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कोरोना महामारी से लगातार ग्रसित होता गाँव का मजदूर वर्ग

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने बोलने के लिए बहुत सारे वादे किये की मजदूरों को लॉकडाउन के समय की मजदूरी मिलेगी, परन्तु इसकी जवाबदेही तय नहीं की और ना ही इसके लिए कोई मोनिटरिंग सिस्टम बनाया जिससे की उनका हक उनको मिल सके। क्या इसका कारण यह है कि मजदूर वर्ग की बात रखने वाला कोई नहीं है, इस सरकारी तंत्र में ?

वर्तमान समय में भारत के गाँवों में जितनी जनसंख्या है उनमें से 41 करोड़ दिहाड़ी मजदूर (पिरीयाडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे जुलाई 2017-जून 2018 के मुताबिक) है | जो कि इस देश की जनसंख्या का 30% (लगभग) है। गाँव के लोग शहर की तरफ बहुत तेज़ी से पलायन कर रहे है जिसके मुख्य कारण वर्तमान समय में खेती और पशुपालन में बचत में कमी, गाँव में रोजगार नहीं मिलना है। यह लोग शहर में आकर अलग-अलग उद्योग धंधो में, निजी कंपनियों में, दुकानों पर, अन्य जगह दिहाड़ी या मासिक वेतन के आधार पर काम करते हैं।

पिछले कुछ महीनों में कोरोना महामारी के कारण भारत सरकार ने अचानक देशभर में लॉकडाउन की घोषणा की और सभी कारखाने और बाज़ार तुरंत प्रभाव से बंद कर दिए गये। सरकार की तरफ से आह्वाहन हुआ की सभी लोग जहाँ हैं वहीं रहे, किसी भी प्रकार की यात्रा नहीं करे और महामारी को देखते हुए शारीरिक दूरी बना कर रखे। नतीज़न यह मजदूर वर्ग इतना प्रभावित हुआ की पूरा देश घरों में लॉक हुआ और ये लोग सडकों पर आ गये। जिस मजदूर वर्ग के खून पसीने से लोगों की बड़ी-बड़ी होटल, सरकारी दफ्तर, आवास, बहु मंजिला भवन बनाये गये उनमें से कोई भी उनको शरण नहीं दे सका और उनको सडकों पर आकर अपने घरों की ओर पुनः पलायन करना पड़ा। देश के मजदूर वर्ग को कोरोना वायरस से लड़ाई के साथ पलायन की दोहरी लड़ाई लडनी पड़ी। इस संख्या में मुख्यतः कारखाना मजदूर और दिहाड़ी कामगार लोग है।

यह पुनःपलायन (reverse migration) मजदूर वर्ग के लिए वर्तमान और भविष्य के बारे में कई चुनौतियों  का सामना करवाता है और उनको पता चलता है कि उनके साथ कोई नहीं है| देश की सरकारें भी केवल निजी कंपनियों के लिए काम कर रही है। जिस तरह महाराष्ट्र, गुजरात अन्य मध्य भारत से मजदूर वर्ग का पलायन हुआ, तो उस समय उनकी जो हालत हुई उसको पूरे देश ने देखा है कि वो पैदल, साईकिल खरीद कर या अपने बच्चों को गोदी में लेकर या फिर ट्रक में सामान की तरह भर कर आये हैं।

मजदूर वर्ग ने देश को सब कुछ दिया है। अपने जीवन को दाँव पर लगाकर हमेशा देश के निर्माण में लगे रहते हैं। फिर भी जब लॉकडाउन में घर जाने की बात आई तो देश ने इस वर्ग के लिए क्या किया? केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने बोलने के लिए बहुत सारे वादे किये की मजदूरों को लॉकडाउन के समय की मजदूरी मिलेगी, परन्तु इसकी जवाबदेही तय नहीं की और ना ही इसके लिए कोई मोनिटरिंग सिस्टम बनाया जिससे की उनका हक उनको मिल सके। क्या इसका कारण यह है कि मजदूर वर्ग की बात रखने वाला कोई नहीं है, इस सरकारी तंत्र में ?

मजदूरों के यूनियन तो प्रत्येक राजनीतिक पार्टियों में और अलग से भी बहुत बने हुए है। परन्तु क्या उनमें से ऐसे लोग आयेंगे जो उनके लिए लड़ेंगे और उनके अधिकार लेकर रहेंगे? कोरोना और लॉकडाउन ने जितना जुल्म मजदूर पर किया है वैसा कभी देखा नहीं गया। इस दौरान देश-विदेश से आने जाने के बंदोबस्त हुए और मजदूर वर्ग पर पाबन्दी लगा दी जिससे मानसिक दबाव में आकर मजबूरन उसको पलायन करना पड़ा। फिर वो कही रास्ते में चलते-चलते थककर मर गये, कहीं बीमारी से मर गये, कहीं ट्रेन से कुचलकर मर गये या कहीं रोड पर दुर्घटना का शिकार हो गये। जिसका सरकार और प्रशासन के पास कोई विश्वास योग्य आंकडा तक नहीं है। आजादी के बाद लोकतंत्र में मिले तमाम अधिकारों को लगभग खत्म सा कर सरकार और प्रशासन के रवैया से लग रहा था की या तो सरकार और शासन कोरोना को खत्म करना चाहता था या गरीब मजदुर को?

