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कोयला खादानों का मीथेन एमिशन जलवायु के लिए बड़ा ख़तरा

मीथेन एक ग्रीन हाउस गैस है और इसके एमिशन्स और जलवायु पर इसका प्रभाव बढ़ती चिंता का विषय बन रहा है। हालांकि इस गैस का प्रभाव कम समय तक रहता है, लेकिन इसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग अधिक होती है।

क्या आपको पता है दुनिया भर में प्रस्तावित कोयले की खादानों से होने वाला मीथेन एमिशन अमेरिका के सभी कोयला बिजली घरों से होने वाले कार्बन डाईऑक्साइड एमिशन की बराबरी कर सकता है?

स्थिति की गंभीरता इसी से लगाइए कि CO2 के बाद ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का ही सबसे बड़ा योगदान रहा है। मीथेन एक ग्रीन हाउस गैस है और इसके एमिशन्स और जलवायु पर इसका प्रभाव बढ़ती चिंता का विषय बन रहा है। हालांकि इस गैस का प्रभाव कम समय तक रहता है, लेकिन इसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग अधिक होती है।

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में प्रस्तावित कोयला खदानों से होने वाले मीथेन एमिशन्स की मात्रा, सभी अमेरिकी कोयला संयंत्रों से होने वाले CO2 उत्सर्जन के बराबर हो सकती है जिससे जलवायु प्रभावित होना तय है। यह अपनी तरह का पहला सर्वे है जिसमे दुनिया भर की 432 प्रस्तावित कोयला खानों का सर्वेक्षण और मॉडलिंग की गई है।

मीथेन एमिशन्स की मात्रा हर खदान से होने वाले एमिशन्स के अनुसार है। यदि एमिशन्स की मात्रा को इन प्रस्तावित खानों से कम नहीं किया जाता तो आने वाले समय में मीथेन के एमिशन्स में 13.5 मिलियन टन (Mt) की वार्षिक बढ़ोतरी होगी, जो वृद्धि  30% तक की ओवरचार्ज मीथेन एम्मिशन होगा।

CO2 के बाद ग्लोबल वार्मिंग करने में मीथेन गैस का सबसे बड़ा योगदान है, लेकिन वातावरण में इसका जीवनकाल कम रहता है अर्थार्त इस गैस का प्रभाव कम समय तक रहता है, लेकिन इस गैस से ग्लोबल वार्मिंग सबसे अधिक होती है। माइनिंग के दौरान कोयला सीम्स टूटने से और आसपास की परतों से मीथेन गैस का वातावरण में एम्मिशन होता है।

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर के एक रिसर्च एनालिस्ट और इस स्टडी के लेखक, रयान ड्रिस्केल टेट ने कहा, “कोयला खदान से निकलने वाली मीथेन गैस ने वर्षों से इस छानबीन और तहकीकात को चालाकी और पैंतरेबाजी से टाला है, हालांकि इसके स्पष्ट प्रमाण हैं कि इससे जलवायु प्रभावित होती है। यदि नई कोयला खदानें बढ़ाई जाती हैं, वो भी  बिना इस गैस को कम करने के उपाय के, तो ग्रीनहाउस गैस का एक बड़ा स्रोत अनियंत्रित हो जाएगा।”

रिपोर्ट के अनुसार, कोयले की खदानें जो अभी विकास की स्टेज पर हैं वो अगले 20 साल तक हर साल लगभग 1,135 मीट्रिक टन CO 2 इक्विवैलेंट (CO 2e) का रिसाव करेगी और अगले 100 साल के हिसाब से 378 मीट्रिक टन वार्षिक CO2 का रिसाव करेगी। यदि 20 साल के आधार को माना जाये तो मीथेन गैस का एम्मिशन अमेरिकी कोयला संयंत्रों से होने वाले वार्षिक CO2 उत्सर्जन (2019 में 952 मीट्रिक टन) से अधिक होगा ।

प्रस्तावित कोयला खदानों से होने वाले सबसे अधिक मीथेन गैस का एम्मिशन (CO2e20) वाले देशों में चीन (572 मीट्रिक टन), ऑस्ट्रेलिया (233 मीट्रिक टन), रूस (125 मीट्रिक टन), भारत (45 मीट्रिक टन), दक्षिण अफ्रीका (34 मीट्रिक टन), अमेरिका (28 मीट्रिक टन) और कनाडा (17 मीट्रिक टन) शामिल हैं । चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, तुर्की, पोलैंड और उजबेकिस्तान में प्रस्तावित कोयला खदानें मीथेन के रूप में ग्रीनहाउस गैस का एम्मिशन 40-50% कर सकती हैं, जिससे वे दुनिया में गैस के मामले में सबसे ज़्यादा सघन प्रस्तावित कोयला खदानें मानी जाएँगी।

GEM (ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर) ने खनन की गहराई, कोयला रैंक, पर डेटा का उपयोग करके व्यक्तिगत खदान स्तर पर वैश्विक मीथेन उत्सर्जन अनुमान लगाया है, और अपने नए विकसित ग्लोबल कोल माइन ट्रैकर की सहायता से इस रिपोर्ट को बनाया है।

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर (GEM) एक नॉनप्रॉफिट रिसर्च आर्गेनाइजेशन है जो दुनिया भर में फॉसिल फ्यूल परियोजनाओं पर जानकारी विकसित कर रहा है।

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Written by Nishant

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