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श्रम कानून : मजदूरों का भविष्य नष्ट करने का राजनीतिक हथियार

जिस वर्ग के नाम पर बिल लाया गया है, उसी वर्ग को इसकी भनक नहीं है कि आने वाले समय में उस पर इनके कैसे कैसे दुष्प्रभाव पड़ने वाले हैं। कभी कभार प्रतीत होता है कि प्रतिनिधि लोकतंत्र में गरीब, किसान और मज़दूर की ना तो कोई भूमिका होती है और ना ही आवाज, प्रतिनिधि ही सर्वेसर्वा हो चुके हैं।

राज्यसभा का मानसून सत्र समाप्त हो चुका है लेकिन किसान और मज़दूर वर्ग की समस्याएं अब शुरू होंगी। यह सत्र देश के लिए कई मायनों में घातक साबित होगा, गरीब को और गरीब करने के लिए जिम्मेदार भी होगा। मोदी सरकार राज्यसभा में धड़ल्ले से बिल पर बिल पारित करवाए जा रही है और दूसरी ओर मज़दूर वर्ग इस बात से अनभिज्ञ घूम रहा है कि उसको सदियों के लिए मज़दूर ही बनाए रखने के मसौदे तैयार हो चुके हैं।

जिस वर्ग के नाम पर बिल लाया गया है, उसी वर्ग को इसकी भनक नहीं है कि आने वाले समय में उस पर इनके कैसे कैसे दुष्प्रभाव पड़ने वाले हैं। कभी कभार प्रतीत होता है कि प्रतिनिधि लोकतंत्र में गरीब, किसान और मज़दूर की ना तो कोई भूमिका होती है और ना ही आवाज, प्रतिनिधि ही सर्वेसर्वा हो चुके हैं। किसी भी बिल को पारित करवाने के खातिर वोट का एक मार्जिन तय किया गया है और पर्याप्त वोट होने पर कैसा भी फरमान जारी किया जा सकता है। जिसमें गरीब, किसान और मज़दूर कुचले जाते हैं।

राज्यसभा सत्र के आखिरी दिन श्रमिकों से जुड़े तीन विधेयक पारित किए गए हैं, जिन्हें सरकार मज़दूरों के हित में बता रही है। हालांकि यह बात और है कि हित-अहित का सोचने वाली यह पूंजीवादी सरकार पूंजीवादियों के हित में और गरीब मज़दूर के अहित में फैसले ले रही है।

2019 में कड़े विरोध के बावजूद भी मोदी सरकार ने वेतन सहिंता विधेयक को पारित किया था, जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार ने 44 श्रम कानूनों को मात्र 4 सहिंताओ में समेट कर रख दिया। वेतन सहिंता विधेयक में न्यूनतम मजदूरी 178 रुपये प्रतिदिन या 4628 रुपये मासिक रखी गई थी। लेकिन किसान संगठनों का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के 1992 के फैसले के अनुसार वेतन निर्धारित करने वाली छह शर्तें रखी गई थी, जिनके हिसाब से 26000 रू से ऊपर मासिक न्यूनतम वेतन बनता है। इस विधेयक ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि किन मापदंडों के तहत न्यूनतम मजदूरी तय की जाएगी। इस कानून को पारित हुए लगभग एक साल बीत चुका है और अभी तक मज़दूरों को इससे कोई फायदा नहीं हुआ है। सहिंताओ का सारा फायदा कंपनी मालिकों व बड़े कॉरपोरेट घरानों को मिला है।

अभी एक साल बीता ही था कि मोदी सरकार फिर श्रमिकों को कुचलने के प्रयास में लग चुकी है, बल्कि सफल भी हो  चुकी है। ऐसे में मजदूरों तक सूचना पहुंचाने वाली संस्थाओं की यह नाकामी है कि वे अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रही हैं।

23 सितंबर को मोदी सरकार द्वारा तीन विधेयक पारित किए गए।

औद्योगिक सम्बंध सहिंता विधेयक 2020 के अनुसार अब 300 से कम कर्मचारियों वाली कंपनी सरकार से बिना मंजूरी लिए ही कर्मियों की जब चाहे छंटनी कर सकेंगी। इससे पहले यह प्रावधान सिर्फ उन्हीं कंपनियों के लिए ही था, जिसमें 100 से कम कर्मचारी कार्यरत हों। इसके अलावा इस विधेयक के अनुसार मज़दूर अथवा कामगार बिना 60 दिन पहले नोटिस दिए हड़ताल पर नहीं जा सकते। विरोध को लोकतंत्र की खूबसूरती कहा जाता है लेकिन अब मजदूरों को विरोध करने से पहले भी नोटिस देना होगा। यह विधेयक हड़ताल करने के अधिकार को अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंधित करता है।

इससे साफ तौर पर जाहिर होता है कि यह विधेयक “मजदूर विरोधी” और कंपनी मालिकों के पक्ष में है।

