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देश में प्रवासी मज़दूरों का हाल

लॉकडाउन के शुरुआती चरण में अर्थव्यवस्था का भारी नुकसान हुआ और प्रवासी श्रमिकों को आय का कोई स्रोत नहीं होने के कारण, जीविका के लिए अपने गांवों में वापस जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

तामीर-ओ – तरक्की वाले हैं कहिये भी तो उनको क्या कहिये
जो शीश-महल में बैठे हुए मज़दूर की बातेँ करते हैं

उर्दू शायर ओबैदुर् रहमान का ये शेर कुछ दिनों से दिमाग़ में घूम रहा है
दुःख की बात यह है कि हमारा और आपका अफ़सोस इन्हीं क़िस्म के शेर, कविताओं या गज़लों तक सीमित हैं
ना हम ना आप और ना ही घर में बैठा कोई भी शख्स इस बात का अंदाज़ा लगा सकता है कि देश का एक बड़ा हिस्सा किन पीड़ा और परेशानियों से गुज़र रहा है
सोशल मीडिया पे आती मज़दूरों की तस्वीरें देख कर sad react करना या फिर कुछ comment कर आगे बढ़ जाना ही हम सभ्य समाज के अफ़सोस ज़ाहिर करने ही हद्द है

अगर यह बात ना होती तो TikTok और YouTube की लड़ाई देश के करोड़ों युवाओं को उलझा के ना रखती
जब प्राइम टाइम में बेमतलब के डिबेट हो रहे थे और देश meme साझा करने में लगा था तो लाखों प्रवासी मज़दूर हज़ारों मील का पैदल सफ़र करते जा रहे थे,
पढ़ने में या सुनने में शायद ये किसी को बलिदान का रूमानी अह्सास भी दे या किसी नेता को मज़दूर दिखने में मज़दूर ना दिखें लेकिन टूटे चप्पल, पाँव में छाले, भूखे बिलखते बच्चे, सड़कों में थकन और भूक से मरते लोग कुछ अलग ही कहानी बयान कर रहे हैं

चार घंटे की नोटिस में देश की तालाबंदी कर एक बहुत बड़े तबके को राम भरोसे छोड़ देना जहां शायद काफ़ी नहीं था इसलिए सदा तत्पर पुलिस के बेरहमी से बरसते डण्डों ने कमी को पूरा किया
किसी ने 20 लाख करोड़ का एलान किया तो किसी ने 5 लाख लोगों को रोज़ाना खाना खिलाने का दावा किया लेकिन शायद इतना सब कुछ lockdown के कारण दिख नहीं पाया
व्यंग और शेर के परे हम हक़ीकत को देखने की कोशिश करें तो स्थिति हमारी कल्पनाओं से काफ़ी ज़्यादा भयावह है
भूक, पुलिस के dande, मौसम की मार, बदहवासी, थकान, निराशा, और ज़िम्मेदारी का एहसास लिए प्रवासी मज़दूरों के काफ़िले जो कहीं सड़कों, खेत खलिहानों, rail की पटरियों पर दिख रहे हैं आधुनिक भारत की वो तस्वीर दिखा रहे हैं जो हम कबूल नहीं करना चाहते
जो देश World Power बनने का दावा करता है उसमें शायद इतनी सलाहियत नहीं है कि अपने ही लोगों के लिए खड़े हो सके
पेश है यह रिपोर्ट

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