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लॉकडाउन : बढ़ता तनाव और अपराधिक मामले

सोशल आइसोलेशन और लॉकडाउन के चलते लोगों में तनाव पैदा हो रहा है और इससे “महिलाओं और बच्चों के खिलाफ घरेलू अपराध और यौन हिंसा में बढ़ोत्तरी हो रही है।”

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भारत में संपूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया और इसके बाद लोग अपने-अपने घरों में कैद हो गए ।जो  लोग किसी जरूरी कामों में शामिल नहीं थे उनका घरों से बाहर निकलना बिल्कुल ही बंद हो गया। कोरोना से बचने के लिए लोग घरों में तो हैं लेकिन उन्हें कहीं ना कहीं इस बीमारी की चिंता लगी रहती है और वह दिमाग के किसी कोने में मौजूद रहती है, जिसकी वजह से इंसान की सोच पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।लॉकडाउन ही नहीं उसके बाद की भी चिंता से लोग ग्रसित हैं क्योंकि कई लोगों के सामने उनके रोजगार, नौकरी और वित्तीय संकट पहले ही पैदा हो चुके हैं। लॉकडाउन के  बढ़ने की वजह से चिंता भावनात्मक मुद्दे से हटकर हताशा, असहिष्णुता और लॉकडाउन के प्रबंधन करने की तरफ चली गई है ।

कोरोना की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन जारी है। इस बीच लोग अपने घरों में रहने को मजबूर हैं। कोरोना के फैलने का जितना डर लोगों को बाहर जाने पर लग रहा है उतना ही मानसिक डर लोगों को अब घर में रहते हुए सताने लगा है। कोरोना वायरस के कारण मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी तेजी से देश में उभरकर आया है । लॉकडाउन ने लोगों की आदतें तो जरूर बदल दी हैं लेकिन एक बड़ा तबका तनाव के बीच जिंदगी जी रहा है । यह तनाव बीमारी और भविष्य की चिंता को लेकर है ।

इस वायरस के बारे में अब हम सभी अच्छे से जान चुके हैं लेकिन इसके साथ यह समझना बेहद जरूरी है कि कोरोना वायरस के संक्रमण की तरह तनाव भी उतना ही जानलेवा है ।अगर तनाव को कंट्रोल ना किया जाए तो यह शरीर में भारी उथल-पुथल मचा सकता है। इसी के साथ अवसाद और घबराहट के मामलों में भी तेजी आई । मानसिक तनाव के कारण घरेलू अपराधों, मानसिक बीमारियों आदि में बढ़ोतरी हो रही है।

तनाव बढ़ने के मुख्य कारणों में अनेक उदाहरण शामिल हैं। वर्क फ्रॉम होम के कारण भी लोगों  को इन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें शारीरिक क्रियाओं के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं । यह कई बार कोई प्रेरणा न होने या चिंता की वजह से भी हो सकता है । अब उनके ऊपर काम का बोझ घर की जिम्मेदारियों के साथ बढ़ गया है । इससे लोगों को थकान का सामना करना पड़ रहा है। बहुत से लोग नौकरी की सुरक्षा को लेकर चिंता में हैं, तो उनके लिए अनिद्रा एक समस्या बनती जा रही है जो तनाव को जन्म देती है।

इसका दूसरा कारण है लोग अपनी आम दिनचर्या के अनुसार बाहर वक़्त नहीं बीता पा रहे हैं और ना ही लोगों से मिल और बात कर पा रहे हैं । जिसके कारण पूरा समय सिर्फ मोबाइल , कंप्यूटर और टीवी के सामने रहने से उनके मन में उदासीनता पैदा हो रही है।

सोशल आइसोलेशन और लॉकडाउन चलते लोगों में तनाव पैदा हो रहा है और इससे “महिलाओं और बच्चों के खिलाफ घरेलू अपराध और यौन हिंसा में बढ़ोत्तरी हो रही है।” पहले आस्ट्रेलिया, विक्टोरिया, श्रीलंका और कई देशों में बड़े पैमाने पर ऐसी घटनाएं देखने को मिली लेकिन अब भारत में भी इसका व्यापक असर देखने को मिल रहा हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक, घरेलू हिंसा की शिकायतें लगभग दोगुनी हो गई हैं जबकि अभी सिर्फ ऑनलाइन शिकायतें ही आ रही हैं।

पहले पुरुष काम के लिए बाहर चले जाते थे तो शायद थोड़ी देर के लिए महिलाओं को पितृसत्ता के बंधन से मुक्ति मिल जाती थी। लेकिन अब जब पुरुष दिन भर घर में रहता है, तो जाहिर है उसकी सोच उस पर और हावी हो जाती है। अच्छी बात ये है कि अब महिलाएं शिक्षित हैं, जागरूकता बढ़ रही है इसकी वजह से अधिक मामले दर्ज हो रहे हैं। हालांकि अभी भी ऐसे मामलों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है जो दर्ज नहीं हो पाते।

ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब दुनियाभर में संकट का दौर चल रहा है तब महिलाएं एक और संकट का सामना कर रही हैं। इस वक्त लोग घरों में बंद हैं तो जाहिर है ज्यादा चिड़चिड़ापन हो जाता है और इसकी सारी कसर फिर घर की औरतों पर ही निकलती है। ऐसे में कोशिश सामंजस्य की होनी चाहिए। काम में कमियां निकालने की बजाय पुरुषों को महिलाओं के काम में हाथ बंटाना चाहिए क्योंकि औरतों के लिए इस वक्त वर्क फ्राम होम के साथ ही घर की भी दोहरी जिम्मेदारी है। किन्तु घरेलू हिंसा की जड़ पितृसत्तात्मक सोच में है- जिसमें महिलाओं को पुरुषों से कमतर समझा जाता है।

तनाव में आकर खुदकुशी करने के मामलों में भी बढ़ोतरी हो रही है। कोरोना ने पूरी दुनिया में ऐसे पैर पसारे कि इसने हर किसी को हिलाकर रख दिया। दो महीने से कामकाज ठप रहा और लाखों लोग बेरोजगार हो गए। इस कारण चिंतित लोग आर्थिक मंदी के कारण तनाव का शिकार भी हुए। कई लोगों ने तो गलत कदम उठाते हुए अपनी जान दे दी। लॉकडाउन के बीच खुदकुशी करने वालों का आंकड़ा बढ़ने लगा है। खुदकुशी करने वालों में युवा या फिर अधेड़ उम्र के ही लोग हैं। इसमें एक स्टूडेंट और काम नहीं मिलने के कारण हताश हुए मजदूर भी शामिल हैं। मनोचिकित्सक मानते हैं कि क‌र्फ्यू के बीच आर्थिक मंदहाली और आने वाले समय में रोजगार के सीमित साधनों का डर इसका मुख्य कारण है।दरअसल, लॉकडाउन के बाद लोगों पर आर्थिक मंदी ने तनाव बन कर हमला किया है। अब लोगों को अपनी रोजीरोटी की जुगाड़ के साथ-साथ कोरोना के डर से भी लड़ना है। वहीँ दूसरी तरफ पहले से मानसिक रूप से बीमार लोग इस महामारी के चलते और टेंशन में आ गए हैं।

वहीँ, कोरोना को लेकर सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों और गलत जानकारी की वजह से भी लोग मानसिक रूप से प्रेशर में आए और उन्हें डिप्रेशन की समस्या हुई। सिर्फ इतना ही नहीं, इस बीच मीडिया ने जो सही जानकारी भी लोगों तक पहुंचाई, उसने भी लोगों की मेंटल हेल्थ को बिगाड़ा है। हालात ऐसे भी बने कि लोग पेरानॉइड होने लगे और उनमें नेगेटिव क्यूरिऑसिटी बढ़ी।लोग एक दूसरे से मिलने से डर रहे हैं जबकि इसका यह मतलब हरगिज नहीं है कि आप अपने आपको एकदम अकेला कर लें। आपको बस इतना करना होता है कि लोगों से आपको शारीरिक दूरी बनाए रखनी है ना की  सामाजिक दूरी।

एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 15 करोड़ मानसिक रोगी हैं जिन्हें दवाओं की जरूरत हैं,  लेकिन सिर्फ 3 करोड़ को ही मेडिकल सुविधा मिल पाती है। वहीँ, इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही कह चुका था कि 2020 तक लगभग 20% भारतीय लोग मानसिक बीमारियों का शिकार होंगे। वहीँ इन रोगियों पर भारत में लगभग 9 हजार मनोचिकित्सक हैं। यानी 1 लाख लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर, मतलब हमारे यहां हजारों मनोचिकित्सकों की कमी है।

इस लॉकडाउन के दौरान उन लोगों की समस्या भी बढ़ गई है जो पहले से ही किसी मानसिक रोग से जूझ रहे हैं ।नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्हें साइकोलॉजिकल हेल्पलाइन में पहले दिन 1000 फ़ोन और दूसरे दिन 3000 फ़ोन आए।लोगों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ गई हैं. जिन्हें पहले से ही तनाव, निराशा, हताशा जैसी दिक्कते थीं उनमें इजाफ़ा हो गया है।

इतना ही नहीं बल्कि दूसरे शहरों में काम करने वाले प्रवासी अपने शहर और गांव जाने को लेकर चिंतित हैं । उन्हें आने वाले दिनों में रोजगार नहीं मिलने का भी डर है। जो लोग अपने गांव पहुंच भी जा रहे हैं उन्हें भी गांव में अपनापन नहीं मिल रहा है। गांव वाले उन्हें शक की नजर से देख रहे हैं। गांवों में लोगों पर शक किया जा रहा है कि कहीं वे संक्रमित तो नहीं हैं।कोरोना के साथ आया दिमागी खौफ भारत जैसे बड़े देश में कमोबेश सबकी स्थिति एक समान बनाता है।भले ही अधिकांश लोग मानसिक तौर पर पीड़ित नहीं हो लेकिन एक बड़ा तबका है जिसे भविष्य की चिंता है। वे अपने बच्चे के भविष्य को लेकर असमंजस में हैं. हालांकि तनाव तो सभी को है ।किसी को लॉकडाउन के खत्म होने का तनाव है तो किसी को वित्तीय स्थिति ठीक करने का तनाव, घर पर नहीं रहने वालों को जल्द आजाद घूमने का तनाव है। इसे सामूहिक तनाव भी कह सकते हैं।ऐसे समय में जरूरी है लोग झूठी खबरों से दूर रहें और खुद पर नियंत्रण रखें ।क्योंकि यह समय सभी के लिए समान रूप से विषम है।

 

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