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क्लाइमेट समिट तय करेगी दुनिया में जलवायु परिवर्तन की दशा और दिशा

इस साल नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन के विषय पर आयोजित होने जा रही महत्वपूर्ण बैठक से पहले राष्ट्रपति बाइडन द्वारा बुलाई गई यह बैठक इस बात का लिटमस टेस्ट होगा कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक कार्रवाई को किस तरह से प्रेरित करता है।

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई के प्रति अमेरिका एक बार फिर संजीदा है। यही वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने उन 40 देशों के नेताओं को आमंत्रित किया है जो कार्बन उत्सर्जन में सबसे ज्यादा योगदान करते हैं। इसके अलावा आमंत्रितों में कुछ ऐसे देश भी शामिल हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिहाज से सबसे ज्यादा खतरे में हैं। दुनिया के इन नेताओं का जमावड़ा आगामी 22-23 अप्रैल को ‘लीडर्स समिट ऑन क्लाइमेट’ नामक वर्चुअल बैठक में होगा। इस समिति को जलवायु संबंधी महत्वाकांक्षा को पुनर्जीवित करने के एक बड़े मौके के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि अनेक देश बदतर होती जा रही कोविड-19 महामारी और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पैदा हो रही कठिनाइयों का हल निकालने के लिए योजना तैयार करने में मसरूफ हैं। इस साल नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन के विषय पर आयोजित होने जा रही महत्वपूर्ण बैठक से पहले राष्ट्रपति बाइडन द्वारा बुलाई गई यह बैठक इस बात का लिटमस टेस्ट होगा कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक कार्रवाई को किस तरह से प्रेरित करता है।

उम्मीद की जाती है कि जापान उस बैठक के समय तक अपने जलवायु संबंधी लक्ष्यों को मजबूत कर लेगा। इसके अलावा कनाडा और दक्षिण कोरिया ने भी निकट भविष्य को लेकर मजबूत संकल्प लेने के संकेत दिए हैं। पहले से ही नाजुक मोड़ पर पहुंच चुके अमेरिका और चीन के आपसी रिश्तो पर भी सब की नजर होगी। साथ ही ब्राजील और भारत पर भी नजरें होंगी। बाइडन प्रशासन और सीओपी26 की अध्यक्षता संभाल रहा ब्रिटेन, वनों के कटान को कम करने के लिए ब्राजील से एक समझौते का लक्ष्य रख रहे हैं, वहीं क्लाइमेट दूत जॉन केरी भारत को वर्ष 2050 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। वह इन संभावनाओं को भी तलाश रहे हैं कि भारत की अक्षय ऊर्जा क्रांति में अमेरिकी धन को कैसे इस्तेमाल किया जाए।इस महत्वपूर्ण बैठक से जुड़ी तमाम संभावनाओं और पहलुओं पर विचार विमर्श के लिए क्लाइमेट ट्रेंड्स की तरफ से एक वेबिनार आयोजित किया गया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय रिसोर्स पैनल की सह अध्यक्ष और ब्राजील की पूर्व पर्यावरण मंत्री ईजाबेला टेक्सिरा, डब्ल्यूआरआई इंडिया की क्लाइमेट प्रोग्राम के निदेशक उल्का केलकर, यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स में क्लाइमेट एंड एनर्जी प्रोग्राम की पॉलिसी डायरेक्टर रेचल क्लीटस और पूर्व ओबामा क्लाइमेट एडवाइजर और सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष जॉन पोडेस्टा ने हिस्सा लिया।रेचल ने देशों द्वारा प्रदूषण मुक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था के लिये पूर्व में संकल्‍प व्‍यक्‍त कर चुके देशों के सामने कोविड-19 के कारण आयी मुश्किलों का जिक्र करते हुए कहा ‘‘कोविड-19 ने देशों को तोड़ दिया है। जिन देशों ने ग्रीन कमिटमेंट दिया था वह आज इसकी वजह से अपने संकल्‍प को पूरा नहीं कर पा रहे हैं।’’

उन्‍होंने कहा कि नेट-जीरो का लक्ष्‍य पूरी दुनिया के लिये महत्‍वपूर्ण है। हमें जीवाश्‍म ईंधन पर निवेश को पूरी तरह बंद करना होगा। रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी के सहयोग को बढ़ाकर भारत, कनाडा और यूरोप के बीच ग्लोबल क्लाइमेट एंबिशन को बढ़ाने के लिए संवाद जरूरी है। यह पूरी तरह से बाइडन सरकार पर निर्भर करता है कि वह किस तरह से संकल्प को आगे बढ़ाता है।

