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प्रवासी मज़दूर संकट : एक पुरानी समस्या का नया रूप

वर्तमान प्रवासी श्रम संकट के संदर्भ में प्रवासी मजदूरों के विकास के बारे में एक संक्षिप्त इतिहास। भारत में लौकिक देहात असली देश है।

Economic Divide

इलेक्शन के समय शहर शहर चुनाव प्रचार और बड़ी बड़ी चुनावी रैलियां देख कर यही प्रतीत होता है कि मानो हिन्दोस्तान नगरों एवं महानगरों में ही बसता है। गांव और देहात की कल्पना पढ़े लिखे मध्यमवर्ग के लिए अधिकतर छुट्टियों से जुड़ी है। लेकिन इस देश में जिसे हम गांव या देहात कहते हैं, असल हिन्दोस्तान की परिभाषा वही है न कि दिल्ली या मुंबई जैसे छोटे बड़े शहर। देश की लगभग 68% आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है और लगभग आधी आबादी कृषि किसानी से जुड़ी आजीविका से अपना जीवन यापन करती है। कृषि से लगभग 14% की जीडीपी पैदा होती है।

लेकिन तब क्या हो जब देश अपनी इस जीवन रेखा को भूल जाए? जब सरकारें देहातों की नब्ज़ ना पकड़ सकें ?

सरकारों की ओर से उचित सहयोग ना होने के कारण पूरी अर्थव्यवस्था धराशायी हो जाती है और उसके मलबे से एक बहुत ही असहज और कमज़ोर कार्यबल निकलता है जो दर बदर भटकने को मजबूर हो जाता है और जिसे दो वक़्त की रोटी जुटाने में परेशानियाँ होती है। आप अंदाजा़ लगा सकते हैं कि हिन्दोस्तान में यह तादाद कितनी है।

भारत का उत्तरी हिस्सा बहुत उपजाऊ रहा है और साथ में प्राकृतिक संसाधनों से काफ़ी समृद्ध भी। यही कारण था कि प्राचीन समय में आक्रमणकारी और फिर मध्य काल में मुस्लिम वासी इस तरफ़ खिंचे चले आए। और बाद में 200 सालों के अंग्रेज़ों के राज का कारण भी यही रहा।
यह काफ़ी हास्यास्पद बात है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रामभरोसे छोड़ दिया गया है। स्थायी आजीविका ना होने के कारणवश एक बहुत बड़ी आबादी ने गाँव से शहरों को तरफ़ पलायन किया है। कृषि जो हमेशा से इतनी बड़ी आबादी के आजीविका का साधन रहा है, उस क्षेत्र ने अबतक सिर्फ़ नीतिगत पक्षपात को देखा है। यह बात समझ से परे है कि आख़िर क्यों एक विशाल समूह को जीविका निर्धारित नीतियों में संवेदनशीलता से नहीं लिया गया है!

मसलन भूमि सुधार कानून जिसे ठीक तौर पर लागू नहीं किया गया है, और ज़मीनें किसानों के कब्ज़े में पहुंची ही नहीं। खेत खलिहानों के कागज़ात कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास है। एक बड़ी तादाद में किसान भूमिहीन हैं जो ठीके पर किसानी करते हैं। बचे कुछे किसान साहुकारों के चंगुल में फंसे हैं। घटती पैदावार और बढ़ते ऋण इन मजबूर किसानों पर इतना दबाव डालते हैं कि उन्हें पलायन करना पड़ता है। शहरों में यह अकुशल मज़दूर से ज़्यादा कुछ नहीं होते हैं और इनके मेहनत को पूरी तरह से शोषण किया जाता है।

ये मज़दूर शरुआत में शहरों में, वे निर्वासित भूमि, और फुटपाथों पर कब्जा कर लेते हैं और समय के साथ अपने मामूली आवास शुरू करते हैं जो धीरे धीरे झुग्गियों में और एक अवधि में एक क्लस्टर में बदल जाती हैं है।ये झुग्गियां ज्यादातर स्वायत्त इकाइयों के रूप में कार्य करती हैं और केवल भगवान की दया पर चलती हैं। न कोई उचित पेयजल सुविधा, न कोई सीवरेज,न कोई स्वच्छता सुविधाएं उन्हें घातक बीमारियों का प्रजनन मैदान बनाती हैं। इन लोगों के लिए राज्य मौजूद है लेकिन केवल इन्हें खारिज करने के लिए।झुग्गी बस्तियां और उसमें रहने वाले लोग शहरी भारत की बुनियाद हैं। इनका शोषण विकास के एक नए पहलू को उजागर करता है मगर शोषित होने के बावजूद ये प्रवासी अपने रक्त और पसीने के साथ इसी विकास में अपना योगदान करते हैं।

