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सड़कों पर मजदूर : कोरोना युग

हे पथिक!

तुम्हें पता है तुम कितने काम की चीज हो?

तुम्हारे पांवों के छाले, भुख पसीने और गाल -पेट पिचकना कितना काम का चीज है? तुम्हारा तुम्हारे बनाये चारमीनारी बिल्डिंगों से गिर जाना,पसीने बहा बहा कर सड़क और रेल पटरी बनाना और उसी पर चलते चलते मर जाना। कितना अजीब बात है।

यह तुम्हें अजीब लगता है पर शायद कीमत का एहसास ना हो। तुम्हें तुम्हारी आंसुओं के कीमत का हिसाब नहीं है।

अरे बहुत कीमत है तुम्हारे हर दुख का,हर मौत का,पांव की बवाई का,पसीने का, आंसुओं का। आंसुओं का नहीं,खुन के आंसुओं का।

किसके लिए है? मेरे लिए? बिल्कुल नहीं भाई , बिल्कुल नहीं।

तुम्हारे हर दर्द की बहुत कीमत है, सरकारों के लिए, विपक्ष के लिए और राजनीतिक एंटरप्रेन्योर के लिए। वो बड़ी – बड़ी और कालजयी कायनात का भी दिल दहलाने वाली पुरस्क्रृत मसालेदार किताबों के लेखक के लिए, अर्थशास्त्री के पेपर पब्लिकेशन के लिए , प्रकाशकों के लिए और प्रशासनिक अधिकारियों के प्रमोशन के लिए, उपलब्धियों के लिए।

जानते हो कैसे? तुम्हारे दर्द को कोई राजनीतिक मजाक बनायेगा, तुम्हारे दर्द को आम के बगीचे में खाद बनाकर राजनीतिक आम चुसेगा।

कोई   समंदर को निहारती हुयी 50मंजिल के टावर के 31वीं मंजिल के मखमली सोफे पे बैठे समंदर के तरंगों का लुत्फ उठाते हुए और सिगरेट के छल्ले से सने माहौल में तुम्हारी गाथा लिखेगा। तुम्हारे दर्द पर गवाही का,सलाह का,निवारण का,किसी को सलाह देने का और किसी को कोसने का गाथा।लिखेगा मजदूर गरीब माईग्रंट्स के दर्द का,भुखे रहने का,साईकिल से तमिलनाडु से बिहार जाते- जाते मर जाने का,दो रोटी के दान के एवज में सेल्फी ले लेकर तुम्हारे आत्मसम्मान का मटियामेट करने का।

जब जब देश का गरीब सड़क पर माइग्रंट के रुप में आया है तब तब राजनीति शास्त्र,अर्थशास्त्र , समाजशास्त्र,इतिहास के लेखकीय व्यापार को तरक्की मिली।

1770 के बंगाल भूखमरी पर भी तुम सड़कों पर आ गये थे।

तुम्हारे दर्द पर भारत से लेकर विश्व भर में बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयीं, राजनीतिक रणनीति बनायी गयी। पुरस्कार जीते गये।

1943 के बंगाल भूखमरी पर   20वीं सदी के 9वें दशक तक किताबें,सलाह ,राय लिखें गये।

तुम्हे पता है, तुम्हारे मौत,दर्द, आंसूओं पर पश्चिम बंगाल में कितने अर्थशास्त्री पैदा हुये? कितने समाजवाद का हलवा बनाने वाले इंटलेक्चुअल पैदा हुए? अंदाजा नहीं लगा पाओगे।

1947 माईग्रेशन पर लिखने वाला एक तो भारत का आज का सबसे बड़ा आधुनिक इतिहासकार है,सुना है क्रिकेट पर भी लिखता है,सलाह मशवरे देता है।

एक बंगाली अर्थशास्त्री ने तो नोबल पुरस्कार भी जीता ।और लोगों के साहित्य अकादमी और बाकी अवार्ड की तो गिनती ना करो।

पर कभी पुछे कि कुछ बदला क्या?

1947 के विभाजन के समय फिर तुम आये सड़क पर। सड़क,रेल,कच्चे रास्ते, कंकड़-पत्थर,जंगल सब पर मारे गये तुम फिर से।

फिर से वही नई किताबें,नये अवार्ड,नये राजनीतिक एंटरप्रेन्योर!

बदला क्या कुछ तुम्हारे दर्द का रंग?

मटमैले और खारे आंसुओं और पसीने का रंग?

फटे पैरों का रंग? काला और सुखी पड़ गये हथेलियों का रंग?

अब कोरोना के समय भी तुम सड़कों पर मर रहे हो, लाठियां खा रहे हो।अपने ऊपर केमिकल छिड़कवा रहे हो।

फिर वही सिलसिला शुरू होगा…

तुम्हारे दर्द का सिलसिला ।

सिर्फ आंसुओं का समंदर भरेगा।

और कुछ किताबें पुरस्कृत होंगी।

कुछ नये राजनेता बनेंगे।

कुछ अधिकारी पदोन्नत होंगे।

कुछ आर्थिक सलाहकार,कुछ विद्वान।

कुछ हम जैसे तुम्हारे आंसुओं पे सिसकने वाले।

और बहुत कम आततायी राजनीतिक गुनाहगार सजा पायेंगे।

और फिर पुछोगे। कुछ बदला क्या?

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