रेचल ने कहा कि एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और कोकाकोला जैसी विशाल कंपनियों समेत 300 से ज्यादा कारोबारी और निवेशक बाइडन प्रशासन का आह्वान कर रहे हैं कि वह एक जलवायु परिवर्तन संबंधी ऐसा महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करें जिससे ग्रीन हाउस गैसों के अमेरिका द्वारा किए जाने वाले उत्सर्जन में वर्ष 2030 तक 2005 के स्तरों के आधार पर कम से कम 50% की कटौती हो सके।

दरअसल, इस लक्ष्य से अमेरिका द्वारा पूर्व में व्यक्त किए गए संकल्प का भार दो गुना हो जाएगा। इसके लिए बिजली, परिवहन तथा अन्य क्षेत्रों में नाटकीय बदलाव की जरूरत होगी। राष्ट्रपति जो बाइडेन वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में अपेक्षित कमी के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि वह वर्ष 2050 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के अंतिम लक्ष्य की तरफ बढ़ने का इरादा कर रहे हैं, लिहाजा नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन मील का पत्थर साबित होगा।

बाइडन ने जिन नेताओं को वर्चुअल बैठक में बुलाया है उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जापान के प्रधानमंत्री योशीहीदे सूगा, ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू सऊदी अरब के शाह सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद और ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी शामिल हैं।

जॉन पोडेस्टा ने वेबिनार में कहा ‘‘अब ऐसा समय आ गया है जब अमेरिका के लोग जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझने लगे हैं और उन्हें अंदाजा हो गया है कि जलवायु परिवर्तन उन्हें ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। पूरी दुनिया के लोगों को भी यह एहसास होने लगा है इसलिए 22-23 अप्रैल को होने जा रही समिट बहुत महत्वपूर्ण होगी। अमेरिकी प्रशासन ने कुछ प्रमुख लक्ष्यों की तरफ ध्यान दिलाया है। वर्ष 2050 तक नेट जीरो अर्थव्यवस्था, वर्ष 2035 तक ऊर्जा क्षेत्र को 100% प्रदूषण मुक्त बनाना और इस रूपांतरण को न्याय संगत तरीके से करना। हाल ही में बाइडन ने अमेरिका की रोजगार योजना को भी सामने रखा है, जिसमें 240 मिलियन डॉलर के निवेश की बात है, जिसे स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश किया जाएगा। निजी और सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ अमेरिका के लोगों के सहयोग से हम अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आगामी समय में जब अमेरिका समिट में हिस्सा लेगा तो अमेरिका को अपनी विश्वसनीयता दोबारा स्थापित करनी होगी।

उन्‍होंने कहा कि बाइडन सरकार को अपनी आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति में जलवायु के पहलू को भी शामिल करना होगा। अमेरिका को अपनी रणनीतिक साझीदारियों को बढ़ाना होगा ताकि पूरी दुनिया के संबंध में से एक ऐसी नीति बनाई जा सके, जिससे कार्बन उत्सर्जन में लक्ष्यात्मक कमी लाई जा सके। ग्रीन क्लाइमेट फंड के तहत अभी 1.2 बिलियन डॉलर का संकल्प व्यक्त किया है गया है। इस बारे में राष्ट्रपति ने अपने बजट भाषण में कहा भी था लेकिन कुल मिलाकर अभी और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। दुनिया को क्लाइमेट मिटिगेशन और क्लाइमेट रेसिलियंस के लिए अगले एक दशक में 80 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। हमें कोयला बिजलीघरों पर जनता की गाढ़ी कमाई के निवेश को रोकना होगा और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को नेट जीरो के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।

उल्का केलकर ने इस मौके पर कहा कि बाइडन प्रशासन से हमें वैसी ही उम्मीदें हैं जैसे कि ओबामा सरकार से हुआ करती थी। हालांकि 1.2 बिलियन डॉलर जीसीएफ बजट उम्मीदों के मुताबिक नहीं है लेकिन फिर भी अमेरिकी प्रशासन द्वारा की गई सशक्त घोषणाओं से एक उम्मीद जगी है। इसके अलावा कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया चीन ने भी सकारात्मक संकेत दिए हैं। मैं भारतीय परिप्रेक्ष्य में तीन चीजों पर बात करना चाहूंगी जो दरअसल उम्मीद बंधाती हैं। जलवायु के प्रति अनुकूल अर्थव्यवस्था बनाने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, वह पहले से बिल्कुल अलग हैं और उनके अपने फायदे भी हैं। इससे प्रदूषण के कारण होने वाली असामयिक मौतों में कमी आएगी। भारी मात्रा में पानी की बचत होगी, हरित क्षेत्र जैसे कि अक्षय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इसका विभिन्न क्षेत्रों में असर होगा। इससे फॉसिल फ्यूल सेविंग के तौर पर निश्चित रूप से फायदा होगा। इनका भारत को भी काफी फायदा होगा। इससे फॉसिल फ्यूल्स सेविंग के तौर पर काफी बचत होगी।

