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मीडिया : लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को समाप्त करती दीमक

मीडिया का काम झूठ को आईना दिखाने का होता है ना कि उस को बढ़ावा देने का आखिर कुछ तो वजह है कि आज मीडिया को गोदी मीडिया धड़ल्ले से पुकार लिया जाता है और इसपर  कोई पत्रकार या कोई भी व्यक्ति कोई आपत्ति नहीं जताता, क्योंकि भले ही ईमानदारी कि वह कितनी ही दुहाईयां दे ले पर भीतर ही भीतर वह भी जानता है कि कितनी ईमानदारी उसमें शेष है।

“मीडिया राजनीति के कोठे पर बैठी वह तवायफ है जो हर रोज बिका करती है”  यह बात मैं नहीं कह रही बल्कि इंटरनेट पर भटकते वक्त यह पंक्ति मेरे सामने आ गई और समझ नहीं आया कि तवायफ का नाम लेकर मीडिया की बेज्जती की जा रही है या मीडिया का नाम लेकर तवायफ की , सबका तो नहीं कह रही पर तवायफ की भी कुछ परिस्थितियां होती है, कुछ मजबूरियां होती हैं बिकने की। पर मीडिया! मीडिया की क्या मजबूरियां है, क्यों किसी दौर में क्रांति लाने वाली मीडियाा, जिसके कारण गद्दारों के पसीने छुटा करते थे , वह थर थर कांपा करते थे, आज उसकी कलम की स्याही इतनी फीकी पड़ गई है हर तरफ धड़ल्ले से अपराधी सीना चौड़ा करके घूम रहे है और उसकी कोई खबर भी नहीं आती। मुद्दा जब सत्ता की तारीफ करने का होता है तो इनकी कलम की गति चीते की मानिंद हो जाती है तो वही जब मुद्दा सत्ता से जवाब तलब करने का होता है तो कछुए के मानिंद , कुछ दिन पहले जब एक पत्रकार की किसी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में गिरफ्तारी हुई तो हर तरफ अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर आवाज़ें बुलंद होने होने लगी जबकि उसके भी पहले जाने कितने ही बेगुनाह और सच्चे पत्रकारों ने कैदी की तरह जिंदगी काटी है या काट रहे हैं ,तो आखिर इतना पक्षपात क्यों? क्या मीडिया जिसे समाज का दर्पण कहा जाता है , लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है क्या इतना बदल गया है?  परिवर्तन तो संसार का नियम होता है पर शर्त है कि परिवर्तन अच्छा हो, क्षति पहुंचाने वाला ना हो ।

 एक प्रसिद्ध उत्पाद के विज्ञापन का टैगलाइन है “कुछ अच्छा करने से दाग लगे तो दाग अच्छे हैं” पर यहां तो अच्छे खासे को बिगाड़ने में दाग लग जाते हैं तो फिर उसे क्या कहेंगे? दाग अच्छे हैं या बहुत बुरे? मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ऐसे ही तो नहीं कह दिया गया क्योंकि बिना किसी क्षेत्र में काम किए किसी को भी उसकी उपाधि नहीं मिलती तो लोकतंत्र का भार उठाने वाली उसकी रक्षा करने वाली मीडिया इतनी डरकर क्यों जी रही है कि प्रधानमंत्री के सामने होने पर  उनसे अर्थव्यवस्था , समाज कल्याण आदि का हिसाब मांगने के बजाय यह पूछती है कि “आप थकते क्यों नहीं है?  कोई एनर्जी का टॉनिक लेते हैं ?” ऐसे बेतुके सवाल , मीडिया का काम झूठ को आईना दिखाने का होता है ना कि उस को बढ़ावा देने का आखिर कुछ तो वजह है कि आज मीडिया को गोदी मीडिया धड़ल्ले से पुकार लिया जाता है और इसपर  कोई पत्रकार या कोई भी व्यक्ति कोई आपत्ति नहीं जताता, क्योंकि भले ही ईमानदारी कि वह कितनी ही दुहाईयां दे ले पर भीतर ही भीतर वह भी जानता है कि कितनी ईमानदारी उसमें शेष है।

स्टूडियो के एक बड़े से एसी वाले न्यूज़ रूम में बैठा वह कोट पेंट वाला एंकर चीख़ चीख़कर  बताता है कि वह कितना निडर और साहसी है और सरकार से कैसा भी सवाल करने में उसे कोई संकोच नहीं है , पर सामने आने पर कैसे कैसे सवाल किए जाते हैं यह बात सब जानते हैं लगता है जैसे घर पर कोई मेहमान आया हो और उस कुछ बुरा ना लग जाए इस बात का पूरा ध्यान दिया जा रहा हो, खैर यह कितना  हद तक सही है कितना हद तक ग़लत यह बात हर एक जिम्मेदार नागरिक समझ सकता है __ आप भी, अगर आप को सरकार से ज्यादा देश से प्रेम हो तो।

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  1. हम समझ नहीं पा रहे हैं कि दीमक मीडिया को ख़त्म कर चुका है, और वही दीमक हम सब को भी खा रहा है, बिना किसी व्यवधान के!

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