीकार्य पैगंबर हैं। इस्लाम भी इन धर्मों और इनकी किताबों ‘तौरात’, ‘जबूर’ और ‘इंजील’ को मान्यता देता है। “तौरात” हज़रत मूसा अलैहेस्सलाम पर तो “ज़बूर” हज़रत दाउद अलैहेस्सलाम पर और “इंजील” हज़रत ईसा (मसीह) अलैहेस्सलाम पर अवतरित हुई। कुरआन इस्लाम की वह अंतिम किताब है जो आखिरी पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम पर अवतरित हुई। इन तीनों धर्मों में बड़ा विवाद केवल किताबों को सबसे अधिक महत्व देने का है वर्ना इनकी असलियत तीनों धर्म के लोग स्वीकार करते हैं।हज़रत इब्राहिम अलैहेस्लाम तीनों धर्म के लोगों के पैगंबर हैं , इसीलिए तीनों धर्म को “अब्राहम धर्म” भी कहा जाता है।

मुस्लिम पक्ष

“अल अक़्सा मस्जिद” पर मुसलमानों का ईमान है कि “मस्जिद अलअक़्सा” हज़रत आदम अलैहेस्लाम (धरती के पहले मानव) के ज़माने की है और ज़मीन पर बनी दूसरी मस्जिद है। “मस्जिद अल अक़्सा” के बारे में क़ुरआन में भी ज़िक्र है। इस्लाम के इतिहास में “मस्जिद अलअक़्सा” को “क़िबला ए अव्वल” कहकर पुकारा जाता है। क्युँकि हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के ज़माने में जब तक काबा पर गैर मुस्लिमों का क़ब्ज़ा था, मुसलमान “अलअक़्सा मस्जिद” की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते थे। मुस्लिम समुदाय के अनुसार नबी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने 17 महीनों तक मस्जिद अल अक़्सा की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ अदा की है।अल अक्सा मस्जिद मुस्लिमों के लिए मक्का, मदीना के बाद तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक स्थल है। “अल अक्सा मस्जिद के पास ही सुनहरा गुम्बद ‘डोम ऑफ द रॉक’ भी है, जिसे हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) के स्वर्ग जाने से जोड़कर देखा जाता है।”अल अक़्सा मस्जिद” का 35 एकड़ का अहाता है जिसमें इस्लामिक इतिहास के कुछ पुरातात्विक साक्ष्य भी मौजूद हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब फ़िलस्तीन का बंटवारा हुआ तब भी “मस्जिद अल अक़्सा” फ़िलस्तीन का हिस्सा मानी गई।

यहूदी पक्ष

अब सवाल यह है कि जो “मस्जिद अलअक़्सा” हज़रत आदम के ज़माने से लेकर  हज़रत ईसा से होते हुए से हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तक मुसलमानों के पास रही, उस पर यहूदी क़ब्ज़ा क्यों चाहते हैं ? दरअसल यहूदियों का मानना है कि “मस्जिद अल अक़्सा” ही वह जगह है जहाँ इज़राईल बनाने वाले हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ और उन्हें वहाँ अपना धर्मस्थल बनाना है। इसलिए यहूदी “मस्जिद अलअक़्सा” पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं। यहूदी दावा करते हैं कि इस जगह पर पहले यहूदियों के प्रार्थना स्थल हुआ करते थे, लेकिन बाद में यहूदी कानून और इजरायली कैबिनेट ने उनके यहां प्रार्थना करने पर प्रतिबंध लगा दिया। यहां मौजूद वेस्टर्न वॉल को वह अपने उस मंदिर का आखिरी अवशेष मानते हैं। जबकि मुसलमान इसी दीवार को “अल बराक की दीवार” कहते है। उनका मानना है कि ये वही दीवार है जहां पैगंबर मोहम्मद साहब ने “अल बराक” को बांध दिया था। मुसलमानों का इमान है कि पैगंबर मोहम्मद ने अल्लाह से बातचीत के लिए इसी अल-बराक जानवर की सवारी की थी। यहूदी मानते हैं जिस दिन वह इसी स्थान पर हज़रत सुलैमान अलैहिससलाम का धर्मस्थल बना लेंगे तो उन्हें वह तिलिस्मी किताबें हासिल हो जाएंगीं जिनकी मदद से वह अपने मसीहा “दज्जाल” को जल्दी बुला लेंगे और वह यहूदियों को वह इस्राइल अता करेगा। यहूदी भी मस्जिद में इस्राइली पुलिस की सिक्योरिटी के साथ अब भी पूजा के लिए आते हैं।