निवास के बाद, काम ढूंढना अगली बड़ी चुनौती होती है जो इस प्रवासी कार्यबल का सामना करती है।इनका अकुशल और अनपढ़ होना किसी भी गरिमापूर्ण कार्य को प्राप्त करने में दोहरी चुनौती खड़ी करता है।यहाँ गाँवों के बिचोलिये जो शहरों में बसे होते हैं उनके साथ पैतृक संबंध, काम दिलाने में काम आते हैं ।एक पर्याप्त कमीशन का भुगतान करने के बाद वे निर्माण स्थलों, ईंट भट्टों या आस-पास के कारखानों में सहायकों के रूप में काम करने का प्रबंधन करते हैं।उनमें से कुछ सड़क के किनारे विक्रेताओं और फेरीवालों के रूप में काम करना शुरू करते हैं । फिर भी शहर इस विशाल कार्यबल को रोज़गार देने में विफल रहता है और इसका एक विशाल हिस्सा बेरोजगार रह जाता है। वो लोग जो किसी भी काम को पाने में नाकाम रहते हैं, उनके दुख, अवसाद और हताशा, छोटे अपराधों में शामिल होने के कारण बन जाते हैं।समय के साथ छोटे अपराधी गैंगस्टर बन जाते हैं और शहर के निवासियों के लिए एक कानून व्यवस्था की परेशानी बन जाते हैं।इसी तरह, किसी काम के अभाव में कुछ प्रवासी भीख मांगने लगते हैं, जबकि उनके बीच की महिलाओं को वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है।

भारत में आजादी से पहले भी प्रवास का अस्तित्व था, कृषि की मौसमी प्रकृति और स्थानीय ज़मींदारों और जागीरदारों के क़र्ज़ तले दबे होने के कारण गरीब किसानों को बंबई, कलकत्ता और दिल्ली जैसे ब्रिटिश भारत के अधिक विकसित प्रांतों में पलायन करना पड़ता था।रेलवे निर्माण, कपास और गन्ना खेती और प्रसंस्करण उद्योग उस समय में कुछ प्रमुख रोजगार प्रदाता थे।गंतव्य पर प्रवासियों की रहने की स्थिति इतनी दयनीय थी कि यह गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के लिए राष्ट्रवादियों का एक लोकप्रिय एजेंडा बन गया।महात्मा गांधी ने स्वयं एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की, जहाँ गाँव आत्मनिर्भर होंगे।उन्होंने ग्राम स्वराज शब्द का ईजाद किया जो बाद में विनोबा भावे द्वारा विकसित किया गया था और जिसमें ग्राम विकास के एक आत्म-कुशल मॉडल की वकालत की गई थी जहाँ एक गरिमापूर्ण जीवन के लिए सभी सुविधाएँ उपलब्ध होंगी।ग्राम स्वराज या ग्राम स्व-शासन एक ऐसा मॉडल था जो विकेंद्रीकृत, मानव-केंद्रित और गैर-शोषक था।

हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद गांधी के दृष्टिकोण को ताक पर रखा दिया गया था।यह विचार कि गाँव की अर्थव्यवस्था को वास्तव में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है ये महज़ अतीत की बातें बन कर रह गईं। हरित क्रांति जैसे कुछ कदम वास्तव में उठाए गए थे, लेकिन यह समान परिणाम देने में विफल रहा, शायद इसलिए भी क्योंकि इसे समान रूप से लागू नहीं किया गया था, .इसका परिणाम यह हुआ कि पंजाब और हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों के गांव की अर्थव्यवस्था ने आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बड़े पैमाने पर प्रयास किए, लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे गरीब राज्य जहां कृषि के विकास की संभावना ज़्यादा बेहतर थी वह विकसित नहीं हो पाए।जिस प्रकार की विविधता भारत के पास थी उसका फ़ायदा उठाना, क्षेत्रीय आवश्यकताओं को पूरा करने वाली नीतियों पर निर्भर था। लेकिन ऐसा नहीं होना था। इसके कारण कुछ क्षेत्रों में जहां गांव की अर्थव्यवस्था पहले से ही दयनीय थी उसका पतन और भी तेज़ी से हुआ।अंग्रेज़ों और ज़मींदारों के बीच के सांठगांठ ने पहले ही गरीब किसानों की कमर तोड़ दी थी और जो कुछ बचा था उसे स्वतंत्र भारतीय राज्य ने खत्म कर दिया।

