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मजदूर: दो वक्त की रोटी के लिए भी मजबूर है

दो वक्त की रोटी के लिए भी मजबूर है

वो कोई और नहीं बल्कि देश का मजदूर है

दो वक्त की रोटी के लिए परिवार छोड़ देता है

गावों से हटकर शहरों की तरफ चल देता है

शहरों में भी इनका कोई ठिकाना नहीं

एक तरफ नहीं मिल रहा है कोई रोजगार

दूसरी तरफ मकान मालिक की फटकार

मजदूरों के दर्द को कोई सुनने वाला  नहीं है

कभी भूख, कभी बीमारी तथा कभी एक्सीडेंट से मरता  है

इनके मरने पर भी समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता है

क्योंकि अब एक  ऐसा दौर आ चुका  है

जहाँ लोगो के अंदर मानवता मर चुकी है असमानता और भेदभाव,

गहरी जड़े जमा चुकी हैं

जिसको ख़त्म  करने में अभी हम बहुत दूर है हैं

दो वक्त की रोटी के लिए भी मजबूर है

वो कोई और नहीं बल्कि देश का मजदूर है

Rukmani Devi

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Written by Rukmani

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