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किसान आंदोलन का राष्ट्रव्यापी स्वरूप

आंदोलन के दौरान अब तक 30 से ज़्यादा किसानों की शहादत हो चुकी है लेकिन आंदोलनकारी इस सरकार के अड़ियल रवैए से परिचित है और वे इस लम्बे आंदोलन के लिए तैयार है

मोदी सरकार के तीन कृषि बिलों के विरोध में अगस्त में पंजाब से शुरू हुआ किसान आंदोलन अपने अगले पड़ाव में दिल्ली सीमा पर पहुँच गया है। चौथे हफ़्ते में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान दिल्ली की टिकरी, सिंघु, और ग़ाज़ीपुर सीमा पर डेरा डाले हुए है जबकि राजस्थान और गुजरात के किसानों ने राजस्थान-हरियाणा की शाहजहांपुर सीमा पर चक्का जाम किया हुआ है। सरकार इन बिलों के ज़रिए कृषि क्षेत्र में कोर्पोरेट की सबसे बड़ी और सुनियोजित घुसपैठ का रास्ता तैयार कर चुकी है जिसमें 21वीं में भारत में खेती-किसानी के काम को बड़ा धक्का लगा है।

ग़ौरतलब है कि इस आंदोलन को सिर्फ़ पंजाब का आंदोलन साबित करने की पुरज़ोर कोशिश सरकार और गोदी मीडिया कर रही है, जिसके मूल में एक बात स्थापित होती है जो किसान चुप है और किन्हीं कारणों से सडकों पर नहीं उतर पाए है, उनकी चुप्पी को सरकार और मीडिया तीन कृषि बिलों का समर्थक मानने-बताने को आतुर है। इस दौर की यही सच्चाई है।पहली बार नहीं है कि आपको विरोध मुखर तरीक़े से करना होगा।वरना आपको सत्तासीन ताकतों द्वारा अपना समर्थक मान लिया जाएगा।

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने जिस तरह अंग्रेज़ी हुकूमत बहरों को सुनाने के लिए असेम्बली में धमाका किया था, उसी विरासत से निकले पंजाब के किसानों ने सरकार- गोदी मीडिया के प्रो पेगेंडा के तिलिस्म को तोड़ ने के लिए पंजाब की सड़कों को विरोध प्रदर्शनों से पाट दिया है और अब यह दिल्ली की चौखट पर दस्तक दे चुका है। इसे नज़रंदाज़ करना अब सरकार-गोदी मीडिया के लिए नामुमकिन है। इस किसान आंदोलन को सिर्फ़ पंजाब का या/और इन कृषि बिलों को सीमित करके नहीं देखा जा सकता है जिसकी कई वजहें है।

पहला, आज़ादी के बाद देश को खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बनाने के लिए 70 के दशक में पंजाब में ग्रीन रीवोल्यूशन के चलते फर्टिलाइजर और पेस्टिसायड ने पंजाब की ज़मीन, पानी और लोगों को जिस कदर नुक़सान पहुँचाया है, जिसकी परिणिति “कैन्सर ट्रेन” और मायग्रेशन के रूप में हुई है। पंजाब ने देश को खाद्यान्न आपूर्ति के चलते जो नुक़सान झेला हो, उस पर बहुत कम बात होती है लेकिन उनकी अपेक्षाकृत सम्पन्नता से सभी सरकार-मीडिया को रश्क हो रहा है। जब विदर्भ का किसान दशकों से आत्महत्या कर रहा है तो देश की सत्ता और उनके पिछलग्गुओं की आँखों की कोर ना नम हुई। रिरियाते और हाथ फैलाते हुए किसान को देखने की आदत पाले हुए सत्ता धारियों को तनी हुई मुट्ठियाँ पच नहीं पा रही है।