समय के साथ इन क्षेत्रों को अपने स्वयं के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार बना दिया गया और केंद्र ने इन छेत्रों के विकास से मुंह फेर लिया।इसने आजादी के बाद प्रवास की लहर की शुरुआत की। बंटवारे के बाद हुए प्रवास के बारे में बहुत बातें की जाती है, मगर राज्यों के अंदर होने वाले और अंतरराज्यीय प्रवास पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है।

भारत का 93% कार्यबल असंगठित क्षेत्र में है। कुल भारतीय अनौपचारिक कार्यबल की गणना अलग-अलग अनुमानों के अनुसार लगभग 450 मिलियन से अधिक पर की जाती है।राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुमान के अनुसार, भारत में 28.3% श्रमिक प्रवासी हैं। इस मापदंड द्वारा, 175 मिलियन कार्यकर्ता अनौपचारिक क्षेत्र में काम के लिए आगे बढ़ते हैं।इसके अलावा, प्रवासन पैटर्न को जाति की पहचान के रूप में भी चिह्नित किया गया है। ईंट भट्ठा श्रमिकों में से 95% ग्रामीण हैं, आधे यानी सभी प्रवासी कामगारों में से 48.7% अनुसूचित जाति वर्ग से हैं और एसटी वर्ग से 16.1%। शेष 35.2% में से 30.2% OBC हैं।

उपलब्ध आंकड़ों से संकेत मिलता है कि प्रवासियों का बड़ा प्रवाह बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों और जनजातियों से आ रहा है।
प्रमुख गंतव्य राज्य दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, आंध्र प्रदेश और केरल हैं।

Covid -19 संकट ने पहली बार भारतीय श्रम प्रवास के मुद्दे को सामने लाया है।इस बड़े पैमाने पर मानवीय संकट के कई पहलू हैं, जिनमें से कुछ स्रोत से जुड़े हैं और कुछ गंतव्य के साथ।महामारी से निपटने के लिए एहतियाती उपाय के रूप में, भारत ने विश्व इतिहास में अब तक का सबसे बड़े लॉक-डाउन किया।सिर्फ एक कार्यकारी अधिसूचना के द्वारा पूरे देश को एक ठहराव में ला दिया गया।अर्थव्यवस्था के पहिये को अचानक से रोक दिया गया। इस फैसले के बाद यह स्वाभाविक था कि भारतीय समाज के एक बड़ा हाशिए को यानी कि गरीब और सबसे कमजोर तबके को फिर से सबसे अधिक भुगतना पड़ेगा।लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया।70 वर्षों से प्रवासी श्रमिक पैदा करने वाली नीतियों की ही तरह, तालाबंदी की घोषणा गरीबों के लिए अवमानना से भरी थी। जबकि विदेशों में फंसे भारतीयों को उनकी मातृभूमि में लौटने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था, मजदूरों को स्रोत से गंतव्य तक पहुंचाने वाली ट्रेनों और बसों को रोक दिया गया था।

गंतव्य में आय के अवसर सूख गए और उसने अपने किरायेदारों को बेदखल कर दिया। यह बताया गया है कि लगभग 50% मजदूरों को लॉक-डाउन के बाद से भुगतान नहीं किया गया था।निर्वाह के किसी भी साधन के अभाव में, उन्होंने पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर वापस जाना चुना।

पिछले साल 2 अक्टूबर का दिन था जब देश ने 150 वीं गांधी जयंती मनाई थी।यह दिन वर्तमान परिदृश्य में महत्त्व रखता है क्योंकि इस दिन को सभी राजनीतिक दलों ने महात्मा और उनके साबरमती आश्रम से दांडी तक किये गए मार्च के उपलक्ष्य में एक टोकन मार्च निकाला था गांधी के जीवन और यात्रा में ये एक महत्वपूर्ण घटना थी , जिसने उत्पीड़न के खिलाफ भारत की अहिंसक लड़ाई को रेखांकित किया था। इस घटना के छह महीने बाद भारतीय मजदूर वर्ग ने बिना किसी धूम धाम के एक दूसरा मार्च शुरू किया है । गांधी ग्राम स्वराज के अग्रदूत और वंचित वर्ग के मसीहा अगर जीवित होते तो आज शर्म से अपना सिर नीचा कर लेते।लेकिन जो आज जीवित हैं और सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं।
जैसा कि ग़ालिब ने कहा है
“शर्म तुमको मगर नहीं आती।”

THE ORIGINAL ENGLISH VERSION OF THIS ARTICLE WAS PUBLISHED BY AARIZ IMAM.

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