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भारतीय मुसलमानों की वर्तमान स्थिति पर प्रो. क्रिस्टोफ़ जैफ़रलौट का व्याख्यान

यह तथ्य कि सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र से अधिक भेदभाव करता है, एक और संकेत है कि सरकार ने मुसलमानों को कभी भी किसी भी प्रकार का कोई अपनापन या सहारा नहीं दिया है।

8 अगस्त को, Bangali Academia For Social Empowerment (BASE) ने अपनी ऑनलाइन श्रृंखला की 27 वीं कड़ी का आयोजन किया। इस कड़ी के लिए, उन्होंने ‘भारतीय मुसलमानों पर व्याख्यान’ के लिए प्रो. क्रिस्टोफ़ जैफ़रलौट को आमंत्रित किया था। प्रो. क्रिस्टोफ़ जैफ़रलौट, एक प्रसिद्ध राजनीतिक वैज्ञानिक हैं, जिनका शोध कार्य ख़ासकर दक्षिण एशियाई राजनीति पर काफ़ी उल्लेखनीय है।

इस सत्र में सबसे पहले श्री अब्दुल मतीन ने सभी का स्वागत करते हुए BASE का एक संक्षिप्त परिचय दिया। इसके बाद उन्होंने मुख्य वक्ता प्रो. क्रिस्टोफ़ जैफ़रलौट का परिचय देते हुए उनकी उपलब्धियों और शोध/अनुसंधान क्षेत्र में योगदान का वर्णन भी किया। इसके बाद प्रो. क्रिस्टोफ़ जैफ़रलौट ने अपनी शोध रिपोर्ट पर चर्चा आरंभ की।

अपनी चर्चा के साथ शुरू करते हुए, उन्होंने कहा कि मुसलमान कभी भी एक समरूप समूह नहीं थे। वे सदैव विविध और बिखरे रहे हैं। लेकिन अगस्त 2019 के बाद, वे असलियत में समरूप से हो गए हैं चूँकि पूरी क़ौम का सामना एक ही मुद्दे से है और उनकी लड़ाई भी एक ही तरह की चुनौतियों से है। उन्होंने भारतीय मुस्लिमों में विद्यमान असमानता का भी ज़िक्र किया और एक लंबे समय से उनके द्वारा जिन मुसीबतों का सामना किया जा रहा है उन सभी का भी ज़िक्र किया।

यह पूरी रिपोर्ट उस डेटा पर आधारित थी जिसे प्रो. ने अपने शोध के दौरान इकट्ठा किया था। उन्होंने अपनी रिपोर्ट के माध्यम से उन आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित किया जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक थे। यह पूरा सत्र केवल अलग अलग राजनीतिक पार्टियों के शासन काल में मुस्लिमों की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर आधारित था।

विभिन्न राज्यों में मुस्लिमों की स्थिति में काफ़ी फ़र्क़ है और जैफ़रलौट ने इसके लिए अनेक पहलुओं को ज़िम्मेदार ठहराया। सब से पहले उनने भारतीय भाषा नीति से शुरुआत की । उन्होंने उर्दू को ले कर अपने विचार प्रकट किए । उर्दू को देश की आधिकारिक भाषाओं में से एक माना जाता है, लेकिन हर साल देश में उर्दू बोलने वालों में कमी आ रही है, जिसका कारण शिक्षण और बजट की कमी है । उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कई उत्तरी राज्यों में मुस्लिम आबादी के प्रतिशत और उर्दू बोलने वालों के प्रतिशत में काफ़ी अन्तर है। इसलिए समय के साथ उर्दू दक्षिण भारत की भाषा बन गई है, आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्यों में मुस्लिमों और उर्दू बोलने वालों के प्रतिशत में अन्तर बहुत कम है। यह तथ्य बताते हैं कि मुस्लिमों की भाषा का बचाव और संरक्षण ऐसे राज्यों में नहीं किया गया जो कांग्रेस द्वारा शासित थे।

इसके बाद राज्य आधिकारिक क्षेत्रों में मुस्लिमों की क्या स्थिति है, इस बात पर उन्होंने कुछ आंकड़े पेश किए। उन्होंने 1951 से 2016 तक IPS अधिकारियों के बीच मुसलमानों के प्रतिशत के बारे में बताते हुए, इस बात पर प्रकाश डाला कि कभी भी मुस्लिम IPS अधिकारियों के 4% से अधिक का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। उन्होंने बताया की यदि जनसंख्या पर नज़र डालें तो इस समूह में लगातार वृद्धि हो रही है किंतु IAS और IPS जैसे क्षेत्रों में इनकी संख्या घट रही है। इस संभ्रांत (elite) समूह के बीच मुसलमानों का योगदान लगातार घटता बढ़ता रहा है । किंतु आंकड़े अब भी काफी कम हैं।