दूसरा, यह आंदोलन हाल ही के किसान आंदोलनों जैसे 2017 में राजस्थान का किसान आंदोलन, 2018 में मध्यप्र देश का किसान, 2019 का महाराष्ट्र के किसानों का लाँग मार्च की कड़ी में देखा जाना ज़रूरी है। ये सभी आंदोलन समग्र रूप से कृषि क्षेत्र में गहराते संकट और किसानों के ग़ुस्से के प्रमाण है। आज की पीढ़ी के लिए पहला मौक़ा है जब इन आंदोलनों के ज़रिए किसान अपनी आवाज़ इस स्तर तक बुलंद कर रहा है। कोरोना के चलते लगाए गए ग़ैरज़रूरी लॉकडाउन और आर्थिकमंदी के चलते अब गरीब मज़दूर-किसान में हर जगह बहुत ग़ुस्सा है, लेकिन ऊपर बताए आंदोलनों ने इन ग़ुस्से को राजनैतिक सुर दिया है।

तीसरा, इस आंदोलन में पहले दिन से टोल प्लाज़ा की घेराबंदी कर टोल फ़्री बनाना और अड़ानी-अम्बानी पर निशाना साधकर किसान आंदोलन ने एक बेहतरीन दांव खेला है। सरकार की कोरोना के चलते आर्थिक नाकेबंदी के चलते हुई परेशानियों के सामने इस नाकेबंदी ने सरकार-कोर्पोरेट का गठजोड़ की अकादमिक -बौद्धिक अभिव्यक्ति का आम जनमानस द्वारा इस्तेमाल करना एक बड़ा राजनैतिक परिपक्वता का प्रमाण है।

चौथा, इस आंदोलन ने देश में सत्ता के केंद्रीकरण और केंद्र-राज्य के रिश्तों पर भी बात हो रही है। मोदी सरकार के अलोकतांत्रिक रवैये ने जनता के बड़े हिस्से को बात-बेबात पर कटघरे में खड़ा कर दिया है जिसमें अपनी जायज़ और संविधानसम्मत माँगो के चलते आपको एक नागरिक के बरक्स आपके धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा और विचारधारा के आधार पर सिर्फ़ इसलिए बदनाम-परेशान किया जाता है वे सरकार की ख़िलाफ़त में है। सत्ता धारी पार्टी और देश के बीच इतनी पतली-धुंधली लकीर कभी ना रही, जैसी अब है। “इंदिरा इस इंडिया, इंडिया इस इंदिरा” के बाद ये पहला मौक़ा है जब सत्ता धारी दल, सरकार और उनके समर्थकों की भीड़ गोदी मीडिया के साथ मिलकर डर का ऐसा मायाजाल रचा है, जिसके दम्भ पर इन्हें लगता है कि उन्हें लगता है कि वे हमेशा सत्ता में ही बने रहेंगे। हबीब जालिब के शब्दों में –

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था

अब जब सरकार में इस दम्भ को तोड़ने “नया किसान” आया है जो अपने हक़ की लड़ाई आँख में आँख मिलाकर लड़ रहा है जिससे पार पाने की तरकीब अभी तक सरकार नहीं सूझा पाई है। इस सरकार में कई आंदोलन हुए है, जिन्हें सरकार ने प्रॉपगैंडा और स्टेट रेप्रेसन से दबा दिया है, या कुछ आंदोलन कुछ वक्त बाद ख़त्म से हो गए। इस आंदोलन की सबसे खूबसूरत बात है कि किसान पूरी तैयारी- तसल्ली से बैठे है। हालाँकि आंदोलन के दौरान अब तक 30 से ज़्यादा किसानों की शहादत हो चुकी है लेकिन आंदोलनकारी इस सरकार के अड़ियल रवैए से परिचित है और वे इस लम्बे आंदोलन के लिए तैयार है। इस आंदोलन का भविष्य इस देश में ना सिर्फ़ खेती-किसानी बल्कि जन आंदोलन के तौर-तरीक़ों और जान भागीदारी के नए समीकरण बनाने के लिहाज से भी रोचक होगा। जिस तरह पंजाब के किसानों ने देश के किसानों को एक रास्ता दिखाया है, उम्मीद है कि राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात की तरह और राज्य के किसान शामिल होंगे और इस लड़ाई को मुकम्मल अंजाम तक पहुँचाएँगे।

This article was originally published bu Mukesh Kulariya in Trolley Times.

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