कुछ सुझाव

देश में कोरोना के कारण मजदूर वर्ग परेशान न हो इसके लिए सरकार शहरी क्षेत्र में मजदूर वर्ग के लिए कुछ विशेष कार्य कर सकती थी जैसे की प्रवासी मजदूरों को कारखानों से निकल दिया तो उस सिटी में उनके लिए आश्रय की जगह उपलब्ध करवा देते और वहाँ साथ में खाना भी उपलब्ध करवा देते। यह जगह अस्थायी रूप से कोरोना नियमों का पालन करते हुए खेल के मैदानों, समुदायक हॉल आदि का उपयोग कर सामुदायिक फैलाव को भी रोका जा सकता था।

प्रवासी श्रमिकों का उत्पीडन न हो इसको अगर ध्यान में रखा जाता तो देश में सभी राज्यों की पुलिस को सख्त आदेश दिए जाने चाहिए थे कि वो प्रवासी मजदूरों का उत्पीडन, उनसे मारपीट न करे और न पैसे मांगे और न अन्य लोगों द्वारा ऐसा होने दे। क्योकि देश के विभिन्न हिसो से सोशल मिडिया पर देखे गये मजदूर वर्ग के उत्पीडन बहुत निंदनीय है। भारत देश के मजदूर और गरीब तबके के साथ जो हुआ है, इसकी उन्होंने उम्मीद नहीं होगी, क्योकि ये उनके लिए एक सबक सा बन गया है।

जब मजदूर वर्ग गावं में आया और जैसे तैसे अपनी जिंदगी जीना शुरू किया, तब सरकार देश में फिर से अनलॉक की प्रकिया शुरू कर दी, जिससे कंपनियों और कारखानों में मजदूरों की जरूरत पड़ने लगी। मजदूर वर्ग भी गावं मे रोजगार नहीं मिलने और अपने कमाई का कोई साधन नहीं मिलने से मजबूरन उन कारखाने और फैक्ट्री की तरफ वापिस से जाने के लिए सोचने लगे।

जब उनको वापिस जाना है तो अब सवाल आया कि वापिस जाये कैसे ? इस समय तक सरकार द्वारा केवल राजधानी ट्रेन , सुपर फ़ास्ट ट्रेन और  हवाई यात्रा के साधन चलाया। ट्रेनों में भी केवल आरक्षित श्रेणी के टिकट उपलब्ध और वो भी ऑनलाइन बुक किया जा सकता था। हम सभी जानते हैं कि भारत में कितने मजदूर स्वयं टिकट बुक करना जानते है। शायद ही कोई एसा होगा जो अपने टिकट खुद बुक कर पाया होगा। जबकि भारत में मजदूर वर्ग का मुख्य साधन ट्रेन है और ट्रेन में भी मजदूर वर्ग ज्यादातर जनरल कोच में यात्रा करते हैं। क्योकि उनके पास न तो टिकट बुक करने का साधन है और दूसरा की ये टिकट बहुत महंगा होता है उनके लिए इसलिए मजदूर वर्ग जनरल डिब्बों से यात्रा करते है।

मजदूरों को कारखाना मालिक या कम्पनी मालिक फ़ोन करते है और कहते हैं कुछ दिन में आ जाओ वरना आपको जॉब से निकाल दिया जायगा। जब सरकार द्वारा अनलॉक शुरू हुआ तो उनका काम भी खुल गया। अब मजदूर वर्ग के सामने फिर समस्या आ गयी वहाँ वापिस कैसे जायें ?

लेखक ने जैसा देखा की मजदूर इतने महंगे टिकट खरीद कर वापिस वहाँ पहुचें। इसमें उन्होंने ट्रेन के आरक्षित वर्ग में वातानुकूलित श्रेणी के टिकट भी खरीदा और कुछ मजदूरों तो हवाई जहाज से यात्रा करके अपने कार्य के लिए वापिस पहुचें।

इन सब घटनाओं से पता चलता है कि मजदूर वर्ग को इस कोरोना महामारी के कारण कितनी परेशानी हुई। जब से कोरोना भारत में आया तब से लेकर आज तक यह वर्ग इसके कारण बहुत प्रभावित हुआ है। क्योकि लॉकडाउन में इनको घर आना पड़ा और जिन हालतों में वो आये थे उससे दयनीय कुछ हो नहीं सकता। क्योकि इसके कारण कई मजदूरों को अपनी जान से भी गवानी पड़ी और जब अनलॉक शुरू हुआ तो वापिस वही हालत शुरू हो गयी।

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