इसके बाद प्रो. क्रिस्टोफ़ जैफ़रलौट ने निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र में मुस्लिमों की उपस्थिति पर आंकड़े प्रस्तुत किए। सच्चर आयोग की रिपोर्ट के महत्वपूर्ण योगदान को बताते हुए, उन्होंने कहा कि यह पहला दस्तावेज़ था, जो इस बात पर केंद्रित था कि मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति कैसी है। इस रिपोर्ट से पता चला कि संपूर्ण 21% राष्ट्रीय औसत के मुक़ाबले केवल 8% शहरी मुसलमान वेतनभोगी समूह के थे। 61% मुसलमान स्वरोज़गार कर रहे थे। उन्हें विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र से बाहर रखा गया है। यह निजी क्षेत्र के विपरीत है जहां उनकी संख्या हिंदुओं के समान है। यह तथ्य कि सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र से अधिक भेदभाव करता है, एक और संकेत है कि सरकार ने मुसलमानों को कभी भी किसी भी प्रकार का कोई अपनापन या सहारा नहीं दिया है।

इसके बाद तीसरे पहलू के रूप में उन्होंने शिक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया। शिक्षा के डेटा के मुताबिक़ ये पता चलता है कि अन्य धर्मों के मुक़ाबले मुसलामानों में शिक्षा की कमी है। उन्होंने ने इस बात पे भी रौशनी डाली कि यह मुस्लिम महिलाओं के शिक्षा दर के कारण नहीं है और मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर हिंदू महिलाओं की साक्षरता दर के समान है। आंकड़ो के अनुसार शिक्षित हिंदू महिलाएं 53% हैं वहीं मुस्लिम महिलाएं लगभग 50% जो की ज़्यादा अंतर नहीं है।किंतु पुरुषों के संदर्भ में हिंदू 65.1% और मुस्लिम केवल 59% हैं। अतः साफ दिखाई पड़ता है की शिक्षा के क्षेत्र में यह अंतराल पुरुष पक्ष के कारण अधिक है।

इसका दूसरा मुख्य कारण बताया की अधिकतर मुस्लिम बच्चे बीच में ही पढाई छोड़ देते हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि, प्राथमिक स्तर तक, मुसलमान 65.31% पर अपने बच्चों को किसी भी अन्य समुदाय से अधिक स्कूल भेजते हैं, लेकिन मध्य और माध्यमिक स्तर के बाद धीरे-धीरे मुसलमान छात्रों की संख्या कम हो जाती है, और केवल 3.6% ही स्नातक तक पढ़ाई पूरी कर पाते हैं। यह इंगित करता है कि कांग्रेस सरकार के तहत मुसलमानों को किसी भी तरह से अपनाया नहीं गया, चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो।

इसके बाद राजनीतिक क्षेत्र में मुस्लिमों की भागीदारी पर उन्होंने आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया लोकसभा और कई राज्यों की विधानसभाओं में मुसलमानों को हाशिए पर रखा गया है।

1980 में लोकसभा में 49 मुस्लिम सांसद थे, इसलिए उन्होंने 9% सीटों का प्रतिनिधित्व किया, उस समय मुसलमानों ने भारतीय आबादी का 11% प्रतिनिधित्व किया। लोकसभा में 9% और समाज में 11% के साथ, अंतर केवल 2% था। 2014 में, जब बीजेपी बहुमत से जीती थी, पहली बार लोकसभा में मुस्लिम 4% से नीचे थे। इसका कारण यह है कि संसद में भाजपा का कोई मुस्लिम सांसद नहीं था। पश्चिम बंगाल को छोड़कर राज्य विधानसभा स्तर पर स्थिति लोकसभा स्तर के समान थी।

आगे बढ़ते हुए, उन्होंने साझा किया कि एक सर्वेक्षण में, जब उनसे पूछा गया कि क्या वे पुलिस से डरते हैं, तो 50% मुसलमानों ने कहा कि हाँ। जब उनसे इसका कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि पुलिस अक्सर मुसलमानों को झूठे आतंकवाद के आरोपों में फंसाती है। यही कारण है कि जेलों में मुसलमानों की संख्या अधिक है। उन्होंने कहा कि भारतीय जेलों में मुसलमानों का यह प्रतिनिधित्व अमेरिकी जेलों में अश्वेतों के प्रतिनिधित्व से कहीं अधिक है।

इन्हीं सभी तथ्यों के साथ उन्होंने अपनी बात को समाप्त किया।

व्याख्यान को समाप्त करते हुए, मेजबान ने प्रो. क्रिस्टोफ़ को एक बहुत ही व्यापक और जानकारी से पूर्ण व्याख्यान के लिए धन्यवाद किया और सत्र की समाप्ति की।

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