उन्‍होंने कहा भारत सरकार अनेक जीवाश्म ईंधन आधारित कर आमदनी पर निर्भर करती है। अब हम स्‍वच्‍छ ईंधन की तरफ रुख कर रहे हैं। हो सकता है कि हम इन करों में कटौती देखें, जिससे हमारी स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र पर निवेश की क्षमता में कमी हो सकती है, इसलिए हमें सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि एक बिजनेस मॉडल की भी जरूरत है।

उल्‍का ने कहा कि अगर आप 2050 के अनुमानों की तरफ देखते हैं तो कौन सा सेक्टर और कौन सी टेक्नोलॉजी 2050 तक कार्बन न्यूनीकरण की दिशा में सबसे ज्यादा योगदान करेगी? दरअसल यह काम भविष्य की टेक्नोलॉजी ही कर पाएंगी, जैसे कि भारतीय उद्योग का संपूर्ण विद्युतीकरण, अक्षय स्रोतों से मिलने वाली हाइड्रोजन का इस्तेमाल। वैसे सुनने में यह सब बहुत महंगी चीजें लगती है लेकिन अगर आप समेकित रूप से देखें तो वर्ष 2050 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में सबसे ज्यादा योगदान इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का ही होगा। अगर हम इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को अपना लें तो बहुत बड़ी मदद हो सकती है। अमेरिका की नजर में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का मतलब कार और बस से है लेकिन भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का मतलब दोपहिया वाहनों से है। लंबी दूरी तय करने वाले ट्रक की बात करें तो आप ट्रकों को पूरी रात चार्ज करने के लिए नहीं रोक सकते इसलिए यहां पर प्रौद्योगिकीय साझेदारी की बड़ी भूमिका होगी। इसके लिए तेज चार्ज करने वाले उपकरण हाइड्रोजन सप्लाई चैन इत्यादि की जरूरत होगी।

उन्‍होंने कहा कि अनेक भारतीय राज्यों ने घोषणा की है कि वे अब कोयले में निवेश नहीं करने जा रहे हैं। कोयला अब फायदे का सौदा नहीं रहा। जब हम अमेरिका जैसे देश के लिए डेकार्बोनाइजेशन पाथवे की बात करते हैं तो इसका मतलब है रूपांतरण यानी उस चीज से हटना जो पहले ही बनी हुई है। भारत जैसे देश के लिए इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने अपना नजरिया पेश किया है। हमारे द्वारा उत्सर्जित कार्बन का 60% हिस्सा ऐसी चीजों से निकलता है जो अभी बनी नहीं हैं, इसलिए यह एक अलग तरह का रूपांतरण होगा। दरअसल एक अलग तरह के न्यायसंगत रूपांतरण की जरूरत होगी। भारत में हम न सिर्फ फॉसिल फ्यूल जॉब के नुकसान की बात कर रहे हैं बल्कि अब इस बारे में भी बात कर रहे हैं कि किस तरह से बेहतर तरीके से नई नौकरियां उपलब्ध कराई जाएं, किस तरह से अधिक जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से नया मूलभूत ढांचा तैयार किया जाए। हमें न्याय संगत रूपांतरण पर ध्यान देना होगा। यह एक मुश्किल काम जरूर है लेकिन इस पर जरूर ध्यान देना पड़ेगा।

अंतरराष्ट्रीय रिसोर्स पैनल की सह अध्यक्ष और ब्राजील की पूर्व पर्यावरण मंत्री ईजाबेला टेक्सिरा ने इस मौके पर कहा ‘‘जलवायु परिवर्तन का मतलब आज बदल चुका है। मेरी नजर में यह खुशी की बात है कि अपने नए नेतृत्व की वजह से अमेरिका जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए एक बार फिर खड़ा हुआ है हमें न सिर्फ कार्बन न्‍यूनीकरण और अनुकूलन पर काम करना है, बल्कि पूरी दुनिया में नई साझेदारियों पर भी काम करना होगा। हमारे लिए यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग किस तरह से आगे बढ़ता है।

उन्‍होंने कहा कि जलवायु संबंधी द्विपक्षीय लक्ष्य को तय करते वक्त इस बात का भी ध्यान रखना होगा के साथ ही साथ हमें विकास की रफ्तार को भी आगे बढ़ाना है। यही सवाल चीन, जर्मनी और नॉर्वे का भी है। सभी पक्षों को राजी करने के लिए साझा हित तैयार करने होंगे। आगामी समिट के दौरान यह जरूरी होगा।

ईजाबेला ने अपने देश ब्राजील के नेतृत्‍व से जलवायु परिवर्तन जैसे गम्‍भीर मुद्दे और नेट जीरो के लक्ष्‍य की दिशा में अधिक गम्‍भीरता से काम करने की अपेक्षा करते हुए कहा कि ब्राजील को और अधिक मजबूत संकल्‍प के साथ आगे बढ़ना होगा।

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Written by Nishant

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