इसाई पक्ष

अब इसाईयों का पक्ष समझिए दरअसल “मस्जिद अलअक्सा” की 35 एकड़ ज़मीन के एक हिस्से पर ही “हज़रत ईसा(मसीह) का जन्म हुआ था और वहाँ उनका “बैतुल अहम” है। इसाई लोग उस जगह को पाना चाहते हैं। कुल मिलाकर तीन धर्मों के विवाद में एक मस्जिद फंसी है। कई बार इस्राइली फौजों और पुलिस ने कई हथकंडे अपना कर “मस्जिद अलअक़्सा” पर क़ब्ज़े की कोशिश की है। वह 50 साल से ज़्यादा उम्र के फ़िलस्तीनियों के मस्जिद में एंट्री पर रोक लगाते रहे हैं और मस्जिद की बुनियाद को खोदते रहे हैं ताकि मस्जिद को कमज़ोर करके उसे गिराकर हादसे के तौर पर दिखा दिया जाए। यही नहीं जब मस्जिद पर इस्राइल का क़ब्ज़ा था उसकी दीवारों पर इस्राइलियों ने ख़तरनाक कैमीकल पेंट कर दिया जिससे वह जर्जर हो जाए।अपने अगले प्रयास में इस्राइली पुलिस ने “मस्जिद अलअक़्सा” से जुड़े दस्तावेज़ चुरा लिए जो मस्जिद की देख रेख कर रही “अलक़ुद्स इस्लामी वक़्फ़” के दफ्तर में रखे हुए थे। यह दस्तावेज़ साबित करते हैं कि मस्जिद अलअक़्सा पर फ़िलस्तीनियों का हज़ारों साल का हक़ है। इस्राइली पुलिस अब भी मस्जिद कम्पाउंड में ही डेरा डाले हुए है और गोलियाँ चलाती हैं जिसमें अब तक हज़ारो लोग मारे जा चुके हैं। अभी कुछ दिन पहले भी नमाज़ियों पर गोली चलाई गयी। मुसलमानों के अनुसार “मस्जिद अल अक़्सा” की आज़ादी तब होगी जब वहाँ इस्राइली पुलिस हटेगी, उसका पूरी तरह से क़ब्ज़ा फ़िलस्तीनियों को मिलेगा।18 अक्टूबर 2016 को “संयुक्त राष्ट्र” की सांस्कृतिक शाखा “यूनेस्को” की कार्यकारी बोर्ड ने तमाम अध्ययन और रिसर्च के बाद एक प्रस्ताव को पारित करते हुए कहा है कि यरूशलम में मौजूद ऐतिहासिक “अल-अक्सा मस्जिद” पर यहूदियों का कोई हक़ नहीं है।https://www.bbc.com/hindi/international-37695142उसने अरब देशों के ज़रिए पेश किए गए एक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि अल-अक़्सा मस्जिद पर मुसलमानों का अधिकार है और यहूदियों से उसका कोई ऐतिहासिक संबंध नहीं है। हालांकि यहूदी उसे आज भी “टेंपल माउंट” कहते हैं और वह संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव को नहीं मान रहे हैं।

ओसलो एकोर्ड शांति समझौता 1993

दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए 1993 में ओसलो एकोर्ड समझौता होता है। इसमें यह निर्णय लिया गया कि फिलिस्तीन, इस्त्राइल को एक अंतरराष्ट्रीय देश के रूप में स्वीकार करेगा। वहीं दूसरी ओर इस्राइल ने पीएलओ को फिलिस्तीनी लोगों का प्रतिनिधि माना। इस समझौते में यह भी निर्णय लिया गया कि फिलिस्तीन सरकार वेस्ट बैंक और गाजा स्ट्रिप को लोकतांत्रिक ढंग से नियंत्रित करेगी। इस समझौते के लिए इस्राइल के यिट्ज स्टाक राबेन और फिलिस्तीन के यासिर अराफात को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

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