व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल स्थिति विधेयक 2020 के तहत कंपनियों को यह छूट दी गई है मजदूरों को कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर नौकरी दी जा सकती है। मज़दूर को अब कॉन्ट्रैक्ट वर्कर में तब्दील किया जा सकता है। विधेयक के अनुसार महिला श्रमिकों का काम करने का समय सुबह 6 बजे से लेकर शाम 7 बजे के बीच ही रहेगा। शाम 7 बजे शाम के बाद अगर काम कराया जा रहा है, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी कंपनी की होगी। किसी भी कर्मचारी से हफ्ते में छह से अधिक दिन काम नहीं करवाया जा सकता एवं ओवरटाइम करने पर दोगुना पैसा मिलेगा। मोटे तौर पर इस विधेयक से मज़दूर वर्ग को ना तो खास फायदा है और ना ही खास नुकसान है क्योंकि संभावित तौर पर ओवरटाइम का पैसा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी के आधार पर ही मिलेगा, जो कि 178 रुपये प्रतिदिन है।

लेकिन बिल के मसौदे पर नजर डाली जाए तो इस विधेयक ने असंगठित क्षेत्र की अनदेखी की है। ईंट भट्ठों, होटलों-ढाबों, लघु खदानों व ई कॉमर्स में कार्यरत कर्मचारी अथवा मजदूरों का इस विधेयक में कहीं भी जिक्र नहीं किया गया है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस विधेयक में कृषि क्षेत्र की भी बात नहीं कि गई है।

सामाजिक सुरक्षा विधेयक 2020 के तहत कॉन्ट्रेक्ट बेसिस पर काम करने वाले मजदूरों को भी ग्रेच्युटी भुगतान(एक तरह की बोनस राशि) किया जाएगा। इससे पहले ग्रेच्यूटी उसी व्यक्ति को मिलती थी, जो कंपनी में 5 वर्ष तक कार्यरत था। लेकिन यह विधेयक अभी भी इस बात को साफ तौर पर नहीं बताता की ग्रेच्युटी प्राप्त करने के लिए किन मापदंडों पर खरा उतरना होगा। इस प्रावधान में व्यक्तिगत आवासीय निर्माण कार्य में कार्यरत मजदूरों को शामिल नहीं किया गया है। यह विधेयक सिर्फ उन्हीं प्रतिष्ठानों पर लागू किया गया है, जहां बीस अथवा बीस से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं जबकि देश में कई लघु उद्योग भी हैं। लघु उद्योग में कार्यरत मजदूरों को इस प्रावधान से बाहर रखा गया है। ऐसे में लघु उद्योग में काम करने वाले मजदूर, जो खासतौर पर महिलाएं ही होती हैं, उनको इस विधेयक से लाभ नहीं होगा।

कोरोना के बाद से ही देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर भारी परेशानियों के हमले हुए हैं, ऐसे में इन विधेयकों से उन्हें कोई फायदा नहीं होगा। श्रमिक संगठनों को यह आशा थी कि सरकार प्रवासी मजदूरों को बड़ी मात्रा में रोजगार देने के संबंध में विधेयक लाएगी लेकिन उनकी आशाएं धरी रह गईं।

इन विधेयकों के खिलाफ में दिल्ली के जंतर मंतर (आंदोलनकारियों का स्थायी अड्डा) पर 10 ट्रेड यूनियनों ने विरोध प्रदर्शन किया और इन विधेयकों को मजदूर विरोधी बताते हुए तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग की है। भाजपा की पितृ शाखा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने भी इन विधेयकों का भारी विरोध किया है और कहा है कि, ‘इसके चलते जंगल राज जैसी व्यवस्था बन जाएगी और विवाद उत्पन्न होने की स्थिति में बलपूर्वक समाधान निकालने की कोशिश होगी।’

यह भारत के मजदूर व किसान वर्ग के लिए घातक दौर है। संसद की बजाय, यदि ये विधेयक 11 अशोका रॉड, नई दिल्ली स्थित भाजपा कार्यलय से भी पारित होते तो भी आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि विपक्षी दलों के वॉकआउट करने के बाद इन विधेयकों को पारित किया गया, इन विधेयकों पर किसी तरह की बहस नहीं कि गई और प्रत्यक्ष रूप से पारित कर दिए गए।

मोदी सरकार अपने घमंड में चूर है, गरीब किसानों व मजदूरों पर दमनकारी नीतियां लागू करते हुए निरंतर प्रहार किए जा रही है और पूंजीवादी व्यवस्था को स्थापित करने की ओर कदम बढ़ा रही है। खून पसीना एक करके मेहनत करने वाले मजदूरों पर ये विधेयक अत्याचार हैं, लेकिन जब तक मजदूर वर्ग को इसकी भनक लगेगी तब तक मामला निपट चुका होगा। यदि विरोध भी होता है तो मोदी सरकार मजदूरों को लाठियों से लहूलुहान करने से भी पीछे नहीं हटेगी, जैसा हरियाणा के किसानों के साथ हो चका है।

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